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सर्वकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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( ४६ )

विशाखदत्त का गद्य ओज से समन्वित है । उनके पद्यों मे भी लालित्यपूर्ण प्रवाह का दर्शन होता है । एक उदाहरण देखिये —

"आस्वादितद्विरदशोणितशोणशोभा
सन्ध्यारुणामिव कलां शशलाञ्छनस्य ।
जृम्भाविदारितमुखस्य मुखात्स्फुरन्तो
को हर्तुमिच्छति हरे परिभूय दष्ट्राम् ॥"

इसी प्रसङ्ग में एक उदाहरण और देखिये जिसमें चाणक्य की राजनीति के वैचित्र्य का वर्णन प्रस्तुत किया गया है —

"मुहुर्लक्ष्योद्भेदा मुहुरधिगमाभावगहना
मुहु सम्पूर्णाङ्गी मुहुरतिकृशा कायवशत ।
मुहुर्भ्रश्यद्बीजा मुहुरपि बहुप्रापितफले—
त्यहो चित्राकारा नियतिरिव नोतिनयविद ॥" ५।३।।

नाटककार ने अपने मुद्राराक्षस में सरल पद्यों में शिक्षाप्रद बातों का भी उल्लेख किया है —

"शामनमर्हता प्रतिपद्यध्व मोहव्याधिविबंध्यानाम् ।
ये प्रथममात्रकटुक पश्चात्वथ्यमुपदिशन्ति ॥" ४।१६।।

पात्रों का चरित्र चित्रण— उन्होंने अपने पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी अपनी दक्षता दिखलायी है । प्रत्येक पात्र स्वतन्त्र है । वह अपने उद्देश्य की ओर ही प्रेरित है । कोई भी पात्र ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता है जिसकी सार्थकता नाटकीय कथावस्तु की दृष्टि से आवश्यक न हो । चाणक्य और राक्षस दोनों ही कुशल राजनीतिज्ञ हैं । किन्तु दोनों में अन्तर यही है कि चाणक्य धीर तथा दूरदर्शी है और राक्षस उदार तथा विस्मरणशील । फिर भी नाटककार ने राक्षस में जिस मैत्री भावना का चित्रण किया है वह भारतीय संस्कृति की विशिष्ट देन है ।

भाषा— नाटककार विशाखदत्त ने संस्कृत भाषा के अतिरिक्त शौरसेनी, महाराष्ट्री तथा मागधी प्राकृत का भी प्रयोग अपने नाटक मुद्राराक्षस में किया