सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 488 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

( १५ )

किया गया था । इस कला को पृथ्वी-लोक में पहुँचाने का कार्य भरतमुनि द्वारा सम्पन्न किया गया । इस प्रकार उक्त कला का आगमन देवलोक अथवा द्युलोक से इस मर्त्यलोक पर हुआ ।

उपर्युक्त वर्णन में वास्तविकता कितनी है, यह कहा नही जा सकता । किन्तु इतना अवश्य है कि इसके द्वारा नाट्यकला-सम्बन्धी निम्नलिखित बातो का ज्ञान तो प्राप्त हो ही जाता है :—

(१) नाट्य-कला के निर्माण मे चारो वेदों का किसी न किसी अंश मे योग अवश्य है ।

(२) पुरातन समय में स्त्री तथा पुरुष दोनो ही अपना-अपना अभिनय किया करते थे ।

(३) तत्कालीन सभी नाटक धर्मप्रधान हुआ करते थे जिनका अभिनय धार्मिक पर्वों पर ही हुआ करता था ।

(४) वैदिक काल में किसी भी नाटक की रचना नहीं हो सकी थी । इसी कारण देव तथा दानवों को मिलकर ब्रह्मा से प्रार्थना करनी पड़ी होगी ।

(२) धार्मिक भावनावाद

(२) मृतक पूजावाद — डा० रिजवे का कथन है कि संसार में नाटकों की उत्पत्ति मृत आत्माओं को प्रसन्न करने तथा उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने की दृष्टि से हुई । भारत, यूनान आदि प्राचीन देशों में प्राचीन काल से ही इस भाँति की श्रद्धा प्रकट करने की प्रथा चली आती है । यह श्रद्धा ही सभी धर्मों का मूल है । इस भाँति नाटको का अभिनय मृत आत्माओं को प्रसन्न करने के निमित्त हुआ करता था । रामलीला एवं कृष्णलीला आदि लीलाये इसी भावना की प्रतीक कही जा सकती हैं । इस मृतक पूजा के आधार पर ही शनैः-शनैः नृत्य, गान तथा अभिनय होने लगे । इस भाँति नाटकों की रचना का प्रादुर्भाव हुआ ।

किन्तु उपर्युक्त मत को विद्वानों द्वारा मान्यता प्राप्त न हो सकी, क्योंकि