मुकुन्दमाला स्तोत्रम् (कुलशेखर आलवार - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Mukundamala Stotram of Kulasekhara Alwar with Commentary
कुलशेखर आलवार (राजा कुलशेखर) द्वारा
मुकुन्दमाल 49
ध्यानिञ्चि वाडुकचेसि कोनवलेनु. प्रथमसोपानमु भगवत्पादारविं
दमु. तामर पुष्पमुन कुण्डु वासन ई चरणमुनकु गलदा यनिन
वेदमुलु, उपनिषत्तुलु, नारदुलु कोनियाडुचुण्डुटे वासन. सर्व
दष्टुनिकि चक्केर चेदैनटुलु मनकु भगवन्तुनि संगति चेदैयुन्नदि.
नारदादुलकु तीपिगनुन्नदि. ई पुष्पमुनु धरिञ्चिनटुलु आ पुष्प
मुनेत्लु धरिम्पवच्चुनु अनिन रत्नाल अंगडिलोनि नगलनु राजुलु
धरिञ्चुचुन्नारु. दरिद्रुलकु आ याभरणमुलु लभिञ्चवु. अट्ले आ
पुष्पमुनु धरिञ्चुवारु ब्रह्मादुलु. वारिकदि शिरोभूषणमु. मन्नु,
जलमु चेरियुण्डु प्रदेशमुन पुष्पमु मोलचुनु. ई पुष्पमे
च्चट मोलचिनदि यनगा कावेरि कोल्लडमु चेरिनस्थलमु चल्लगनुण्डगा
नच्चट पुट्टेनु. हंस लुन्नवा यनिन परमहंसलैन सनकादुलु
आश्रयिञ्चिरि. तामरपुष्पमु ओक्कटिग पुट्टदु; गुम्पुग मोलचुने
यनिन श्रीदेवी भूदेवुल करसरसिजमुल नडुम नैदवदियै युन्नदि.
आ पुष्पमु ए जलमुन प्रतिफलिञ्चे ननिन ना मनोभावन यनु
सरस्सुन प्रतिफलिञ्चेनु. इत्लनि वेदान्तदेशिकुलु विन्नविञ्चिरि.
कुल : स्वामी! नी पादमुलनु मरण कालमुनन्दे तलचिननु
चालुनु.
यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कळेबरम्,
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः.
-- गीत. 8.6
तस्मा त्सर्वेषु कालेषु मा मनुस्मर युध्य च,
मय्यर्पित मनोबुद्धि र्मामेवैष्य स्यसंशयः.
-- गीत. 8.7
अनु श्लोकमुलन्दु सदा तलचुचुण्डिनने अन्त्यकालमुन स्मरण
कल्गुनंटिवि. अदियुनु गाक वराह पुराणमुन ‘शरीरमु दृढमुग
5
50 मुकुन्दमाल
नुण्डुनपुडु तलचिरेनि वारिनि ज्ञप्तियं दिडुकॊनि अन्त्यकालमुन
वारि यॊद्दकु वच्चॅद नण्टिवि. भागवतमुन कपिलदेवहूति संवाद
मुन मरणकालमुनन्दु बन्धुवुलु मॊदलगु वारिचेत पीडिम्पबडु
टकु मुन्दे स्वामिनि स्मरिञ्चवलयुननि चॅपबडॅनु. कान निपुडे
स्मरणमुनु कलिगिञ्चवलयुनु.
पॅरियाऴ्वार् तिरुमॊऴि 4पत्तु 10ति.मॊ 1पाशुरमु. तुप्पु
डयारै अनु पाशुरमुन अप्पोदु किप्पोदे शॊल्लिवैत्तेन्=अनगा,
मरणकालमुनकैन यिपुडे चॅप्पुचुन्नाननि चॅपबडॅनु.
8
चिन्तयामि हरिमेव सन्ततं
मन्दमन्द हसिताननाम्बुजम्,
नन्दगोपतनयं परात्परं
नारदादिमुनिबृन्द वन्दितम्.
नन्दगोपतनयं=नन्दुनिकि सुतुडुनु, परात्परं=मिक्किलि श्रेष्ठु
डुनु, नारद+आदि=नारदुडु मॊदलुगागल, मुनिबृन्द=मुनुलस
मूहमुचेतनु, वन्दितम्=नमस्करिम्पबडुवाडुनु, मन्द मन्दह
सित=मिक्किलिस्वल्पमैन चिऱुनगवुगल, आनन+अम्बुजं=कमलमुवण्टि
मोमुगलवाडुनेन, हरिमेव=श्रीमहाविष्णुने, चिन्तयामि=तलञ्चु
चुन्नानु.
मन्दस्मितमुतो गूडिन मुखपद्ममु गलवाडुनु, नन्दगोपुनि
कुमारुडुनु, परात्परुडुनु, नारदादि मुनिसमूहमुचेत सेविम्प
बडिनवाडुनु अगु हरिने सदा ध्यानिञ्चॅदुनु.
मुकुन्दमाल 51
स्वामि : नीवु मरणकालमुन ना स्मरण कलुगवलयु ननु
चुन्नावु. आ समयमुन स्मरिञ्चुटकु अनुवु
गानन्दुन निपुडे स्मरिञ्चुचुन्नाननीकूड अनुचुन्नावु.
नीवंटिवा रेंदऱो नादयकै एदुरुचूचुचुन्दुरु.
अनेकुलु नन्नु आश्रयिञ्चि युण्डुटचेत नी संगतिनि ने
नॊकसमयमुन मऱचिननु मऱतुनु.
तस्मा त्सर्वेषु कालेषु मा मनुस्मर युध्य च,
मय्यर्पित मनोबुद्धि र्मामेवैष्यस्य संशयः.
-- गीत. 8.7
अनन्यचेता स्सततं यो मां स्मरति नित्यशः,
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः.
-- गीत. 8.14
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च,
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राण मास्थितो योगधारणाम्.
-- गीत. 8.12
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवं विधोऽर्जुन,
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप.
-- गीत. 11.54
मयि चानन्ययोगेन भक्ति रव्यभिचारिणी,
विविक्तदेशसेवित्व मरति र्जनसंपदि.
