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सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 132

विवाहप्रकरण १२३
संग्रह × दोष
चन्द्रे सूर्यादिसंयुक्ते दारिद्र्यं मरणं शुभम् ।
सौख्यं सापत्न्यवैराग्ये पापद्वययुते मृतिः ॥ ४५ ॥
अन्वयः—चन्द्रे सूर्यादिसंयुक्ते दारिद्र्यं, मरण, शुभं, सौख्यं (स्यात्) सापत्न्य-
वैराग्ये (भवतः) तथा पापद्वययुते (चन्द्रे) मृतिः स्यात् ॥ ४५ ॥
विवाहकाल में चन्द्रमा यदि सूर्य के साथ हो तो स्त्री-पुरुष दरिद्र होते
हैं, मंगल के साथ हो तो दोनों की मृत्यु, बुध के साथ हो तो शुभ, बृहस्पति
के साथ हो तो सुख और शुक्र के साथ हो तो स्त्री के सौत आती है तथा
शनैश्चर संयुक्त हो तो स्त्री-पुरुष में प्रीति नहीं होती है । यदि चन्द्रमा दो,
तीन अथवा कई पापग्रहों से संयुक्त हो तो स्त्री-पुरुष की मृत्यु होती है ।
नारदजी ने बुध के योग में सन्तान-हानि, बृहस्पति के योग में भाग्य-हानि,
शनैश्चर के योग में संन्यास, राहु के योग में स्त्री-पुरुष का परस्पर झगड़ा
और केतु के योग में सदा कष्ट वा दरिद्रता कहा है । यदि चन्द्रमा अपनी
उच्च राशि में, अपने मित्र की राशि में अथवा अपनी राशि में स्थित होकर
शुभग्रह-संयुक्त हो तो शुभफलकारक और यदि इससे विपरीत हो तो अशुभ-
फलकारक होता है ॥ ४५ ॥
अष्टमलग्न का दोष और परिहार
जन्मलग्नभयोर्मृत्युराशौ नेष्टः करग्रहः ।
एकाधिपत्ये राशीशमैत्रे वा नैव दोषकृत् ॥ ४६ ॥
अन्वयः—जन्मलग्नभयोः मृत्युराशौ करग्रहः नेष्टः । एकाधिपत्ये वा राशीशमैत्रे नैव
दोषकृत् ॥ ४६ ॥
स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न में विवाह
शुभ नहीं होता । यदि जन्मलग्न का स्वामी वा जन्मराशि का स्वामी जन्म-
लग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न का भी स्वामी हो अथवा आठवीं लग्न के
स्वामी का मित्र हो तो उक्त दोष नहीं होता ॥ ४६ ॥
अन्य परिहार
मीनोक्षकर्कलिमृगस्त्रियोऽष्टमं लग्नं यदा नाष्टमगेहदोषकृत् ।
अन्योन्यमित्रत्ववशेन सा वधूर्भवेत्सुतायुर्हृत्सौख्यभागिनी ॥ ४७ ॥
× चन्द्रमा के साथ एक राशि में अन्य ग्रहों के रहने का नाम ।