सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 748, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 748

श्लोकानुक्रमणिका

| अङ्काः/श्लोकाः | | | अङ्काः/श्लोकाः | |
| :--- | :---: | :---: | :--- | :---: | :---: |
| अ | | | अमौक्तिकमसौवर्णम् | १० | १८ |
| अंसेन विभ्रत्करवीरमालां | १० | २१ | अयं च सुरतज्वालः | ४ | ११ |
| अग्राह्या मूर्धजेष्वेताः | ८ | २१ | अयं तव शरीरस्य | ४ | ७ |
| अङ्गारकविरुद्धस्य | ६ | ३३ | अयं पटः सूत्रदरिद्रतां | २ | १० |
| अत्थं शदं देमि शुवण्णअं | ८ | ४० | अयं हि पातकी विप्रो | ९ | ३६ |
| अद्धं कलेवलं पडिवृत्तं | १० | ३५ | अयमेवंविधे काले | ६ | ३१ |
| अद्याप्यस्य तथैव केश- | ८ | ५ | अये शस्त्रं मया प्राप्तं | ६ | २४ |
| अनया हि समालब्धं | ३ | १५ | अलं चतुःशालमिमं प्रवेश्य | ३ | ७ |
| अन्धआले पळाअन्ती | १ | ३१ | अवणेध बालअअणं | २ | १८ |
| अन्धस्य दृष्टिरिव | ४ | ४६ | अवनतशिरसः प्रयाण | ८ | १५ |
| अन्यं मनुष्यं हृदयेन | ४ | १६ | अवन्तिपुर्यां द्विजसार्थवाहो | १ | ६ |
| अन्यस्यामपि जातौ मा | ८ | ४३ | अवहरइ कोवि तुरिअं | ६ | ११ |
| अन्यासु भित्तिषु मया | ३ | १४ | अविज्ञातावसवेतेन | १ | ५४ |
| अपण्डितास्ते पुरुषा मता मे | ४ | १२ | अशरणशरणप्रमोद- | ८ | ४ |
| अपतितमपि तावत्सेव० | ८ | ४२ | अशी शुतिक्खे वलिदे | १ | ३० |
| अपद्मा श्रीरेशा प्रहरणम् | ५ | १२ | असौ हि दत्त्वा तिमिराव० | ३ | ६ |
| अपश्यतोऽद्य तां कान्तां | ७ | ६ | अस्मत्समक्षं हि वसन्तसेना | ९ | ३० |
| अपापानां कुले जाते | ६ | ३७ | अह्मेहि चण्डं अहि | १ | २८ |
| अप्येष नाम परिभूत- | ८ | २६ | आ | | |
| अप्रीतिर्भवतु विमुच्यतां | ८ | ४१ | आअच्छध वीसत्था | ६ | ६ |
| अभ्युदये अवशाणे | १० | १६ | आअट्टिदे शलोशं | १० | ३७ |
| अब्भअं तुह देह हरो | ६ | २७ | आकर्षन्तु सुबद्ध्येनं | १० | ५३ |
| अभ्युक्षितोऽसि सलिलैः | ६ | १६ | आत्मभाग्यक्षतद्रव्यः | ३ | २७ |
| अमी हि दृष्ट्वा मदुपेतमेत- | १० | ६ | आर्येकेणार्यवृत्तेन | १० | ५१ |
| अमी हि वस्त्रान्तनिरुद्ध- | १० | १६ | आलाने गृह्यते हस्ती | २ | ५० |
| अमी हि वृक्षाः फलपुष्प- | ८ | ७ | आलोकविशाला मे | १ | ३६ |
| अमूंहि भित्त्वा जलदान्तराणि | ५ | ४४ | आलोकितं गृहशिखण्डिभिः | ५ | १ |