मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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स्थान में लग्नेश, शुक्र और चन्द्रमा शुभ नहीं होते। आठवें स्थान में चन्द्रमा,
लग्नेश, शुभग्रह और मंगल शुभ नहीं होते। और सातवें स्थान में सम्पूर्ण
शुभाशुभ ग्रह शुभ नहीं होते ॥ ८६ ॥
विवाहकालिक शुभग्रह
त्र्यायाष्टषट्सु रविकेतुतमोऽर्कपुत्रा-
स्त्र्यायारिगः क्षितिसुतो द्विगुणायगोऽब्जः ।
सप्तव्ययाष्टरहितौ ज्ञगुरू सितोष्ट-
त्रिद्यूनषड्व्ययगृहान्परिहृत्य शस्तः ॥ ८७ ॥
अन्वयः—त्र्यायाष्टषट्सु रविकेतुतमोऽर्कपुत्राः (शस्ताः स्युः) । क्षितिसुतः त्र्याया-
रिगः, अब्जः द्विगुणायगः (शुभः) । ज्ञगुरू सप्तव्ययाष्टरहितौ (शुभौ), अष्टत्रिद्यूनषड्-
व्ययगृहान् परिहृत्य सितः शस्तः (स्यात्) ॥ ८७ ॥
लग्न से तीसरे, गेरहवें, आठवें और छठे स्थान में सूर्य शुभ होता है।
इन्हीं स्थानों में केतु, राहु और शनैश्चर भी शुभ होते हैं। तीसरे, गेरहवें,
छठे स्थान में मंगल शुभ होता है। दूसरे, तीसरे, गेरहवें स्थान में चन्द्रमा
शुभ होता है। सातवें, बारहवें, आठवें स्थान को छोड़कर अन्य स्थानों में
बुध और बृहस्पति शुभ होते हैं। आठवें, तीसरे, सातवें, छठे, बारहवें स्थान
को छोड़कर अन्य स्थानों में शुक्र शुभ होता है ॥ ८७ ॥
कर्तरी आदि महादोषों का परिहार
पापौ कर्तरिकारकौ रिपुगृहे नीचास्तगौ कर्तरी-
दोषो नैव सितेऽरिनीचगृहगे तत्षष्ठदोषोऽपि न ।
भौमेऽस्ते रिपुनीचगे नहि भवेद्भौमोऽष्टमो दोषकृ-
न्नीचे नीचनवांशके शशिनि रिष्फाष्टारिदोषोऽपि न ॥ ८८ ॥
अन्वयः—कर्तरिकारकौ पापौ (यदि) रिपुगृहे (वा) नीचास्तगौ (तदा) कर्तरी-
दोषो नैव (भवति), अरिनीचगृहगे सिते तत्षष्ठदोषः अपि न (भवेत्), भौमे अस्ते
रिपुनीचगे अष्टमो भौमः दोषकृत् नहि भवेत्, शशिनि नीचे नीचनवांशके (स्थिते)
रिष्फाष्टारिदोषः अपि न भवेत् ॥ ८८ ॥
यदि कर्तरी कारक दोनों ग्रह क्रूर हों, अथवा अपने शत्रु के स्थान में
स्थित हों या अपने नीच स्थान में हों, अथवा अस्त हों तो कर्तरी दोष नहीं
होता। यदि शुक्र अपने शत्रु के स्थान में या नीच स्थान में स्थित हो तो लग्न
से छठे स्थान में रहने का दोष नहीं होता। यदि मंगल अपने शत्रु के स्थान