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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 804 में से

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इस विवरण से स्पष्ट है कि कर्म और ज्ञान की प्राचीर वैदिक काल में नहीं था ।
यह भी प्रभाकर मत से स्पष्ट है कि श्रद्धा-मूलक आत्मतत्त्व-विषयक शाब्दज्ञान की
धारा ही चिन्ता है, यह शाब्दज्ञान धारा ही ध्यान नाम से कही जातो है । यह ध्यान
ही आत्मतत्त्व साक्षात्कार का साधन है । फल का साधन होने से इसमें विधि है ।
यह जिज्ञास्य है कि कर्ममीमांसा का क्या प्रयोजन है ? क्योंकि मीमांसा शास्त्र से
प्रतिपादित कर्म वर्तमान युग के अनुरूप नहीं है, अतः मीमांसा शास्त्र की आलोचना
भी व्यर्थ ही है ? श्रौत कर्म अनुष्ठान के योग्य न होने पर भी मीमांसादर्शन अनालोच्य
नहीं है । उपनिषद् विषय की आलोचना का प्रचार होने से उसके उपकारक के रूप में
यह शास्त्र भी आलोचनीय है । क्योंकि मीमांसाशास्त्र में एक एक अधिकरण में कर्म-
विषयक श्रुति वाक्य को लेकर जिस पद्धति और जिस युक्ति के आधार पर सिद्धान्त
स्थिर किया जाता है, उपनिषद् विचारात्मक वेदान्तदर्शन में, धर्म विचारात्मक स्मृति-
शास्त्र में एवं व्यवहारशास्त्र आदि में भी तत्त्वार्थ की अवगति के लिए उसी सरणि का
अवलम्बन करना होगा । धर्म और व्यवहार शास्त्र की पद्धति से अनुशीलन करने पर
ही वेदान्त के सिद्धान्तों की सार्वभौम आलोचना के आधार पर सत्यता और असत्यता
के निर्धारण से लोक हित की दृष्टि से ज्ञानकाण्ड का इच्छा क्रिया और चेष्टा के क्रम से
उपयोग कर सकता है । प्रकृति और प्रत्यय के निरूपण के साधन के रूप में व्याकरण
पदशास्त्र है, उसी प्रकार वाक्यार्थ के निर्णय की दृष्टि से उसके साधन के रूप में इसे
वाक्यशास्त्र माना गया है । लोक में सभी कर्म वाक्यात्मक श्रुति-स्मृति-सापेक्ष होने से
मीमांसात्मक वाक्यशास्त्र के बिना यथार्थ वाक्यार्थ का अवधारण सम्भव नहीं है । यह
सत्य है कि तर्कादि शास्त्र इसके परिपोषक हो सकते हैं, किन्तु वाक्यार्थ की यथार्थ
अवधारणा के लिए एकमात्र इसी शास्त्र का अनुशीलन अपेक्षित है । यही कारण है कि
इसे न्याय नाम से भी कहा जाता है । 'नीयते प्राप्यते विवक्षितार्थसिद्धिरनेन' इस
व्युत्पत्ति के आधार पर मीमांसा न्याय है । यही कारण है कि मीमांसा के प्राचीन
ग्रन्थ न्यायकर्णिका, न्यायमाला, इत्यादि न्यायपद घटित है । इसीलिए अधिकरण को
'न्याय' के नाम से कहा जाता है । 'संयोगपृथक्त्वन्याय', योगसिद्धि न्याय इत्यादि ।
यह सत्य है कि श्रुति का विशेष विचार इस शास्त्र में किया गया है, किन्तु लोक के
लिए अपेक्षित स्मृति, शिष्टाचार आदि का भी विचार है, क्योंकि भारतीयता के लिए
ही उनका विचार भी एकान्त रूप से अपेक्षित है । लोक और स्मृति के सिद्धान्तों की
प्रामाणिकता और व्यावहारिकता का निर्णय मीमांसा से ही होता है । पुराण का भी
काल्पनिकत्व-निराकरण इसी शास्त्र के आधार पर होता है ।
'इतिहास-पुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत्' इस महाभारत का कथन ही वेदार्थ प्रकाशक
के रूप में पुराण की चर्चा की है । हे मुनि, आपने साक्षात् श्रुत्यर्थ मूलक के सुदुष्कर