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सर्वकोश
मृगेन्द्र आगम: विद्या एवं योग पाद (भट्ट नारायणकण्ठ वृत्ति सहित प्राचीनतम कामिक आगम परिशिष्ट)

मृगेन्द्र आगम: विद्या एवं योग पाद (भट्ट नारायणकण्ठ वृत्ति सहित प्राचीनतम कामिक आगम परिशिष्ट)

Mrigendra Tantra / Agama with Narayanakantha Vritti

महर्षि मृगेन्द्र (टीकाकार: भट्ट नारायणकण्ठ) द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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श्लो० पृ० | शैवं वपुरिति ध्याये-   श्लो० पृ० ३३।२३
य        |       स
यत्प्राप्य न पुनर्दुःख- ६३।४२ | सगर्भं कुम्भकं विद्वा- ३४।२३
यत्रोपरमते चित्तं  ६०।४० | समभ्यस्यन्नवाप्नोति ५१।३३
यथा सगर्भः स्थैर्याय २९।२० | समाधिरणिमादीनां ५०।३३
यदा वेत्ति पदं हेय-  ९।९ | समानवृत्तिविजया- ४८।३१
योगी व्यक्तसमस्तानि ३९।२६ | सर्वदा सर्वभूतानां  ५९।४०
रेचयेच्छक्तिपर्यन्तं  २०।१५ | सर्वान्पदार्थान् संत्यज्य ५३।३४
रोधशक्तिस्तदभ्यासा- २३।१७ | साक्षादालोचनं शम्भो- ६४।४४
व        | स्तोभोन्मादविषोद्दीप्ति- २६।१८
वार्यग्नी भूमिपवनौ  ४३।२८ | स्थानं प्राथमिकस्येमा- ३६।२४
विषयाभिभवे व्योम  ४२।२७ |       ह
विस्तरेण सुरश्रेष्ठ   १३।१२ | हन्त्यगर्भोऽपि देवानां ३०।२१
वैद्यर्धमण्डलत्र्यस्र-  ३७।२५ | हितजीर्णाशनस्वस्थ- १७।१४
वैचित्र्यात्कल्पितं भ्रान्त्यै ५५।३६ |