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सर्वकोश
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

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भावनाओ का प्रभाव सुस्पष्ट होता है। विक्रम की १५, १६ और. १७वी
शताब्दियो का युग विभिन्न धार्मिक भावनाओ से आलोडित एक अपूर्व
युग था। इस युग मे प्रस्फुटित होती प्रेरणा ब्राह्मणो द्वारा प्रसारित पौराणिक
युग-धर्म व इनकी रूढियो को एक गहरी चुनौती थी। इस युग मे
एकेश्वरवाद के शुष्क सिद्धान्तो और प्रचलित कर्मकाण्ड का सर्वथा खण्डन
करने वाली एक अद्भुत व अभूतपूर्व धार्मिक प्रवृत्ति का उदय हुआ । यह
प्रवृत्ति मानव-हृदय की रस-सिक्त सहज भावनाओ के अधिक निकट पडी ।
नवीन उदित होने वाली इस प्रवृत्ति मे तत्व-चिन्तन और आत्मज्ञान के
शुष्क सिद्धान्तो के प्रति गहरी उदासीनता थी तो ब्राह्मणो द्वारा प्रसारित
कर्म-काण्ड मे भी कोई आस्था नही थी। इतना ही नही, बौद्धो की सेवा,
दया और जीव-मात्र के प्रति प्रेम के सिद्धान्तो से भी पूर्ण सतोष न था।
व्यक्तिगत हृदय की प्रवृत्तियाँ ही इस नवीन धर्म की नीव थी। यह धर्म
व्यक्ति का धर्म था। आराध्य के प्रति एकान्त समर्पण ही इसकी विशेषता
थी। इसी धर्म को पडितो ने भक्ति-धर्म की सज्ञा प्रदान की। इस भक्ति-
धर्म का उद्गम कब और कहाँ हुआ, यह निश्चित रूपेण नही कहा जा
सकता यद्यपि श्रीमद्भागवत् मे ही इसका सर्व-प्रथम स्पष्ट उल्लेख मिलता
है। गीता मे प्रतिपादित भक्ति-धर्म मे और जन-समुदाय में प्रसारित भक्ति
धर्म के मूल सिद्धान्तो मे ही गहरा अन्तर है। गीतानुमोदित भक्ति-मार्ग मे
ज्ञान और कर्म भी सर्वथा अपेक्षित है परन्तु जनता मे प्रचलित इस धर्म
मे नारद के भक्ति-सूत्र तथा भागवत के अनुकूल विशुद्ध भावमय मार्ग ही
अपेक्षित है। पूर्ण शान्ति और पूर्ण आनन्द की प्राप्ति ही इसका लक्ष्य था।
जनता मे इस धर्म को प्रसारित करने का श्रेय दक्षिण भारत के वैष्णव
गायक-कवि अलवारो को प्राप्त है। “जाँति पाँति पूछे नही कोई, हरि को
भजै सो हरि का होई” जैसी भावना को जन्म इन्ही अलवार साधको से
मिला। ये स्वय जाति-बहिष्कृत थे और शूद्रो व जाति-बहिष्कृतो को भी
उपदेश देते थे। इन अलवार कवियो के सुमधुर गान से प्रस्फुटित होने वाली
इस विशुद्ध भक्ति-भावना ने कालान्तर मे पडितो और विचारको को
भी प्रभावित किया। फलत हृदयगत भावनाओ से उद्भासित इस धर्म का
भी एक शास्त्र बन गया। विभिन्न यम-नियम और दार्शनिक सिद्धान्तो
के आधार पर एक गहरा वितण्डावाद खडा हो गया जो भक्ति आन्दोलन
के नाम से प्रसिद्ध हुआ। रामानुज इस आन्दोलन के प्रमुख आचार्य थे।