-- गीत. 13.11
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज,
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माशुचः.
-- गीत. 18.66.
दैवीह्येषा गुणमयी मममाया दुरत्यया,
मा मेव ये प्रपद्यन्ते माया मेतां तरन्ति ते.
-- गीत. 7.14
52 मुकुन्दमाल
अत्लु नायन्दु अव्यभिचारमैन भक्तियुञ्चि नन्ने सदा तलं
चुचु, नायन्दु भारमुवेसि युण्डुमु.
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्,
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्, जिघ्र न्नश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन्.
-- गीत. 5.8
प्रलपन् विसृजन् गृह्ण न्नुन्मिषन्निमिषन्नपि,
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्.
-- गीत. 5.9
अनि चेप्पिन पदुमूडु कार्यमुलन्दुनु अनगा निद्रलेचिनदि
मोदलु निद्रिञ्चुवरकु गल सकलकार्यमुलन्दुनु नन्नु दलचुचु
अभ्यासमु चेयुचुण्डुमु. नीकोरिक प्रकारमु अन्तिमस्मरण कलिगिं
चेदनु.
कुल : स्वामी! मी याज्ञानुसारमु सदा हरिने तलञ्चेदनु.
स्वामि : नीयोक्क अशुद्धमैन मनसुतो नन्नु ध्यानिञ्चगलवा?
नेनु वच्चि कापादुदुना?
कुल : स्वामी! मिम्मु दलचुटकुमुन्दे कदा नेनु पापिग
नुन्दुनु?
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः,
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्यप्रज्ञा प्रतिष्ठिता.
अत्लु अशुद्धमैन मनसुनु नीकु अर्पिञ्चिनयेडल नीवु वसिञ्चु
टकु योग्यमुगानि आ चोतुनु नीवे शुद्धपरचुकोन्दुवु. अग्निदेवुडु
वच्चुननि चीकटिनि पोगोट्टुटकुगानु एन्नि प्रयत्नमुलु चेसिननु अन्ध
कारमु पोदु. आ यग्निदेवुडे वच्चि चीकटिनि पोगोट्टवलयुनु. नीकु
[Header] ముకుందమాల 53
హరియని పేరేల కలిగెను? నిన్ను స్మరించిన మాత్రమున అశుద్ధతను
పోగొట్టువాడ వగుటచేతనే గదా? అగ్నిని అశుద్ధుడు స్పృశించినను కాల్చును.
తెలిసయో తెలియకయో యెటుల ముట్టినను కాల్చును. విరేచనమునకు,
వాడుకొను మాత్రను తెలియక నోటవేసికొనినను, దాని కార్యముకాక
మానదు. నీ నామము లోపల ప్రవేశించి సకల పాపములను వెలుపలికి
తఱిమివేయును.
యతతో హ్యపి కౌంతేయ పురుషస్య విపశ్చితః,
ఇంద్రియాణి ప్రమాథీని హరంతి ప్రసభం మనః.
-- గీత. 2.60
'అను రీతి ఇంద్రియములు స్వాధీనము కానివిగ నుండినను--
తాని సర్వాణి సంయమ్య యుక్త ఆసీత మత్పరః,
వశే హి యస్యేంద్రియాణి తస్య ప్రజ్ఞా ప్రతిష్ఠితా.
-- గీత. 2.61.
నీకు సమర్పించునెడ నీవే శుద్ధపఱచెద నంటివి.
అనన్యచేతా స్సతతం యో మాం స్మరతి నిత్యశః,
తస్యాహం సులభః పార్థ నిత్యయుక్తస్య యోగినః.
-- గీత. 8.14
అంటిరి గాన వేఱుచింతలేక సదా హరిని చింతించెదను.
స్వామి : బ్రహ్మాదులు, నారదాదులు కూడ నా విషయమున భయ
ముతో వర్తించుచున్నారు. నీవు మిగుల నిర్భయముగ
మాటలాడుచున్నావు. కారణమేమి?
కుల : స్వామీ! నేను సమయమును జూచియే వేడుచున్నాను. నీ
మందహాసముతో గూడిన ముఖమును జూచి నిర్భయముగ
మాట్లాడ గలిగితిని. (భగవంతుని నవ్వుతో గూడిన వానిగా
ధ్యానింపు మని నారదుడు ధ్రువుని కుపదేశించెను). ఎవ్వరై
నను మిగుల నవ్వుచుండిరేని అత్యాశ్చర్యమున దేలుచుండు
నట్టి వారికి ఇతరుల మాట చెవికెక్కదు. నవ్వుకొంచెమయి
నను లేకుండు పక్షమున నేదో కోపముండుటచేత నితరులు
చెప్పుమాట వారి చెవికెక్కదు. మందహాసముతో నుండున
ప్పుడు మనఃప్రసాద కాలముగ నుండును. అదియే మిగుల
సంతోషకాలము. స్వామీ! నీ విట్లే మందహాసముతో నున్నా
డవు. కనుక నే నింత చనవుతో మాట్లాడుచున్నాను.
స్వామి : నా ముఖమున గల సంతోషమును జూచి యడుగునట్లు
చెప్పుచున్నావు. నేను సంతోషముఖమును జూపకుంటినేని
యెట్లడిగియుండవా?
కుల : స్వామీ! ప్రహ్లాదుడు నృసింహమూర్తిని జూచి "స్వామీ!
బాలుడను, అసురుడను. అందునను ద్వేషియొక్క పుత్తుఁ
డను. ఇట్టివాడనగు నాకు నిన్ను స్తోత్రము చేయుటకు
ఏమియు తెలియదు. బ్రహ్మాదులు మాత్రము నీ మాహా
త్మ్యము నెఱిగి స్తుతించినారా? ఏదో కొంత స్తోత్రముచే
యవలెనని చేయుదురు. వేదములకు నిన్ను పొగడతరమా?
కాన నిన్ను స్తుతించుటకు నేను అర్హుడనుగాను. చిన్నబిడ్డస్తో
త్రమునకు సంతసించుడు వని చేసితి" నని విన్నవించెను.
నేనును అట్లే సమయము చూచి స్తుతించినచో నీకృపారస
మును జూపుదు వని తలంచితిని.
