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सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

१३० \t\t मुहूर्त्तचिन्तामणि
है। इसी तरह इस सप्तशलाका चक्र में क्रूरग्रह* करके वेधा हुआ नक्षत्र और
शुभग्रह करके वेधा हुआ नक्षत्र का एक पाद विवाहादि शुभ कार्यों में
त्यागना चाहिए; क्योंकि दीपिका ग्रन्थ में कहा है कि जिस स्त्री के विवाह-
काल में सप्तशलाका चक्र में पापग्रहों वा शुभग्रहों से चन्द्रमा विद्ध हो
वह स्त्री विवाहकाल ही के वस्त्र पहने रोती हुई श्मशानभूमि को
जाती है ॥ ५७ ॥
सप्तशलाका चक्र
कृ. रो. मृ. आ. पु. पु. श्ले.
भ. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── म.
अ. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── पू.
रे. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── उ.
उ. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── ह.
पू. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── चि.
श. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── स्वा.
ध. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── वि.
श्र. अ. उ. पू. मू. ज्ये. अ.
क्रूरग्रहों से विद्ध नक्षत्रों का दोष और उसका परिहार
ऋक्षाणि क्रूरविद्धानि क्रूरमुक्तादिकानि च ।
भुक्त्वा चन्द्रेण मुक्तानि शुभार्हाणि प्रचक्षते ॥ ५८ ॥
अन्वयः—क्रूरविद्धानि क्रूरभुक्तादिकानि च ऋक्षाणि (तानि यदि) चन्द्रेण भुक्त्वा
मुक्तानि (तदा) शुभार्हाणि प्रचक्षते ॥ ५८ ॥
जो नक्षत्र क्रूरग्रहों करके पंचशलाका या सप्तशलाका चक्र में वेधे गये
हों और जिनको क्रूरग्रहों ने भोग करके शीघ्र ही छोड़ दिया हो और जिन
नक्षत्रों में क्रूरग्रह स्थित हों और जिन नक्षत्रों में क्रूरग्रह जानेवाले हों और
जिन नक्षत्रों में भौम, दैव, आन्तरिक्ष, इन तीन प्रकार के उत्पातों में से
कोई उत्पात हुआ हो, वे सब नक्षत्र शुभ नहीं होते । इसलिए उन नक्षत्रों
में विवाहादि शुभ कार्य नहीं करना चाहिए और उन्हीं नक्षत्रों को यदि
चन्द्रमा ने भोग करके छोड़ दिया हो तो शुभ हो जाते हैं अर्थात् एक महीने
के बाद वे सब नक्षत्र शुभ कार्य करने के लिए शुभ हो जाते हैं ॥ ५८ ॥
*सूर्य, क्षीण चन्द्रमा, मङ्गल, शनैश्चर, राहु और केतु ये क्रूर तथा पापग्रह कहे जाते हैं ।