सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 509, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 509

सप्तमोऽङ्कः ४२१

आर्यकः--स्नेहमयान्यन्यानि दृढंतराणि दत्तानि ।
विदूषकः--सङ्कच्छेहि णिअडाइं, एसो वि मुक्को, सम्पंदं अम्हे वज्जि-
स्सामो । ( सङ्कच्छस्व निगडानि, एषोऽपि मुक्तः, साम्प्रतं वयं व्रजिष्यामः । )
चारुदत्तः धिक् शान्तम् ।
आर्यकः--सखे चारुदत्त ! अहमपि प्रणयेनेदं प्रवहणमारूढः । तत्
क्षन्तव्यम् ।
चारुदत्तः--अलङ्कृतोऽस्मि स्वयंग्राहप्रणयेन भवता ।
आर्यकः--अभ्यनुज्ञातो भवता गन्तुमिच्छामि ।
चारुदत्तः--गम्यताम् ।
आर्यक :--भवतु, अवतरामि ।
चारुदत्तः--सखे ! नावतरितव्यम् । प्रत्यग्रापनीतसंयमनस्य भवतः
अलघुसंचारा गतिः । सुलभपुरुषसञ्चारेऽस्मिन् प्रदेशे प्रवहणं विश्वास-
मुत्पादयति, तत् प्रवहणेनैव गम्यताम् ।
आर्यकः--यथाह भवान् ।


आर्यक--प्रेममयी दूसरी बेड़ियां डाल दीं ।

विदूषक--( चारुदत्त के पैर में ) बेड़ियां डाल दो । यह भी छूट गया । अब
हम लोग ( कारागार ) चलेंगे ।

चारुदत्त--ऐसी बात को धिक्कार है । शान्त रहो ।

आर्यक--मित्र चारुदत्त ! मैं भी प्रेम के कारण ही इस गाड़ी पर चढ़ा ।
अतः क्षमा करिये ।

चारुदत्त--आपके द्वारा स्वयं इस गाड़ी पर चढ़ने के स्नेह से मैं अलंकृत
हो गया हूँ ।

आर्यक--आपसे आज्ञा लेकर जाना चाहता हूँ ।

चारुदत्त--जाइये ।

आर्यक--अच्छा, उतरता हूँ ।

चारुदत्त--मित्र ! मत उतरो । अभी अभी बेड़ी हटाने से आपकी गति
तेज नहीं है ( अर्थात् आप जल्दी जल्दी नहीं चल पायेंगे । ) राजपुरुषों के आवा-
गमन से युक्त इस स्थान पर ( मेरी ) गाड़ी विश्वास उत्पन्न कराती है, इसलिये
गाड़ी से ही जाइये ।

आर्यक--आप की जैसी आज्ञा ।