मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
३६४ मयमतम्
✵ शुकविमानम् ✵
पञ्चाष्टभक्तिविस्तारं दैर्घ्यं षड्विंशदङ्घ्रिकम्।
अष्टादशाङ्घ्रिकं चान्तश्चतुष्कोटिसमन्वितम् ॥२१९॥
द्वात्रिंशत् स्वस्तिकं चैव द्विसप्ततिवलक्षकम्।
चतुष्कूटयुतं मूर्ध्नि द्विरष्टप्रांशुरश्मयः ॥१२०॥
अन्तर्बहिस्तु कूटानि त्रिरष्टैकादशद्वयम्।
कर्णधाराष्टसंयुक्तं नाम्ना शुकविमानकम् ॥२२१॥
शुकविमान—यह सभागार पाँच भाग चौड़ा एवं आठ भाग लम्बा होता है।
इसमें छब्बीस स्तम्भ होते हैं। अट्ठारह स्तम्भ भीतर होते हैं एवं चार कोटियों ( कोने
की लुपाओं ) से युक्त होते हैं। यह बत्तीस स्वस्तिक एवं बहत्तर वलक्षों से युक्त,
शिरोभाग पर चार कूटों से युक्त तथा सोलह रश्मियों ( लुपाओं ) से युक्त होता है।
यह चौबीस अन्तःकूटों एवं बाईस बहिःकूटों से युक्त होता है। आठ कर्णधाराओं से
समन्वित यह सभागार शुकविमान संज्ञक होता है॥२१९-२२१॥
✵ श्रीप्रतिष्ठितम् ✵
पञ्चभक्त्या विशालं तु नवभक्त्या तदायतम्।
अष्टाविंशतिगात्राणि द्वात्रिंशत् स्वस्तिपुच्छकम् ॥२२२॥
अन्तर्विंशतिकं स्तम्भं मध्यरश्मि तथैव च।
पञ्चकूटयुतं मूर्ध्नि चतुष्कोटिसमन्वितम् ॥२२३॥
षष्ट्युत्तरशतं तत्र वलक्षं प्रविधीयते।
द्विपञ्चांशं तु कूटानि नाम्नैतच्छ्रीप्रतिष्ठितम् ॥२२४॥
श्रीप्रतिष्ठित—इस सभागृह की चौड़ाई पाँच भाग एवं लम्बाई नौ भाग होती है।
इसमें अट्ठाईस गात्र ( स्तम्भ, पाद ), बत्तीस स्वस्तिपुच्छ, बत्तीस भीतरी भाग के स्तम्भ
एवं उसी प्रकार मध्य रश्मियाँ ( मध्य में स्थित लुपायें ), शिरोभाग पर पाँच कूट एवं
चार कोटियों ( कोटि-लुपाओं ) से यह युक्त होता है। इसमें एक सौ साठ वलक्ष होते
हैं। इसमें दस कूट होते हैं एवं इस सभागृह की संज्ञा श्रीप्रतिष्ठित होती है।
तदेव व्यासायामे तु भक्तित्रयविवर्धनात्।
चतुश्शालायतास्त्राभा द्विषड्द्विरष्टपादकाः ॥२२५॥
अन्तर्बहिस्तु भक्त्या च वारं शाला द्विभक्तिका।
चतुर्द्विसप्ततिस्तम्भमन्तर्बाह्ये तु कीर्तितम् ॥२२६॥
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३६५
प्रासादवदलङ्कृत्या चतुर्द्वारद्विचूलिकम् ।
भूपतेः श्रीप्रतिष्ठा स्यात् सभेयं श्रीप्रतिष्ठितम् ॥२२७॥
उसी लम्बाई एवं चौड़ाई के माप में तीन-तीन भाग बढ़ाने से चार आयताकार
भवन बनते हैं, जिनमें बारह भीतरी भाग में एवं सोलह बाहरी भाग में स्तम्भ बनते
हैं। इसमें एक भाग से वार ( मार्ग या पोर्च ) तथा दो भाग से शाला निर्मित होती है।
बाहरी एवं भीतरी भाग में चार वार ( चार स्थानों पर ) बहत्तर स्तम्भ बनते हैं। मन्दिर
के सदृश अलंकृत कर इसमें चार द्वार एवं दो चूलिकायें निर्मित होती हैं। यह