స్వామి : శ్రీవల్లభేతి యను మొదటి శ్లోకము మొదలు విశేషముగ
స్తుతించుచున్నావు. నేను మిగుల ఘనుడనే యగుదునా?
కుల : స్వామీ! నీవు పరాత్పరుడవు.
देवनागरी-प्रतिलिप्यन्तरणम् (Devanagari Transliteration)
माट्लाड गलिगितिनि. (भगवन्तुनि नव्वुतो गूडिन वानिगा
ध्यानिंपु मनि नारदुडु ध्रुवुनि कुपदेशिंचेनु). एव्वरै
ननु मिगुल नव्वुचुंडिरेनि अत्याश्चर्यमुन देलुचुंडु
नट्टि वारिकि इतरुल माट चेविकेक्कदु. नव्वुकोंचेमयि
ननु लेकुंडु पक्षमुन नेदो कोपमुंडुटचेत नितरुलु
चेप्पुमाट वारि चेविकेक्कदु. मंदहासमुतो नुंडुन
प्पुडु मनःप्रसाद कालमुग नुंडुनु. अदिये मिगुल
संतोषक़ालमु. स्वामी! नी विट्ले मंदहासमुतो नुन्ना
डवु. कनक ने निंत चनवुतो माट्लाडुचुन्नानु.
स्वामि : ना मुखमुन गल संतोषमुनु जूचि यडुगुनट्लु
चेप्पुचुन्नावु. नेनु संतोषमुखमुनु जूपकुंटिनेनि
येट्लडिगियुंडवा?
कुल : स्वामी! प्रह्लादुडु नृसिंहमूर्तिनि जूचि "स्वामी!
बालुडनु, असुरुडनु. अंदुननु द्वेषियौक्क पुत्तुఁ
डनु. इट्टिवाड़नगु नाकु निन्नु स्तोत्रमु चेयुटकु
एमियु तेलियदु. ब्रह्मादुलु मात्रमु नी माहा
त्म्यमु नेऱिगि स्तुतिंचिनारा? एदो कोंत स्तोत्रमुचे
यवलेननि चेयुदुरु. वेदमुलकु निन्नु पोगडतरमा?
कान निन्नु स्तुतिंचुटकु नेनु अर्हुडनुगानु. चिन्नबिड्डस्तो
त्रमुनकु संतसिंचुडु वनि चेसिति" ननि विन्नविंचेनु.
नेनुनु अट्ले समयमु चूचि स्तुतिंचिनचो नीकृपारस
मुनु जूपुदु वनि तलंचितिनि.
स्वामि : श्रीवल्लभेति यनु मोदटि श्लोकमु मोदलु विशेषमुग
स्तुतिंचुचुन्नावु. नेनु मिगुल घनुडने यगुदुना?
कुल : स्वामी! नीवु परात्परुडवु.
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय,
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव.
नीवु अन्निटिकि पैवाडवु. परमु, परतरमु नीवे. नीकु पैवस्तुवु
लेदु. नीवु परत्वमुन आ रीतिग नुंडिननु सौलभ्यमुनु जूपुटकु
नन्दगोपतनयुडवै युन्नावु. वसुदेवुनि यॊद्दनुंडिन नी सौल
भ्यमुनु जूपुटकु सरिपडदनि यॆञ्चि नन्दगोपु निण्ट चेरि यतनिकि
तनयुड वैतिवि. परत्वसौलभ्यमुलन्दु निन्नु मिञ्चिनवारु लेरु.
स्वामि : ने निपुडु सौलभ्यमुनु जूपुटकयि मानुषरूपमुनु
धरिञ्चि युन्नानु. नित्यविभूतिनि विडिचि लीलाविभूतिकि
वच्चि युन्नानु. आ शरीरमुतो नुंडलेदु. नेनु सौलभ्य
मुने चूपुचुण्डुटचेत सौलभ्यमुने चर्पिम्पवलयुनु.
परत्वमु नॆत्लु चॆप्पनगुनु? दानिनि गूर्चि प्रशंसिम्पने
रादुगदा? ना रीतिकि तगिनट्लु गदा स्तुतिञ्चवलयुनु?
योचिम्पक "कृष्ण त्वदीय पदपङ्कज पञ्जरान्त मद्यैव
मे विशतु मानसराजहंसः" अण्टिवि.
कुल : स्वामि! योचिञ्चिये अट्लण्टिनि. नीवु नारदादि मुनि
बृन्द वन्दितुडवु.
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्या म्यनसूयवे,
ज्ञानं विज्ञानसहितं यद् ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्.
-- गीत. 9.1.
अन्नट्लु मूढुलु नि न्नवमतिन्तुरु.
अव्यक्तं व्यक्ति मापन्नं मन्यन्ते मा मबुद्धयः,
परंभाव मजानन्तो ममाव्यय मनुत्तमम्.
-- गीत. 7.24
५६ मुकुन्दमाला
तेलिविलेनिवारु नित्यण्डु, सर्वोत्तमुडु नगु नी परत्वरूपमु
नेऱुगरु. इपुडु पुट्टुट चेतने नीकु जन्ममु कलिगिन दनुकोन्दुरु.
शरीरमुनु गमनिञ्चु तेलिविलेनिवा रिट्लु तलचेदरु गानि निन्नु बागुग
नेऱिगि युण्डुवारिकि नी शरीरमुतो पनियेमि? नी कृष्ण रूपमुनु
दर्शिञ्चि महर्षुलु निन्नु सेविञ्चुचुन्नारु गदा! नारदुडु तऱुचग
वच्चि सेविञ्चिपोवुचुण्डलेदा? इन्द्रुडु कामधेनुवुतोड वच्चि दानि
क्षीरमुतो नी कभिषेकमु चेसि प्रार्थिञ्चि पोलेदा?
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्,
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे.
