मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ २४ ]
चतुर्थ अध्याय का नाम प्रयोग लक्षण है। कौन कर्म किसके द्वारा प्रयुक्त अपूर्व
होता है, वह कर्म का प्रयोजक है या नहीं। इस रूप में प्रयोग सम्बन्धीय विषय में इस
अध्याय में वर्णित हैं।
पंचम अध्याय का नाम क्रमलक्षण है। श्रुति, अर्थ, पाठ, स्थान, मुख्य एवं प्रवृत्ति
के अनुसार कर्म का परम्पराक्रम में विचार इस अध्याय के चार पाद के द्वारा वर्णित
है। चतुर्थ और पंचम अध्याय में प्रयोग विधि विषय की आलोचना है।
छठा अध्याय अधिकार लक्षण है। किस कर्म में किसका अधिकार है ? यह छः
अध्याय के आठ पाद में वर्णित है। अतः छठें अध्याय में अधिकार विधि की आलोचना
है। इन छः अध्यायों में उपदेश विधि का प्राधान्य है।
सप्तम और अष्टम अध्याय के चार पादों में सामान्यातिदेश एवं विशेषातिदेश का
निरूपण है। अतः इसे सामान्यतः अतिदेश लक्षण कहा गया है।
नवम अध्याय के चार पादों में ऊह विषय का विचार किया गया है। इसलिए
इसका नाम ऊह लक्षण है।
दशम अध्याय के आठ पाद में बाध विषयक विचार है, इसीलिए इसे बाध लक्षण
कहा जाता है। इसीलिए इसे बाध लक्षण भी कहा जाता है।
एकादश अध्याय में तन्त्रों के सम्बन्ध में विचार है—इसलिए इसे तन्त्र लक्षण कहा
जाता है। इसमें चार पाद हैं।
बारहवें अध्याय में प्रसंग विषय का विचार है। अतः इसे प्रसंग लक्षण कहा
जाता है। इसमें चार पाद हैं।
मीमांसक आचार्य
मीमांसा वेद के समान ही अनादि है। किन्तु जैमिनि के सूत्रकाल से संबद्ध
मीमांसा विचार उपलब्ध होने से ऐतिहासिक दृष्टि से इन्हें ही पूर्वाचार्य माना जा सकता
है। यह सत्य है कि उन्होंने अपने सूत्रों में अनेक मीमांसक आचार्यों का उल्लेख किया
है। पाश्चात्य दृष्टिकोण से ऐतिहासिक तथ्यों के साक्ष्य पर जैमिनि का समय ईसा पूर्व
तृतीय से चतुर्थ शतक तक माना गया है। यह वादरायण के समकालीन है, क्योंकि ब्रह्म
सूत्र में जैमिनि का नाम मिलता है। साथ ही पूर्व मीमांसा सूत्र में भी वादरायण का
नाम उल्लिखित है¹। जैमिनि को बादरायण शिष्य माना गया है। इन्हें सामवेद का
१. जैमिनि सूत्रों में उपलब्ध कतिपय आचार्य :—आत्रेय (मी० ६।१।२६) ऐतिशायन
(मी० ३।२।४३), कामुकायिन (११।१।५०) कार्ष्णाजिनि (६।७।३२), बादरायण
(मी० १।१।५) बादरि (मी० ३।१।३), लावुकायन (६।७।३७) आदि। अतः, इसे
वेद के समान प्राचीन मानना अनुचित नहीं है। कुमारिल ने ही कहा है—
‘इतिकर्तव्यता मात्रं मीमांसा पूरयिष्यति’