श्रीप्रतिष्ठित संज्ञक सभागार राजा के लिये श्रीप्रतिष्ठा वाला ( प्रतिष्ठाकारक ) होता
है॥२२५-२२७॥
एकैकभागवृद्ध्या तु भवत्युक्तेतरा सभा ।
छन्दं विकल्पमाभासं तत्तन्नाम्ना विधीयते ॥२२८॥
स्तम्भरश्मिवलक्षं च कूटं युक्त्या प्रयोजयेत् ।
यथारुचि यथाशोभं व्यासायामे तु भक्तयः ॥२२९॥
उपर्युक्त माप में एक-एक भाग बढ़ाने पर सभाओं के अन्य प्रकार प्राप्त होते हैं।
उनके नाम छन्द, विकल्प एवं आभास हैं। उनमें स्तम्भ, रश्मि ( लुपा ), वलक्ष एवं
कूट का आवश्यकतानुसार निर्माण करना चाहिये। लम्बाई एवं चौड़ाई के भाग ( माप
की ईकाई ) इच्छानुसार एवं जिससे सभी सुन्दर लगे, उस प्रकार रखना चाहिये।
प्रांशुरश्मियुतं कूटं कूटं वा चतुरस्रकम् ।
दण्डिकानिर्गमसमो पूर्वपादोत्तरोद्गमः ॥२३०॥
तुलाश्रप्रस्तरांशेन चूलिकाभागलम्बिकम् ।
ऋजु वा स्वस्तिकं ज्ञेयं वलक्ष्याय प्रवेशिता ॥२३१॥
कूट को लम्बी रश्मियों से युक्त निर्मित करना चाहिये अथवा कूट को चौकोर
बनाना चाहिये। स्तम्भों के ऊपर उत्तर का उद्गम ( ऊँचाई ) दण्डिका के निर्गम के
बराबर रखना चाहिये। चूलिका का लम्बिक ( ऊपर लटकता भाग ) तुला एवं प्रस्तर
के भाग के अनुसार होना चाहिये। ऋजु अथवा स्वस्तिक वलक्ष में प्रविष्ट होना चाहिये।
शिखावर्ग तथा सर्वे निष्कूटं च कचग्रहा ।
चूलिकाद्वयमध्यस्था नाम्ना स्याद्दर्णपट्टिका ॥२३२॥
वलयं त्रिगुणं व्यासाद् बाहुल्या लुपया समा ।
लुपापार्श्वद्वयारूढा वलयप्रोक्तनालिका ॥२३३॥
शिखावर्ग ( शिरोभाग ) तथा सभी कचग्रह विना कूट के होते हैं। दो चूलिकाओं
३६६ मयमतम्
के मध्य में स्थित संरचना वर्णपट्टिका संज्ञक होती है। वलय व्यास ( चौड़ाई ) से तीन
गुना होना चाहिये एवं बाहुल्य को माप में लुपा के समान होना चाहिये। लुपा के दोनों
पार्श्वों में वलयनालिका होनी चाहिये।।२३२-२३३।।
प्रतिचूलिकविन्यासा मुद्गरालम्बना स्थिरा।
प्रतिलोमानुलोमाभ्यामङ्गणास्ते वलक्षका ।।२३४।।
द्विकोटिसङ्गममखे वेशगर्भप्रदक्षिणे।
प्रथमं स्तम्भनीया च शिल्पिकर्ता विधीयते ।।२३४।।
प्रतिचूलिक का विन्यास एवं मुद्गर का आलम्बन स्थिर होता है। आँगन के वलक्ष
अनुलोम ( नीचे से ऊपर सीधे ) एवं प्रतिलोम ( विपरीत विधि ) से निर्मित होते हैं।
दो कोटियों ( कोटि-लुपाओं ) का संयोग गर्भगृह के दाहिने छिद्र में होता है। शिल्पी
को सर्वप्रथम स्तम्भ का विधान करना चाहिये।।२३४-२३५।।
पादबन्धमधिष्ठानं स्तम्भायामार्धमिष्यते ।
अनुक्तं यदि किञ्चित्तद्वक्त्या तत्र प्रयोजयेत् ।।२३६।।
हलाङ्गवत्कुड्ययुता सरङ्गका
विरङ्गका वाप्यथ गर्भगॆहका।
सभेति सभ्यैरुदिता सनातना
सभालयत्त्वादिह सभ्यमार्गणम् ।।२३७।।
इति मयमते वास्तुशास्त्रे मण्डपसभाविधानो
