मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 11, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राक्कथन
'मीराँ-बृहत्-पद-संग्रह' जैसे नाम से ही पुस्तक का विषय स्पष्ट है।
मीराँ के पदो के कई संग्रह प्रकाशित हो चुके है तथापि ऐसा कोई संग्रह
प्राप्त नही जिस मे मीराँ के नाम पर प्रचलित प्राय सभी पद और उसके
पाठान्तर भी प्राप्त हो सके। अपनी प्रथम पुस्तक, 'मीराँ, एक अध्ययन'
लिखते हुए मुझ को एक ऐसे बृहत्-संग्रह की आवश्यकता प्रतीत हुई अत
प्रस्तुत पुस्तक उपस्थित कर के मै ने एक प्रयास किया है। प्रकाशित व
अप्रकाशित संग्रहों व मौखिक परम्परा से प्राप्त पद और उन के पाठान्तरो
का संग्रह कर मीराँ के नाम पर प्रचलित सभी पदो को एकत्रित करने
का प्रयास किया गया है तथापि बहुत सम्भव है कि कुछ पद फिर भी
छूट गये हो।
[अद्यावधि प्राप्त मीराँ का जीवन-वृत्तान्त सुनिश्चित इतिहास की
पुष्टता को प्राप्त नही कर सका। भक्त-गाथाओ के रूप मे प्राप्त प्राचीन-साहित्य-
से भी इस ओर कोई स्पष्ट प्रकाश नही पडता। प्राप्त पदो मे भी कोई
स्पष्ट उल्लेख नही मिलता। इतना ही नही, प्राप्त पदो मे अधिकांश की
प्रामाणिकता असदिग्ध नही। उपर्युक्त परिस्थितियो मे किसी भी एक आधार
पर सर्वथा निर्भर नही किया जा सकता। सम्पूर्ण प्राप्त सामग्री की समन्वयात्मक
विवेचना ही सत्य के सर्वाधिक निकट पड सकती है।]
[प्राप्त सामग्री मे भक्त-गाथाएँ महत्वपूर्ण बहिसाक्ष्य सिद्ध होती है।
भक्तो की रचनाओ मे सर्व-प्रथम उल्लेख नाभादास कृत 'भक्तमाल' मे
मिलता है। नाभादास मीराँ के सुदृढ भक्ति-भाव की भूरि-भूरि प्रशसा
करते है तथापि जीवन-वृत्त पर कोई प्रकाश नही डालते। महाकवि देव
भी नाभादास का ही अनुसरण करते है। प्रियादास कृत 'भक्तमाल' की
टीका और ध्रुवदास रचित 'भक्तनामावली' मे मीराँ का उल्लेख है। ये
दोनो ही उल्लेख जनश्रुतियो पर आधारित है अत इन पर भी सर्वथा
निर्भर नही किया जा सकता। प्रियादास कृत टीका से मीराँ के विवाह तक
उनके माता और पिता दोनो के ही जीवित रहने का प्रमाण मिलता है। मीराँ की
बृन्दावन यात्रा का सर्व-प्रथम उल्लेख भी ध्रुवदास मे ही मिलता है। रघुराजसिंह
कृत 'भक्तमाल' मे भी मीराँ का उल्लेख मिलता है। यह ग्रथ भी