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सर्वकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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. प्रथमोऽङ्कः :२७

है )। [ हाव-भाव के साथ बैठकर मन ही मन ] नागरिकों में यह बात कैसे फैल गई कि नन्दवंश के विनाश से उत्पन्न क्रोध वाला राक्षस पिता के वध से क्रुद्ध तथा समस्त नन्द-साम्राज्य के स्वामित्व-प्रदान की शर्त से प्रेरित पर्वतक-पुत्र मलयकेतु के साथ सन्धि करके उस ( मलयकेतु ) के द्वारा इकट्ठी की गयी म्लेच्छ राजाओं की विशाल वाहिनी से युक्त होकर चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने के लिए तैयार है ? [ सोचकर ] अथवा जिस मैंने सब लोगों के सामने नन्दवंश के वध की प्रतिज्ञा करके कठिनाई से पार करने योग्य प्रतिज्ञा रूपी नदी को पार कर डाला, वह मैं क्या इस समय फैलती हुई इस बात को भी दबा देने में समर्थ नहीं हूँ ?

टिप्पणी—शाङ्गर्‌रव—यह चाणक्य के शिष्य का नाम है। यहाँ संभ्रम (उतावली) में इसका दो बार उच्चारण किया गया है। उपाध्याय !—आचार्य, गुरुदेव ! नाटक में आचार्य को उपाध्याय कह कर सम्बोधित किया जाता है—'आर्येति ब्राह्मणं ब्रूयान्महाराजेति पार्थिवम्। उपाध्यायेति चाचार्यम्'— नाट्यशास्त्र। उपेत्य अस्मात् अधीते इति उपाध्यायः उप-अधि √ इ + घञ् अपादाने संज्ञायाम्। तस्य सम्बोधने उपाध्याय इति। वत्स... यह शिष्य के प्रति एक प्रकार का कोमल उपालम्भ है। क्योंकि चाणक्य देर से खड़े हैं। उन्होंने शिष्य का बिछाया हुआ आसन नहीं देखा। इसलिए मीठी फटकार देते हुए वे कहते हैं कि मैं बैठना चाहता हूँ, आसन तुमने बिछाया ही नहीं। ननु—यह आक्षेपसूचक अव्यय है। 'नन्वाक्षेपे परिप्रश्ने प्रत्युक्ताववधारणे' इति हैमः। शिष्य कुछ उत्तेजित होकर उत्तर देता है; क्योंकि वह आसन पहले ही बिछा चुका है। सन्निहित-वेत्रासना—जिसके समीप बेंत का आसन रखा हो। सम्-नि √ धा + क्त कर्मणि = सन्निहितम्। वेत्रनिर्मितम् आसनम् वेत्रासनम् मध्यमपदलोपी स०। सन्निहितं वेत्रासनं यस्याम् सा बहुव्रीहि स०। कार्याभियोगः—कार्य के प्रति एकाग्रता। अभि √ युज् + घञ् भावे = अभियोगः। कार्ये अभियोगः सुप्-सुपा स०। व्याकुलयति—व्याकुल किया करती है। वि-आ √ कुल् + अच् कर्तरि व्याकुलः। व्याकुलं करोति इति व्याकुल + णिच् + लट्—तिप्। उपाध्याय-सहभूः—आचार्यों की सहज। सह युगपत् भवति इति सह √ भू + किप् कर्तरि = सहभूः उपाध्यायानां सहभूः षष्ठीतत् ०। यह 'दुःशीलता' का विशेषण है। इससे यह सूचित किया गया है कि आचार्य लोग शिष्य के प्रति कठोरता से व्यवहार