मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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तो सैंतीस दण्ड बत्तीस पल लब्ध हुए। इन्हीं सैंतीस दण्ड बत्तीस पल के बाद
चार दण्ड विषनाड़ी होगी। ऐसे ही और भी जानना चाहिए ॥ ४९-५१ ॥
दिन के पन्द्रह मुहूर्त्त
गिरिशभुजगमित्राः पित्र्यवस्वम्बुविश्वे-
ऽभिजिदथ च विधातापीन्द्र इन्द्रानलौ च
निर्ऋतिरुदकनाथोऽप्यर्यमाथो भगः स्यु
क्रमशः इह मुहूर्त्ता वासरे बाणचन्द्राः ॥ ५२ ॥
अन्वयः—गिरिशभुजगमित्राः पित्र्यवस्वम्बुविश्वे अभिजित् अथ च विधाता अपि
च इन्द्रः इन्द्रानलौ, निर्ऋतिः उदकनाथः, अपि (तथा) अर्यमा अथो भगः इमे बाणचन्द्राः
(पञ्चदश) मुहूर्त्ताः क्रमशः वासरे स्युः ॥ ५२ ॥
दिन का जितना मान हो उसमें पन्द्रह का भाग देने से जो दण्ड पल
लब्ध हों वही एक मुहूर्त्त का मान होता है। पहिले मुहूर्त्त का स्वामी महादेव,
दूसरे का सर्प, तीसरे का मित्र नामक सूर्य, चौथे के पितर, पाँचवें के वसु,
छठे का जल, सातवें के विश्वेदेव, आठवें का अभिजित्, नवें का विधाता,
दशवें का इन्द्र, गेरहवें के इन्द्र और अग्नि, बारहवें का राक्षस, तेरहवें का
वरुण, चौदहवें का अर्यमा नामक सूर्य और पन्द्रहवें का भग नामक सूर्य
स्वामी है। क्रम से ये पन्द्रह मुहूर्त्त दिन में होते हैं ॥ ५२ ॥
रात्रि के मुहूर्त्त
शिवोऽजपादादष्टौ स्युर्भेशा अदितिजीवकौ।
विष्ण्वर्कत्वाष्ट्रमरुतो मुहूर्त्ता निशि कीर्तिताः ॥ ५३ ॥
अन्वयः—शिवः अजपादात् अष्टौ भेशाः अदितिजीवकौ विष्ण्वर्कत्वाष्ट्रमरुतः
(एते) निशि [रात्रौ] मुहूर्त्ताः स्युः ॥ ५३ ॥
दिनमान को साठ में घटाने पर जो बाकी रहे वह रात्रिमान होता है।
उसमें पन्द्रह का भाग देने से जो दण्ड-लब्ध हों वह रात्रि में एक मुहूर्त्त का
मान होता है। रात्रि में पहिले मुहूर्त्त के स्वामी शिव और दूसरे मुहूर्त्त से
लेकर नवें मुहूर्त्त पर्यन्त आठ मुहूर्त्तों के पूर्वभाद्रपद आदि आठ नक्षत्र स्वामी
होते हैं, अर्थात् दूसरे मुहूर्त्त के स्वामी अजपाद नामक शिव, तीसरे मुहूर्त्त के
अहिर्बुध्न्य नामक शिव, चौथे मुहूर्त्त के पूषा नामक सूर्य, पाँचवें मुहूर्त्त के
अश्विनीकुमार, छठे मुहूर्त्त के यम, सातवें मुहूर्त्त के अग्नि, आठवें मुहूर्त्त के