नाम पञ्चविंशोऽध्यायः
पादबन्ध अधिष्ठान स्तम्भ के माप का आधा होना चाहिये। यदि किसी अंग आदि
का वर्णन नहीं किया गया हो तो उसका प्रयोग आवश्यकतानुसार करना चाहिये। सभा
हल के लाङ्गल के समान भित्ति से युक्त, मध्य भाग रङ्ग से युक्त या रङ्ग से रहित हो
सकता है। सभा सभा के अनुरूप ( सभ्य ) लोगों से बनती है—ऐसा प्राचीन विद्वानों
ने कहा है। सभ्यजनों के मार्ग सभागार से निर्धारित होते हैं।।२३६-२३७।।
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३६७
व्याख्यात्मक टिप्पणी
मण्डप-निर्माणार्थ स्थलचयन ( श्लोक २-३ )
मण्डप के निर्माणयोग्य स्थल मानसार के अनुसार सभी देवालयों का साम्मुख्य,
पुण्यक्षेत्र, आराम, ग्रामादि का मध्य, चारो दिशायें, दिक्कोण, भीतर या बाहर तथा
गृह के मध्य भाग या गृह के सम्मुख भाग हैं—
देवालयेषु सर्वेषु सम्मुखे बहुमण्डपम्।
पुण्यक्षेत्रे तथारामे ग्रामादौ वास्तुमध्यमे ।।
चतुर्दिक्षु विदिक्षु वापि बाह्याभ्यन्तरोऽथवा।
नराणां गृहमध्ये च सम्मुखे मण्डपं तु वा।।
( मानसार-३४ )
मण्डप ( श्लोक ३-५ )
मानसार ( अ. ३४ ) में सभी के वासयोग्य याग-मण्डप, राजाओं के अभिषेक-
योग्य नृत्त-मण्डप, विवाह के लिये मैत्र-मण्डप, उपनयन मण्डप, स्नपन मण्डप,
बच्चों का मुखालोक मण्डप, सती-मण्डप, क्षौरकर्म के लिये मण्डप, अग्निकार्य के
लिये मण्डप तथा सुखान्वितार्थ-मण्डप का वर्णन प्राप्त होता है—
सर्वेषां वासयोग्यार्थं मण्डपं यागमण्डपम्।
नृपाणामभिषेकार्थं मण्डपं नृत्तमण्डपम्।।
पाणिपीडनसिद्ध्यर्थं तथा मैत्रं च मण्डपम्।
उपनयनमण्डपं चैव तथा च स्नपनमण्डपम्।।
मण्डप- भेद ( श्लोक ६-७ )
मानसार (३४.७६-७८) के अनुसार मण्डप सात प्रकार के होते हैं—हिमज,
निषदज, विजय, माल्यज, पारियात्र, गन्धमादन एवं हेमकूट—
प्रथमं हिमजं चैव ततो निषदजं भवेत्।
तृतीयं विजयं चैव चतुर्थं माल्यजं तथा।।
पञ्चमं पारियात्रं च षष्ठं स्याद् गन्धमादनम्।
सप्तमं हेमकूटं स्यान्मण्डपाख्यानि सप्तकम्।।
( विश्वकर्मवास्तुशास्त्र-७४.१९-३३ )
में सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त, इन्द्रकान्त, गन्धर्वकान्त, ब्रह्मकान्त मण्डपों का वर्णन
प्राप्त होता है।
३६८ मयमतम्
शिल्परत्न (पूर्वभाग, ३९ अ.) में मुखमण्डप, अर्चना मण्डप, नाट्य मण्डप,
नन्द्यावर्त मण्डप, स्वस्तिक मण्डप, श्रीप्रतिष्ठित मण्डप, जयभद्र मण्डप, माणिभद्र
मण्डप, प्रतिमा मण्डप, स्नान मण्डप, नृत्त मण्डप, ब्रह्मासन मण्डप, सिद्ध मण्डप,
श्रीकर मण्डप, विजय मण्डप, भद्र मण्डप, सभारङ्ग मण्डप आदि विभिन्न प्रकार के
मण्डप, अधिवास मण्डप तथा नाट्य मण्डप आदि विविध मण्डपों का उल्लेख किया
गया है।