-- गीत. ४.८
प्रतियुगमुनन्दुनु दुष्टशिक्षणमु, शिष्टपरिपालनमु चेसि धर्म
मुनु स्थापिञ्चुटकु अवतरिञ्चेदननि चेप्पिनट्टिवाडवु गदा! नेनु नी
विषयमयि कोन्नि गुऱुतुलु कनिपेट्टियुन्नानु. भक्तुलु निर्भय
मुगवच्चि आश्रयिञ्चुटकु ई रूपमुनु धरिञ्चितिवि ("परात्परं
नारदादि मुनिबृन्दवन्दितम्" अनि परात्परमुनकु प्रक्क नारदादि
मुनिबृन्दवन्दितमनि चेप्पुटचेत स्वामियोक्क परात्परत्वमुनकु नार
दादुलु साक्षुलनि तेलियुचुन्नदि. एटुलन, श्रीकृष्णमूर्ति आवुलनु
मेपुचुण्डिनपुडु नारदादुलु वच्चि नमस्करिञ्चुचुण्डिरि. स्वामि
परात्परुडु काडेनि वारिट्लु नमस्करिञ्चियुन्दुरा?).
९
करचरणसरोजे कान्तिमन्नेत्रमीने
श्रममुषि भुजवीचिव्याकु लेऽगाधमार्गे,
हरिसरसि विगाह्यापीय तेजोजलौघं
भवमरुपरिभिन्नः खेद मद्य त्यजामि.
ముకుందమాల 57
భవ=సంసారమనెడి, మరు=నీళ్లు లేనిచోట తిరుగుటచేతను, పరి
ఖిన్నః=డస్సినట్టి (అహం=దాసుడనైన నేను), కరచరణసరోజే=చేతులు,
కాళ్లు అను కమలములు గలదియు, కాంతిమత్=కాంతిగల, నేత్ర=కన్ను
లనెడి, మీనే=చేపలు గలదియు, శ్రమముషి=బడలికను పోగొట్టున
దియు, భుజ=చేతులనెడి, వీచి=అలలచేత, వ్యాకులే=కలగినదియు, అగా
ధమార్గే=లోతైన త్రోవగలదియు నగు, హరిసరసి=శ్రీమహావిష్ణువనెడి కొల
నిలో, విగాహ్య=ప్రవేశించి, తేజో జలౌఘం=తేజస్సనెడు జలసమూహ
మును, ఆపీయ=మెండుగా పానముచేసి, ఖేదం=బడలికను, అద్య=ఇప్పుడే,
త్యజామి=విడుచుచున్నాను.
సంసారమను మరుకాంతారమున బడి శ్రమచెందిన నేను పాణి
పాదము లనెడు పద్మములు గలదియు, మనోహరములగు నేత్రము
లనెడు చేపలు గలదియు, శ్రమను బోగొట్టునదియు, భుజములనెడి యల
లచే వ్యాకుల మయినదియు, అగాధంబు నగు హరియనెడి సరస్సునందు
ప్రవేశించి కాంతి యనెడి యుదకము ద్రావి యిపుడే ఖేదమును విడిచెదను.
స్వామి : నిన్నుజూడ మిగుల పరితపించువాని భంగి తోచెడిని. నీకు
ప్రాప్తించియున్న కష్టమేదో తెలిపెదవా?
కులశేఖరుడు : చెట్లు, జలములేని ఎడారిభూమిలో బడిన నేను మిగుల
తపించిపోవుచున్నాను.
స్వామి : అది యే స్థలము?
కుల : సుఖలేశ మయినను లేనట్టిదియును, కష్టమే కలిగియుం
డునట్టిదియును అగు సంసారమే ఆ స్థలము. దానియం
దుబడి తపించునట్టి నేను తపనచేత శ్రమపడుచున్నాను.
స్వామి : అటులయిన నిపుడేమి చేయబోవుచున్నావు?
కుల : మహోతాపముతో అల్లాడువాడు సరస్సు చిక్కునేని మును
గకుండునా?
देवनागरी-प्रतिलिप्यन्तरम् (Devanagari Transliteration):
मुकुन्दमाल 57
भव=संसारमनेडि, मरु=नीळ्लु लेनिचोट तिरुगुटचेतनु, परि
खिन्नः=डस्सिनट्टि (अहं=दासुडनैन नेनु), करचरणसरोजे=चेतुलु,
काळ्लु अनु कमलमुलु गलदियु, कान्तिमत्=कान्तिगल, नेत्र=कन्नु
लनेडि, मीने=चेपलु गलदियु, श्रममुषि=बडलिकनु पोगोट्टुन
दियु, भुज=चेतुलनेडि, वीचि=अललचेत, व्याकुले=कलगिनदियु, अगा-
धमार्गे=लोतैन त्रोवगलदियु नगु, हरिसरसि=श्रीमहाविष्णुवनेडि कोल-
निलो, विगाह्य=प्रवेशिञ्चि, तेजो जलौघं=तेजस्सनेडु जलसमूह-
मुनु, आपीय=मेण्डुगा पानमुचेसि, खेदं=बडलिकनु, अद्य=इप्पुडे,
त्यजामि=विडुचुचुन्नानु.
संसारमनु मरुकान्तारमुन बडि श्रमचेन्दिन नेनु पाणि-
पादमु लनेडु पद्ममुलु गलदियु, मनोहरमुलगु नेत्रमु-
लनेडु चेपलु गलदियु, श्रमनु बोगोट्टुनदियु, भुजमुलनेडि यल-
लचे व्याकुल मयिनदियु, अगाधंबु नगु हरियनेडि सरस्सुनन्दु
प्रवेशिञ्चि कान्ति यनेडि युदकमु द्रावि यिपुडे खेदमुनु विडिचेदनु.
स्वामि : निन्नुजूड मिगुल परितपिञ्चुवानि भंगि तोचेडिनि. नीकु
प्राप्तिञ्चियुन्न कष्टमेदो तेलिपेदवा?
कुलशेखरुडु : चेट्लु, जलमुलेनि एडारिभूमिलो बडिन नेनु मिगुल
तपिञ्चिपोवुचुन्नानु.
स्वामि : अदि ये स्थलमु?
कुल : सुखलेश मयिननु लेनट्टिदियुनु, कष्टमे कलगियुं-
डुनट्टिदियुनु अगु संसारमे आ स्थलमु. दानियं-
दुबडि तपिञ्चुनट्टि नेनु तपनचेत श्रमपडुचुन्नानु.
