मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 17, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ें७
किया गया। "जहर पियाला", "साँप पिटारा", "सूल सेज" आदि के द्वारा
मीराँ की हत्या का षडयन्त्र भी किया गया। उपर्युक्त प्रयासो में निष्फल
क्रुद्ध राणा ने स्वय ही मीराँ को "खड्ग" के पार उतारने का प्रयास किया।
इन अप्रिय घटनाओ के कारण असन्तुष्ट हो मीराँ स्वय ही एक दिन पति-
गृह त्याग कर अपने पीहर चली जाने को उद्यत होती है। यहाँ पदाभि-
व्यक्तियाँ विरोधात्मक है। कुछ पदाभिव्यक्तियो से मीराँ का अपने पीहर
मेडते पहुँच कर तीर्थ-हेतु जाना सिद्ध होता है, तो अन्य पदाभिव्यक्तियो से बीच
रास्ते से ही तीर्थ की ओर मुड जाना सिद्ध होता है। अधिकांश पदाभि-
व्यक्तियाँ प्रथम मान्यता का ही समर्थन करती है। पति-गृह से असतुष्ट
हो कर मीराँ का पितृ-गृह जाना और कालान्तर मे तीर्थ-हेतु प्रस्थान,
मान्य इतिहास का एक सुनिश्चित पहलू है। इतना ही नही प्राप्त इतिहास
का यही एक ऐसा पहलू है जिस पर सब विद्वान् एकमत है और इतिहास
व पदाभिव्यक्तियो मे भी गहरा सामञ्जस्य है। इस गहरे साम्य के बावजूद भी
इस तीर्थयात्रा के लक्ष्य को लेकर दोनो मे गहरा विरोध है। पदाभिव्यक्तियो
के आधार पर जहाँ मीराँ का पितृ-गृह त्याग कर सीधे द्वारिका जाना
सिद्ध होता है, वहाँ प्राप्त वृत्तान्त द्वारा मीराँ का वृन्दावन होते हुए द्वारिका
जाना ही मान्य है। "डॉवो तो छोडयो मीराँ मेडतो, पेलॉ पोखर
जाय" (पद स० १, पाठान्तर २) "डॉवो तो छोडयो मीराँ मेडतो, पुष्कर
न्हावा जाय" (पद स० ७) "डॉवो तो छोडयो मीराँ मेडतो, पूठ दयी
चितौड" जैसी अभिव्यक्तियो के आधार पर मीराँ द्वारा की गयी तीर्थ-यात्रा
का मार्ग निर्धारित किया जा सकता है। ध्रुवदास रचित 'भक्त नामावली'
मे ही मीराँ की वृन्दावन-यात्रा का सर्व-प्रथम उल्लेख है। मुशी देवीप्रसाद
भी इस विषय मे अनिश्चित ही है। इतना ही नही, उनके मतानुसार मीराँ
ने सम्भवत दो बार तीर्थ-यात्रा की थी। घटना और समय के क्रमानुसार
विचार करने पर मीराँ द्वारा की गई वृन्दावन-यात्रा असम्भव ही सिद्ध होती है।
"इन सरवरिया री पाल" जैसे पदो से उपर्युक्त घटना पर और भी
प्रकाश पडता है। ऐसी पदाभिव्यक्तियो से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि
सम्पूर्ण राजसी ठाट को छोड कर मीराँ अकेली ही "सरवर के पाल"
खडी है। गृह-त्याग कर "पेलॉ पोखर" या "पुष्कर न्हाने" जाने जैसी
उपर्युक्त पदाभिव्यक्तियो से लक्षित होनेवाले तीर्थ-यात्रा का मार्ग
निर्देश और घटना-क्रम का सामञ्जस्य भी ठीक बैठ जाता है। गृह-त्याग