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सर्वकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 804 में से

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है, जहां द्रव्य यज्ञ के बिना भी चिन्मयभूमि में उत्तीर्ण होने की सम्भावना है। किन्तु
वेदार्थ का शैथिल्य तर्कमार्गियों को देन एवं प्रभाव है।
तर्क में एक आवेश होता है। वहां एकाङ्गी होकर किसी विशेष व्याख्या में पूर्वपक्ष
और उत्तर पक्ष का एक क्रम चलता है जो लक्ष्य से सहज ही दूर अवतीर्ण करा देता.है,
ज्ञान काण्ड की आधारशून्य अवतरणा के साथ मन्त्रार्थ की उपेक्षा आरम्भ हो गयी थी।
पूर्वोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि वेद सार्वभौम अखण्ड दीप्ति की साधना है और
इसका उद्देश्य आचार और आचार की भूमि पर प्रचार है। कर्म और ज्ञान की
यात्रा का चरम लक्ष्य अमृतत्वलाभ है। इस अमृतत्व की प्राप्ति कर्म के द्वारा
भी प्रतिपादित है।
ऋग्वेद में सोम का बहुधा उल्लेख मिलता है। एक मण्डल ही सोम मन्त्रों का
संग्रह है। वर्णन के आधार पर सभी यज्ञों में श्रेष्ठ सोम याग है। इसका अनुष्ठान भी
जटिलतम है। देवत्व प्राप्ति का और अमृतत्त्व प्राप्ति का भी यही साधन है ।। अमृतत्व-
लाभ ज्योतिर्मय जीवन में उत्तीर्ण होना है। यदि यह कहा जाय विश्वात्मक ज्योति से
एकात्मता है। जिसमें सम्पूर्ण विश्व के साथ एकात्मक होकर सब के कल्याण के लिये
एकाङ्गी जीवन से निरपेक्ष सार्वजनीन जीवन के रूप में कर्तव्य पथ पर आरूढ़ होना
और आरूढ़ करने की भावना सन्निहित है, एक खण्ड सत्य के आधार पर एक गोष्ठी के
कल्याण की भावना नहीं है। इस प्रकार यह जटिल कर्म रूप है और दूसरी ओर सरल
रूप है। वेद में कहा है :- जिसने औषधि स्वरूप सोम का पान किया था उसने मानस
सोम का पान किया, किन्तु जो सोम को ब्रह्म जानते हैं, उस रस को कोई नहीं पा
सकता है। योग और तन्त्र की साधना में अग्निषोम तत्त्व की विवृत्ति एवं प्रयोग का
अध्ययन एवं अनुशीलन करें तो इसके रहस्य का उद्घाटन सम्भव है।
वेद की व्याख्या से पूर्व ऋषि का अर्थ ज्ञान अपेक्षित है---ऋष् गतौ धातु से सर्व-
धातुभ्य इन् (उ० सू० ५५६) इस सूत्र से इन् इगुपधात् कित् (उ० सू० ५५९) से कित्
कर 'ऋषि' शब्द निष्पन्न होता है। वेद की प्राप्ति के लिए तप का अनुष्ठान करने वाले
पुरुष को स्वयम्भू वेद पुरुष ने प्राप्त किया। अजान् ह वै पृश्नींस्तपस्यमानान् ब्रह्म
स्वयम्भ्वभ्यानर्षत् ऋषयोऽभवत् (तै० आ० २।९।१) अतीन्द्रिय वेद का परमेश्वर के
अनुग्रह से इस प्रथम दर्शन के कारण ही ऋषि कहे गये।
युग के अन्त में अन्तर्हित इतिहास के साथ वेद का महर्षियों ने तप के आधार पर
स्वयम्भू के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया।
तपोवन में महर्षि कल्प जीवन परायण मुनिगण त्रैगुण्य वेद को निस्त्रैगुण्य होते हुए
भी जीवों के प्रति महाकरुणा से सदा आर्द्रचित्त आत्म अनुग्रह की इच्छा के बिना भी
वेदकल्पतरु को दुःख-त्रयनाशक ज्ञानविज्ञान-फलक मीमांसा की योग समृद्धि से आविष्कृत