स्वामि : अटुलयिन निपुडेमि चेयबोवुचुन्नावु?
कुल : महोतापमुतो अल्लाडुवाडु सरस्सु चिक्कुनेनि मुनु-
गकुण्डुना?
५८ मुकुन्दमाल
स्वामि : निजमु. नी वे सरस्सुनन्दु मुनुगबोवुचुन्नावु?
इत्लु महोतापमुचे तपिम्पबडुचुण्डु नीवु नायो
द्दकु वच्चि तरलिपोक आलस्यमु चेयुचुन्नावु.
कुल : स्वामी! नेनु मुनुग दलचिन स्थलमु नीवे. हरियनु
सरस्सुन मुनिगेदनु.
स्वामि : सरस्सुनन्दु तामर लुण्डवा? नायं दे तामर
लुन्नवि?
कुल : नी कर चरणमु लनुनविये सरोजमुलु.
स्वामि : नीटियन्दु चेपलुण्डवा?
कुल : कान्तिगल नी कन्नुले आ चेपलु.
स्वामि : कोलनिलो मुनिगिनवानिकि श्रम परिहार मगुनु. नीकु
नावलन ए तापमु तीरुनु?
कुल : इतर जलमुलन्दु स्नानमु चेयुटचेत तत्काल
तापहर मगुनु. श्रममुषि=ई सरस्सुनन्दु ओक्क
पर्य़ायमु मुनिगिननु सकलसांसारिक दुःखमु
अनुनट्टि तापमु नटुमाय मगुनु.
स्वामि : अल लुण्डवलदा?
कुल : साधारणमयिन सरस्सुलकु परिमाणमुण्डुनु.
श्वासनु बन्धिञ्चि लोपल प्रवेशिञ्चुनट्लैन दानि
लोतुनु कनुगोन नगुनु. हरिसरस्सुयोक्क लोतुकु
मुगिम्पु तेलियदु. तमकु भगवन्तुनि लोतु तेलि
यदनि वेदमूले चेप्पुचुन्नवि. वेदपुरुषुडु भग
वन्मार्गमुनु वेदकुचुण्डियु तेलिसिकोनलेदु. वानि
मार्गमु अगाधमु. गट्टुतेलियदु. मन वल्लकादनि
निलुववलयुनु गानि दानिकि मुगिम्पुलेदु. गरुडुडु
आकसमुन बोयि मरल तिरिगिवच्चेनेनि मीद निंकनु
२. द्वितीय भाग: संसार-वैराग्य, चरण-कमल अनुराग एवं आत्म-निवेदन (श्लोक १६-३०)
मुकुन्दमाल ५९
आकाशमु लेदनि अनुकोननगुना? पक्षुलु तम तम
योग्यता कोलदि येगुर गलवु. इट्टि अगाध मयिन
हरिसरस्सुन मुनिगि स्नानमाचरिञ्चेदनु.
स्वामि : सरस्सुन जलमुण्डवलदा?
कुल : वेदमुलन्दु निरूपिम्पबडिन नी कल्याणगुणमुलनेडु
तेरोजल मुन्नदि. दानिनि त्रागेदनु. अटुलु त्रावि
आध्यात्मिकाधिभौति काधिदैविकमु लनु तापत्रयमुनु
बासेदनु.
प्रसादे सर्वदुःखानां हानि रस्योपजायते,
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति.
-- गीत. २.६५
अनुनत्लु आ जलमुनु त्राविन पिम्मट संसारमुनु विडिचि
नित्यमुक्तुलोतोड गूडि यानन्दिम्पवलयुनु.
स्वामि : अटु लयिन मुनिगि त्रागितिवा? तापमु तीरेना?
कुल : आहा! मुनिगितिनि. तापमु तीरिनदि.
स्वामि : अटुलयिन लेचिपोम्मु.
कुल : श्रम परिहारमैनगदा लेचिपोवुटु? (अनगा तनिवि तीऱले
दनि भावमु).
10
सरसिजनयने सशङ्खचक्रे
मुरभिदि मा विरम स्वचित्त रन्तुम्,
सुखतर मपरं न जातु जाने
हरिचरणस्मरणामृतेन तुल्यम्.
60 ముకుందమాల
స్వచిత్త = ఓమనసా, సరసిజనయనే = కమలమునుబోలిన కన్నులు గల
వాదును, సశంఖచక్రే = శంఖచక్రములతో గూడినవాడును అగు, ముర
భిది = మురాంతకుడయిన శ్రీమహావిష్ణువునందు, రంతుం = విహరించు
టకు, మా విరమ = వెనుదీయకుము, హరి = విష్ణువుయొక్క, స్మరణ = సంకీ
ర్తనమనెడు, అమృతేన = అమృతముతో, తుల్యం = సమానమయిన, సుఖ
తరం = మిక్కిలియానందమును గలుగజేయునట్టి, అపరం = మఱియొక వస్తు
వును, జాతు = ఒకప్పుడును, న జానే = గుర్తెఱుగను.
ఓ మనసా! పద్మములవంటి కన్నులుగలవాడును, శంఖచక్రములు
గలవాడును నగు మురహరుని యందు రమించుటకు వెనుదీయకుము.
హరిచరణస్మరణమనెడి అమృతముతో సమానమైన మిక్కిలి యానందమును
గలుగుజేయు మఱియొక వస్తువును ఒక కాలమందును ఎఱుగను.
అంతిమస్మరణ కలుగుటకుగాను సదా తలచుచుండు మని భగవం
తుడు కులశేఖరుల నాజ్ఞాపింపగా, వారు 8వశ్లోకమున “చింతయామి
హరిమేవ సంతతమ్” = హరినే సదా తలచెదనని చెప్పియుండిరి.
ధ్యానము మనసుచేత కావలసిన కార్యముగాని శరీరముతో చేయున
దిగాదు.
తత్రైకాగ్రం మనః కృత్వా యతచిత్తేంద్రియక్రియః,
ఉపవిశ్యాసనే యుంజ్యాద్ యోగ మాత్మవిశుద్ధయే.
-- గీత. 6.12
సంకల్పప్రభవాన్ కామాన్ త్యక్త్వా సర్వానశేషతః,
మనసైవేంద్రియగ్రామం వినియమ్య సమంతతః.
