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सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

८२ मुहूर्त्तचिन्तामणि
(कन्यानां) पञ्चमात् ओजमासे समृदुलघुचरैः स्थिराख्यैः नक्षत्रैः बालकान्नाशनं
सत् ॥ १७॥
चौथि, नवमी, चतुर्दशी, परीवा, षठि, एकादशी, अष्टमी, अमावास्या
और द्वादशी तिथि को छोड़ अन्य तिथियों में; शनैश्चर, मंगल, रविवार
को छोड़ अन्य दिनों में; जन्मराशि वा जन्मलग्न से आठवीं राशि, आठवाँ
नवांश; मीन, मेष और वृश्चिक को छोड़ अन्य लग्न में; तीनों उत्तरा,
रोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभि-
जित्, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिष नक्षत्र में; छठे मास
से लेकर सम मासों में अर्थात् छठे, आठवें, दशवें इत्यादि मासों में बालकों
का और पाँचवें मास से लेकर विषम मासों में अर्थात् पाँचवें, सातवें, नवें,
इत्यादि मासों में कन्याओं का अन्नप्राशन शुभ होता है सो भी शुक्लपक्ष में
और दोपहर से पूर्व होना चाहिए ॥ १७॥
अन्नप्राशन के लिये लग्नशुद्धि
केन्द्रत्रिकोणसहजेषु शुभैः खशुद्धे
लग्ने त्रिलाभरिपुगैश्च वदन्ति पापैः ।
लग्नाष्टषष्ठरहितं शशिनं प्रशस्तं
मैत्राम्बुपानिलजनुर्भमसच्च केचित् ॥ १८ ॥
अन्वयः—शुभैः केन्द्रत्रिकोणसहजेषु (स्थितैः) खशुद्धे लग्ने त्रिलाभरिपुगैः पापैः,
लग्नाष्टषष्ठरहितं शशिनं (अन्नाशने) प्रशस्तं वदन्ति। केचित् मैत्राम्बुपानिलजनुर्भं
असत् वदन्ति ॥ १८ ॥
लग्न से पहिले, चौथे, सातवें और तीसरे स्थान में शुभ ग्रह हों; दशवें
स्थान में कोई ग्रह न हो; तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रह हों और
लग्न, आठवें और छठे स्थान को छोड़ अन्य स्थानों में चन्द्रमा स्थित हो,
ऐसे लग्न में अन्नप्राशन शुभ होता है। कोई आचार्य अनुराधा, शतभिष
और जन्मनक्षत्र को अन्नप्राशन में अशुभ कहते हैं ॥ १८॥
अन्नप्राशन मुहूर्त्त में ग्रहों का फल
क्षीणेन्दुपूर्णचन्द्रेज्यज्ञभौमार्काकिभार्गवैः ।
त्रिकोणव्ययकेन्द्राष्टस्थितैरुक्तं फलं ग्रहैः ॥ १९ ॥
भिक्षाशी यज्ञकृद्दीर्घजीवी ज्ञानी च पित्तहक ।
कुष्ठी चान्नक्लेशवातव्याधिमान्भोगभागिति ॥ २० ॥