मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ २६ ]
देवताओं की स्तुति कर उनकी पूजा और प्रतिष्ठा के साथ विग्रहवती पंचदेवता की
उपासना के साथ उनकी प्रतिष्ठा की है । अतः दोनों का कार्य विरुद्ध है । वस्तुतः शंकर
के विषय में पंचदेवों की उपासना को वेद विरुद्ध व्यवहार सिद्ध करना भी आपात-रमणीय
है, क्योंकि कृष्णयजुर्वेद के मैत्रायणी शाखा में रुद्र महादेव, गौरी, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु
एवं सूर्य की उपासना के लिए उनकी गायत्री पठित है । अग्नि चयन कार्य विषय कह
कर उस चित् अग्नि में पूजा के लिए महादेव शिव का आवाहन करने के लिए मन्त्र में
कहा गया है ।
देवानां च ऋषीणां चासुराणां च पूवजंम् ।
महादेवं सहस्राक्षं शिवमावाहयाम्यहम् ॥
शिव के सम्बन्ध में श्रुति कहती है—
तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ।
शक्ति के सम्बन्ध में कहा गया है—
उदगाङ्गो चयाय विद्महे गिरिसुताय धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ।
गणपति के सम्बन्ध में कहा गया है —
तत् कराटाय च विद्महे हस्ति मुखाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोयात् ।
विष्णु के सम्बन्ध में कहा गया है —
तत्केशवाय विद्महे नारायणाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।
सूर्य के सम्बन्ध में कथित है—
तद् भास्कराय विद्महे प्रभाकराय धीमहि तन्नो भानुः प्रचोदयात् ।
कार्तिकेय के सम्बन्ध में कथित है—
तत्कुमाराय विद्महे कार्तिकेयाय धीमहि तन्नो स्कन्दः प्रचोदयात् ।
ब्रह्मा के विषय में—
तच्चतुर्मुखाय विद्महे पद्मासनाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ।
(र्बलिनप्रकाशित मैत्रायणी संहिता अग्निचिति प्रकरण ११९-१२०)
अतः, पञ्च देवो उपासना अश्रौत नहीं है । अतः इस अंश में दोनों भाष्यकारों
का सिद्धान्त विरुद्ध नहीं है । कर्मवाद के सम्बन्ध में भी पारमार्थिक दृष्टि से विरोध
नहीं है । अशुद्ध चित्त कामना वशीकृत जीव ज्ञानमार्ग का पथिक नहीं हो सकता है
वह कर्म मार्ग का ही अधिकारी है । चित्त शुद्धि के लिए याज्ञदान तप कर्म अवश्य ही
अनुष्ठेय है । यह ज्ञानमार्गी भी मानते हैं । मीमांसा दर्शन में 'यजति चोदना द्रव्यदेवता-
क्रियं समुदाये कृतार्थत्वात् । (४।२।२७) ।