-- గీత. 6.24
శనై శ్శనై రుపరమే ద్బుద్ధ్యా ధృతిగృహీతయా,
ఆత్మసంస్థం మనః కృత్వా న కించిదపి చింతయేత్.
-- గీత. 6.25
अन्न श्लोकमुलन्दु संचरिञ्चु मनसुनु वशपरचुकोनि इतर
मुनु चिन्तिम्प रादु. संकल्पजन्यविषयमुल नन्निंटिनि निश्शेषमुग
मनसु चेत वदलि इन्द्रिय समूहमुनु नलुप्रक्कलनण्डि शब्दादिवि
षयमुलनुण्डि मनसुचेत निवर्तिम्पजेसि मेल्लमेल्लग विवेकयुक्तमयिन
बुद्धिचेत आत्मकण्टे वेरु विषयमुल नुण्डि विरमिञ्चि मनस्सुनु
आत्मयन्दु निलिपि पिम्मट मरिदेनिनि चिन्तिम्पकुण्डवलयुननि चेप्प
बडिनदि.
स एवायं मयातेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः,
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्.
-- गीत. 4.3
नीवु ना भक्तुडवु, सखुडवु अनि श्रीकृष्णमूर्ति अर्जुनुनितो चेप्पेनु.
अट्टि भगवत्संबन्धमुगल अर्जुनुडु--
चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्,
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्.
-- गीत. 6.34
"कृष्णा! मनसु चंचलमैनदि. बलात्कारमुग हरिंचुनट्टिदि.
अधिकबलमु गलदि. कनक दानिनि त्रिप्पुट गालिनि त्रिप्पुटवले असाध्य"
मनि चेप्पेनु.
श्रीकृष्ण भगवानु डैननु मनसु साधारण मयिनदनि चेप्पेना?
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्,
अभ्यासेन तु कौंतेय वैराग्येण च गृह्यते.
-- गीत. 6.35
महाबाहू! अंदुकु संदेहमु लेदनिचेप्पेनु. इट्टि मनसुतो
सारिने सदा तलचुटकु वीलगुना? कुलशेखरुलु तामु "चिंतयामि
62 ముకుందమాల
హరిమేవ సంతతమ్” అని చెప్పినది పొరపాటని తలచిరి. అట్లు తలచి మన
సుతో జరుగవలసిన కార్యముగాన దానిని వేడుకొనుట కర్తవ్యమని యెంచి
ఇట్లు ప్రార్థించిరి.
కులశేఖరులు: ఓ మనసా! స్వామితో చెప్పితిని. నా మానమును
కాపాడుము. నీవు పలుచోట్ల తిరుగుచుంటివేని నాకు
గత్యంతరము లేదు.
ఉద్ధరేదాత్మనాత్మానం నాత్మాన మవసాదయేత్,
ఆత్మైవ హ్యాత్మనో బంధు రాత్మైవ రిపు రాత్మనః.
-- గీత. 6.5
అనునట్లు నీవు నాకు బంధువుగ నున్నావు.
న రూప మస్యేహ తథోపలభ్యతే
నాంతో న చాదిర్న చ సంప్రతిష్ఠా,
అశ్వత్థమేనం సువిరూఢమూల
మసంగశస్త్రేణ దృఢేన ఛిత్వా.
-- గీత. 15.3
శ్రోత్రం చక్షు స్పర్శనం చ రసనం ఘ్రాణమేవ చ,
అధిష్ఠాయ మనశ్చాయం విషయా నుపసేవతే.
-- గీత. 15.9
అనునట్లు నీవు నేను పోవు స్థలము లన్నింటికిని వచ్చు బంధువుగ
నున్నావు. (అనగా నే నే జన్మ మెత్తినను నీవును వచ్చుచుందువు.
నిన్ను నమ్మియే 'చింతయామి' అంటిని. నిన్ను భగవంతుని యొద్ద విడిచి
పెట్టెదను. నీవచ్చటనే నిల్చి యుండుము).
మనస్సు : నీవు చెప్పునట్లు వర్తించుటకు చూచెదను. నీవు విడిచిన
చోటు నాకు సుఖముగ నుండెనేని అందే నిలిచెదను. లేని
పక్షమున మఱియొక చోటి కేగెదను.
मुकुन्दमाला ६३
कुल : मनसा! अटु लनकुमु. नीकु सुखमु तेलियदु. रुचि
तेलियदु. अन्दुचेत परुगेत्तजूचुचुन्नावु. नेनु
निन्नु निर्बन्धिञ्चि कूर्चुण्डबेट्टेदनु; कदलकुण्डुमु. ओक
चिन्न उद्योगस्थुडु गोप्प युद्योगमुनु गोरि यजमा
नुनि दय सम्पादिञ्चुटकै कౙ్జिकाय लनु भक्ष्यमुलनु
यजमानुनि किच्चेनु. अत डेन्नडु वाटिनि भक्षिञ्चिनवाडु
कानन्दुन दानि कोननु कोरिकि चूचि उप्पु कारमु तीपि
मोदलगु ने रसमुनु लेनन्दुन कोपगिञ्चुकोनि तन का
तिनुबण्डमु लिच्चिनवानि नुद्योगमु नुण्डि तोलगिञ्चेनु.
आ तिनुबण्डमु चूचुटकु मात्रमु अन्दमुग नुण्डि
नन्दुन दानि नेत्ति बीरुवायम् दुञ्चियुण्डि रेण्डु
मूडु दिनमुलु गडुवगने दानिलोपल ए मुन्नदो चूत
मनि विप्पि लोपल पूर्णमुण्डुटनु जूचि, कोन्त नोट
वेसि कोनि, दानि रुचिकि सन्तोषिञ्चि दानि निच्चिनवानिगति
नधोगति पालुचेसि नन्दुलकै चिन्तिञ्चि वानिनि पिलिपिञ्चि
मुनुपटिकण्टेनु गोप्प युद्योग मिप्पिञ्चि मन्निञ्चेनु.
वेदमु योक्क पैभागमुनु कोरिकिन मनकु रुचितेलियदु. नार
दादुलु लोपल प्रवेशिञ्चि रुचिचूचिनवारु. वारिके आ रुचि तेलियुनु.
