मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयात्राप्रकरण १८५
कालविशेष में शुक्रदोषाभाव तथा अस्तादिविचार
यावच्चन्द्रः पूषभात्कृत्तिकाद्ये पादे शुकोऽन्धो न दुष्टोऽग्रदक्षे ।
मध्ये मार्गं भार्गवास्तेऽपि राजा तावत्तिष्ठेत्सम्मुखत्वेऽपि तस्य ॥ ४२ ॥
अन्वयः—पूषभात् कृत्तिकाद्ये पादे यावत् चन्द्रः (तिष्ठति) तावत् शुक्रः अन्धः
(भवति तदा) अग्रदक्षे दुष्टः न (भवेत्), मध्ये मार्गं अपि भार्गवास्ते अपि वा तस्य
सम्मुखत्वे राजा तावत् तिष्ठेत् ॥ ४२ ॥
जब तक चन्द्रमा रेवती से लेकर कृत्तिका के पहिले चरण तक रहता है
तब तक शुक्र अन्धा रहता है । इस कारण सम्मुख व दाहिने दोषकारक
नहीं होता । कदाचित् मार्ग ही में शुक्र अस्त हो तो राजा को चाहिए कि
जब तक फिर उदित न हो तब तक वहीं टिका रहे और उदित होने पर भी
यदि सम्मुख पड़ता हो तो जब तक फिर पीछे या बायें न हो तब तक वहीं
टिका रहे ॥ ४२ ॥
लग्नविशेष का त्याग
कुम्भकुम्भांशकौ त्याज्यौ सर्वथा यत्नतो बुधैः ।
तत्र प्रयातुर्नृपतेरर्थनाशः पदे पदे ॥ ४३ ॥
अन्वयः—बुधैः यत्नतः सर्वथा कुम्भकुम्भांशकौ त्याज्यौ, (यतः) तत्र प्रयातुः नृपतेः
पदे-पदे अर्थनाशः (स्यात्) ॥ ४३ ॥
पण्डितों को चाहिए कि यत्नपूर्वक कुम्भ लग्न और कुम्भराशि का नवांश
इन दोनों को यात्रा में त्याग दें, क्योंकि इनमें यात्रा करनेवाले राजा का धन
अथवा प्रयोजन पद-पद में नष्ट होता है ॥ ४३ ॥
मीन और मीन के नवांश का फल तथा शुभलग्न
अथ मीनलग्न उत वा तदंशके चलितस्य वक्रमिह वर्त्म जायते ।
जनिलग्नजन्मभपती शुभग्रहौ भवतस्तदा तदुदये शुभो गमः ॥ ४४ ॥
अन्वयः—अथ मीनलग्ने उत वा तदंशके चलितस्य वर्त्म इह वक्र जायते । यदि
जनिलग्नजन्मभपती शुभग्रहौ भवतः तदा तदुदये गमः शुभः (स्यात्) ॥ ४४ ॥
मीन लग्न अथवा मीन राशि के नवांश में यात्रा करनेवाला मार्ग भूलकर
टेढ़े मार्ग से यात्रा करता है । जन्म लग्न और जन्मराशि के स्वामी शुभ
ग्रह हों और जिस लग्न में स्थित हों उसमें की हुई यात्रा शुभ होती
है ॥ ४४ ॥