सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 207 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 196

विवाहप्रकरण १८७
लग्नोपगः स गमने जयदोऽथ भूप-
योगैर्गमो विजयदो मुनिभिः प्रदिष्टः ॥ ४८ ॥
अन्वयः—स्वजन्मसमये यः राशिः शुभसंयुतः, यः स्वारिभात् निधनगः, अपि च
यः वेशिसंज्ञः स लग्नोपगः जयदः (स्यात्) । अथ भूपयोगैः गमः मुनिभिः विजयदः
प्रदिष्टः ॥ ४८ ॥
यात्रा करनेवाले के जन्मकाल में जो राशि शुभ ग्रहों से संयुक्त हो, अथवा
जो राशि शत्रु की जन्मराशि से या जन्मलग्न से आठवीं हो, अथवा जो
राशि वेशिसंज्ञक अर्थात् सूर्य से दूसरे स्थान में हो, इन तीनों में से जो
राशि लग्न में हो वह यात्रा में विजय देनेवाली होती है । अथवा जातक में
कहे हुए राजयोगों में जो यात्रा होती है उसे भी मुनियों ने विजय देनेवाली
कही है ॥ ४८ ॥
दिशाओं के स्वामी
सूर्यः सितो भूमिसुतोऽथ राहुः शनिः शशी ज्ञश्च बृहस्पतिश्च ।
प्राच्यादितो दिक्षु विदिक्षु चापि दिशामधीशाः क्रमशः प्रदिष्टाः ॥ ४९ ॥
अन्वयः—अथ सूर्यः, सितः, भूमिसुतः, राहुः, शनिः, शशीः, ज्ञः च बृहस्पतिः, दिक्षु,
विदिक्षु अपि च प्राच्यादितः दिशां प्रदिष्टाः ॥ ४९ ॥
सूर्य, शुक्र, मंगल, राहु, शनैश्चर, चन्द्रमा, बुध और बृहस्पति ये आठ
ग्रह क्रम से पूर्वादि दिशाओं के तथा कोणों के स्वामी कहे गये हैं ॥ ४९ ॥
दिक्स्वामिचक्र

पू०आ०द०नै०प०वा०उ०ई०
सूर्यशुक्रमंगलराहुशनिचन्द्रबुधगुरु
दिगीश कहने का प्रयोजन
केन्द्रे दिगधीशे गच्छेदवनीशः ।
लालाटिनि तस्मिन्नेयादरिसेनाम् ॥ ५० ॥
अन्वयः—दिगधीशे केन्द्रे अवनीशः गच्छेत् । तस्मिन् [दिगधीशे] लालाटिनि
(सति) अरिसेनां न इयात् ॥ ५० ॥
जिस दिशा को यात्रा करनी हो उस दिशा का स्वामी यदि केन्द्र में
स्थित हो तो राजा यात्रा करे और यदि दिशा का स्वामी लालाटिक योग-
कारक हो तो राजा शत्रु की सेना पर चढ़ाई न करे ॥ ५० ॥
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक) · पृष्ठ 196, कुल 207 में से · SarvaKosh