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी,
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः.
-- गीत. २.६९
पैश्लोकमट्लु एल्लवारु प्रेमिञ्चु विषयमुलु ब्रह्मज्ञानिकि पट्टवु.
आ विषयमु लतनिकि रात्रि. इतरुलकु पट्टनि आत्मविषय मतनिकि
पट्टुनु. अदि यतनिकि पगलु.
64 मुकुन्दमाल
(मनसा! एमि चेयुटकै वेडलिपोवुचुन्नावु? सुखमु लेनि
तावुल संचरिंचेदवु. सुखमुंडु चोट निलुववु. उपनिषत्तु लंदु
जेप्पबडिन भगवत्कल्याणगुणमु लनेडु तेनेनु पानमु चेयरादा?
निन्नु ईड्चि यीड्चि तेवलसिन ట్లున్నदि (त्लुन्नदि). निन्नु बागुग कूर्चुंड बेट्टिननु
नीवु मऱियु परुगेत्ति पोवुचुन्नावु. अट्लुपोयिननु सरियैन
स्थलमुनकु पोयितिवा? परधन परदार परगृहमुलनु अपहरिंचु
विषयमुन जोच्चेदवु. ने नुंचिन स्थलमुनं दुंडि यनुभविंचि
चूचितिवेनि नीकु रुचि तेलियुनु. नीवु पोरानिचोटुलकु बोयिननु
नी का वस्तुवुलु लभिंचेना? नी गति परितापकरमुग नुन्नदि. तुदकु
नीवु चेडि नन्नुनु चेऱचेदवु. नीवु पदिलमुग नुंडुनेड मन
मिरुवुरमुनु सुखपडवच्चुनु गदा अनि योक goप्प (गोप्प) योगीश्वरडु
मनसुनु गूर्चि चेप्पेनु.)
आ या कारणमुलचेत मनसा! स्वामिनि अनुभविंचुटनु मान
कुमु. विडिचिपोक निलुवुमु.
मनस्सु : अट्लैन नीवु चेप्पु स्थलमुलो सुखमु गलदा? अट्लु
निजमुग सुखमुंडु पक्षमुन ने नक्कडे निवसिंचेदनु.
कुल : मनसा! आ शृंगार मेमनि वर्णिंतुनु. सर्वेन्द्रिय
मुललो नयनमु प्रधानमयिनदि कदा! आ सर्वेश्व
रुनि योक्क कन्नुलु तामरपुष्पमुलवले अंदमुग
नुन्नवि.
मनस्सु : ओहो! अंत शृंगारमा? अटुलयिन तृप्तिपोंदि
तिनि. मऱियोक संगति गलदु. ने नचट वसिंचु
नपुडु दुष्टमुलैन इन्द्रियमुलु वच्चि न न्नीड्चुको
निपोवुनु. नेनु वानिवेंट बोदुनु. वानिनि शिक्षिंचि
दूरमुग तऱिमि नन्नु कापाडुकोनु पक्षमुन नेनु
अच्छटने युंदुनु. लेकुन्न निन्द्रियादुलतोड पोवु
ముకుందమాల 65
దును. నీవు చెప్పెడు స్థలము నాకు రక్షకమైన దేనా?
కేవలము అందము మాత్రమే యుండి ప్రయోజనమేమి?
కుల : మనసా! కేవలసౌందర్యవిగ్రహుడై యుండిన నే నట్లు
చెప్పెదునా? అతడు శంఖచక్రములను ధరించియు
న్నాడు. అతని చక్రము లోకమునే కాల్చును. అతని
శంఖధ్వనిని వినిన యెడల పదునాల్గులోకములు భయ
పడును. దుష్టులను పలాయితుల గావించుటకు అతని
యొద్ద శంఖచక్రము లున్నవి.
మనస్సు : శంఖచక్రము లున్నవని చెప్పుచున్నావు. చిత్రమున లిఖింప
బడిన స్వామికి గూడ శంఖచక్రము లున్నవి. వానివలన
ప్రయోజనమేమి? నీవు చెప్పు ఆయుధములు చిత్రలిఖిత
మైన వానియట్లు పనిచేయకుండునా? లేక ఉపయోగప
డునా?
కుల : సమయము తటస్థించినపు డవి శత్రునిరసనము గావిం
చుచుండును.
మనస్సు : ఎవ్వరి నైనను హతము గావించెనా?
కుల : నరకాసురుని మిత్రుడును, ఐదుతలలు గలవాడును అగు
మురాసురుని చంపెను.
మనస్సు : ఏమో! నీ మాట విని ప్రవేశించితిని. నాకేమో సుఖము
తెలియదు. సుఖము గలుగునా?
కుల : మనసా! నీవు ప్రవేశించియుండు స్థలమునకంటెను
మించిన స్థలముండనేరదు.
మనస్సు : ఏదేని మంచివస్తువును భుజించినను లేక మంచివస్తువు
యొక్క సంగతి వినినను ఇట్లే అనేక విషయములచేత
కలుగు సుఖములను బోలియుండునా నీవు చెప్పుసంగతి?
కుల : నీవు చెప్పనవి సుఖములని తోచినగదా వానివలెనుండు
నని చెప్పగలను. సుఖమన నేను చెప్పనది యొక్కటే
6
सुखमनि नाकु तोचुचुन्नदि. नामाट विनि प्रवे
शिंपुमु. पिम्मट तेलियुनु. नीवडिगिन दानिकि
बदुलु दीनिवले दानिवले नुंडुननि नेनु चॆप्पुपक्षमुन
नीवुनु अट्लैयुंडुननि तलंतुवु. पिम्मट नीवु
हरिचरण ध्यानमु चेसितिवेनि आ यमृतमुतो
नितरमुनु साटिपेद्दितिवे, अट्लु चेयवच्चुना यनि
वादमु चेयुदुवु. अन्दुचेत अनुभविंचिन नीके
तेलियगलदु.
मनस्सु : दानि स्वारस्यमु तेलिसिनने गदा?
कुल : आ सुखमु नारदादुलके तेलियुनु. नामाट
मात्रमे नम्मवलदु. नारदादुल नडिगिन चॆप्पुदुरु.
