मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 346, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाथ-प्रभाव द्योतक पद २९७
बिसरयाँ बोहो˙ दिन भया, बिसरयो पलक न जाइ ।
ऐक बेरी देह फेरि, नगरि हमारै आइ ।
वा मूरत म्हारे मन बसे, बिसरयो पलधू न जाइ ।
मीराँ के कोई नहि दूजौ, दरसण दीजो आइ ।
प्रथम पाठ की अभिव्यक्ति मे अधिक सगति है ।
६
म्हाँरो घर रमतो ही आई रे तू जोगिया ।
कानाँ बिच कुंडल, गले बिच सेली, अग भभूत रमाई रे ।
तुम देख्याँ बिन कल न पड़त है, ग्रिह आँगणी न सुहाई रे ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, दरसण द्यो मोकूँ आई रे ॥५३८॥
पद की प्रथम पक्ति मे प्रयुक्त “म्हाँरो” र्शब्द के स्थान पर “सारो”
का प्रयोग भी कही कही मिलता है । अर्थ सगति के विचार से “म्हारो”
का प्रयोग ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है ।
पद की अन्तिम पक्तियो के निम्नाकित पाठान्तर भी मिलते हैं:—
“मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, ध्यावै सेस महेस”।
और
“मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, तज दियो नगर नरेस”
७
जोगिया जी दरसण दीजो राज ।
कर जोडिया करण कहूँ, म्हाँरी बाहा गहवाँ की लाज ।
लोक लाज जब सारी डारी, छाडचो जग उपदेस ।
ब्रह्म अगिन मे प्राण दाझे, म्हाँरो सुण लीजो आदेस ।
साँच मुद्रा भाव कंथा, साज्यो नष सब साज ।
जोगणि होय जग ढूँढसूं रे, म्हाँरी घर घर फेरी आस ।
दरध दिवानी तन देषि आपनूं, मिलिया परम दयाल ।
मीराँ के मनि आनन्द हुआ, रुम रूम षुसियाल ॥५३९॥†