अन्दु अंत सुखमु लेकुन्न वारट्लु संबंधपडु
दुरा?
मनस्सु : दीनिवले दानिवले नुंडुना यनि ने नडुगनु. नीवे
बागुग योचिंचि येदैन नॊक्क वस्तुवुनकु बोल्चि
यी विधमुग नुंडुननि चॆप्पुमु.
कुल : दानितो सरियगु वस्तुवुंडिन गदा चॆप्पगलनु? सर्वें
द्रियमुलकुनु सुखमु गलिगिंचुनट्टि दिव्यवस्तु वदि.
दानितो समानमैनदि वेटॊक्कटि लेदु. ना माट
नम्मुमु. ना माट विनुमु. निन्नु नम्मिये गदा
“चिंतयामि हरिमेव संतत” म्मंटिनि.
11
मा भी र्मंदमनो विचिंत्य बहुधा यामीश्चिरं यातना
नामीनः प्रभवंति पापरिपव स्स्वामिननु श्रीधरः,
आलस्यं व्यपनीय भक्तिसुलभं ध्यायस्व नारायणं
लोकस्य व्यसनापनोदनकरो दासस्य किं न क्षमः.
ముకుందమాల 67
మందమనః=ఓ మూఢమైన మనసా, యామీః=యముని సంబంధ
మైన, బహుధా=అనేకవిధములైన, యాతనాః=నరకబాధలను, చిరం=బహు
కాలము, విచింత్య=తలంచి, మా భీః=భయపడవద్దు. అమీః=ఈ, పాప
రిపవః=పాపములనెడు శత్రువులు, నః=మనకొఱకు, న ప్రభవంతి=సమ
ర్థములుకావు. శ్రీధరః=విష్ణువు, నః=మనకు, స్వామినను=శేషిగదా,
ఆలస్యం=జాగుచేయుటను, వ్యపనీయ=పోగొట్టి, భక్తిసులభం=భక్తిచేత సులు
వుగా పొందదగిన, నారాయణం=విష్ణువును, ధ్యాయస్వ=ధ్యానముచే
యుము. లోకస్య=ప్రపంచమందలి జనులయొక్క, వ్యసన=దుఃఖము
లయొక్క అపనోదన=పోగొట్టుటను, కరః=చేయునట్టి (సః=నారాయణ
మూర్తి), దాసస్య=భక్తునియొక్క (వ్యసనాపనోదకరణే=వ్యసనమును పోగొ
ట్టుటయందు) న క్షమః కిం=సమర్థుడు కాడా యేమి?
ఓ మందమనమా! యమయాతనలను పలుతెఱగుల భావించి భయ
పడకుము. ఈ శత్రువులు మనల నేమియు చేయలేరు. శ్రీధరుడుగదా
మనకు స్వామి! భక్తిసులభుడగు శ్రీమన్నారాయణుని ఆలస్యము చేయక
ధ్యానింపుము. లోకములవ్యసనములను పోగొట్టువాడు దాసుని వ్యసనమును
పోగొట్టలేడా?
(కులశేఖరులు భగవంతునితో సంబంధపడుమనియు, అచటజేరిన
సౌఖ్యము గల్గుననియు, శత్రువులు వచ్చి బాధింప రనియు మనస్సునకు
బోధించగా దానికి కొంతధైర్యము గలిగెను. కాని సంపూర్ణమైన నమ్మిక
కలుగలేదు. అందుచేతనే కులశేఖరుల నిట్లడిగినది.)
మనస్సు : నేను మిగుల దుష్టుడను. నన్ను నమ్మిన యెడల
నీవు కుంభీపాకమున కూలవలసినదే. చెడియున్న నాకు
సుఖము లేదు. అంత మాత్రమే గాక భయముగను
నున్నది. నన్ను నమ్మిన నీవు నరకమునకు బోవుచుండగా
నేనును నీతోడ రావలసినదే గదా!
68 ముకుందమాల
కులశేఖరులు: మనసా! నాకు నరకము గల్గినగదా నీవును నరకమునకు
బోవలయును? నేను పోవుస్థలములందు నీవు సుఖప
డుదువు. నన్ను నమ్మియుండు "వీడు చెడును; అతని
తోడ నేనును చెడుదునే"యని భయపడకుము.
మనస్సు : నన్ను నమ్మియుండు నీవు సుఖపడుదువని నే నెంచలేదు.
కుల : కొంచెమైనను జ్ఞానములేని మనసా! ఇతడు చేర్చు
స్థలమున చేరిన సుఖపడవచ్చును. ఇతడు చెప్పు
నది హితవని తలంపరాదా? అనేక యమయాతనలను
దలచి భయపడకుము. బాగుగ యోచింపుము. నేను
ని న్నెవని యొద్దకు బొమ్మనుచున్నానో ఆ ప్రభువును
గూర్చి యోచించితివేని భయముండదు.
మనస్సు : నేను మీయొక్క మనసైయున్నాను. నావలననే ప్రతి
కార్యమును జరుగవలసియున్నది. నాయందు మీకు
ప్రీతి గలదు. మన యిరువురకు స్థలము కావలసియు
న్నది. నాకు ధైర్యము చెప్పుచున్నారు మీరు. నన్ను
పంపిన స్థలము మంచిదని మీరు తలచితిరి. అన్నియును
సరే. నన్ను నరకమున ద్రోయుటకు వేచియున్నారే.
కుల : అట్టివారెవరు?
మనస్సు : కామక్రోధాదులు అనేక జన్మార్జితపాపములు అను నా
శత్రువులు నరకమున ద్రోయుటకు యత్నింపుదురే. అవి
యడ్డిననెట్లు?
కుల : మనసా! ఆ ప్రభువు నాశ్రయించినచో పాపములు
సమీపమునకు వచ్చునా? భగవచ్చరణారవిందమను పోలీ
సుస్టేషను లోనికిపోయి చేరిన పిమ్మట చోరులవలన
భయమేల కల్గును? కాననీవు ఈ యల్పశత్రువులను
గూర్చి భయపడనవసరము లేదు. నీవు చెప్పునట్టి శక్తి