योनिकुण्ड-निर्माणविधि ( श्लोक ४७ )
योनिकुण्ड के निर्माण की विधि दौलतराम गौड़-प्रणीत सात 'कुण्ड निर्माण
स्वाहाकार पद्धति' ( प्रकाशक श्री ठाकुर प्रसाद पुस्तक भण्डार, वाराणसी, १९८२ )
में इस प्रकार दी गई है—
क्षेत्रे जिनांशे पुरतः शरांशान् संवर्ध्य च स्वीयरदांशमुक्तान्।
कर्णाङ्घ्रिमानेन लिखेन्दुखण्डे प्रत्यक् पुरोऽङ्गाद्धुणतो भगाभम्।।
चौबीस अंगुल का चतुरस्र बनाकर उसमें दक्षिणोत्तर आधे भाग में एक लम्बी रेखा
बनानी चाहिये। पुनः पश्चिमोत्तर भाग के आधे भाग का दो भाग पूर्व एवं पश्चिम की
ओर करे। फिर उसके आधे में एक कोने से दूसरे कोने तक टेढ़ी रेखा खींचनी चाहिये।
इसी प्रकार दूसरे कोने से रेखा निर्मित होती है। इस प्रकार दोनों आधे भाग में चार
टेढ़ी रेखायें होंगी। पूर्वनिर्मित चतुरस्र के ठीक पूर्व में मध्य से पांच अंगुल, एक यव
तथा दो यूका बढ़ा दे। फिर चतुरस्र के ठीक मध्य से अर्थात् दक्षिण दिशा से सटी
एक टेढ़ी रेखा इस प्रकार खींचे, जो पूर्व के मध्य में बढ़ी हुई पाँच अंगुल, एक यव
एवं यूका वाली रेखा से ऊपरी भाग से मिल जाय। इसी तरह उत्तर दिशा से रेखा खींच
कर बढ़ी रेखा से मिला दे। तदनन्तर नीचे परकाल को दक्षिण की ओर से और उत्तर
की ओर से अलग-अलग घुमाकर घुमाते हुये पश्चिम भाग के ठीक मध्य में मिला दे।
इस प्रकार योनिकुण्ड तैयार होता है।
अर्धचन्द्रकुण्ड ( श्लोक ४८ )
पूर्वोक्त ग्रन्थ में अर्धचन्द्र कुण्ड का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है—
स्वशतांशयुतेषु भागहीनस्वधरिश्रीमितकर्कटेन मध्यात्।
कृतवृत्तदलेऽग्रतश्च जीवां विदधात्विन्दुदलस्य साधुसिद्धयै।।
चौबीस अंगुल का चतुरस्र बनाकर उस चतुरस्र के पूर्व दिशा में ढाई अंगुल
हटाकर दक्षिणोत्तर एक लम्बी रेखा खींचनी चाहिये। उसी रेखा के मध्य से उन्नीस
अंगुल, एक यव, एक यूका, पाँच लिक्षा, सात बालाग्र परकाल से नापकर अर्थात्
साढ़े उन्नीस अंगुल को परकाल से नाप कर टेढ़ी रेखा खींचने से अर्धचन्द्र कुण्ड
निर्मित होता है।
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३६१
त्रिकोणकुण्ड ( श्लोक ४९ )
त्रिकोण कुण्ड बनाने की विधि पूर्वोक्त ग्रन्थ में इस प्रकार है—
वह्नयंशं पुरतो विधाय च पुनः श्रोण्योश्चतुर्थांशकम्।
चिह्नेषु त्रिषु सूत्रदानत इदं स्यात् त्र्यस्रिकप्रोज्झितम्।।
चौबीस अंगुल के चतुरस्र के बाहर पश्चिम की ओर से वायव्य कोण और नैर्ऋत्य
कोण की ओर छः-छः अंगुल और बढ़ाना चाहिये। अर्थात् छः अंगुल वायव्य कोण
में और छः अंगुल नैर्ऋत्य कोण में बढ़ाना चाहिये। पुनः उस चतुरस्र की पूर्व दिशा
के मध्य से आठ अंगुल लम्बी रेखा सीधी पूर्व दिशा की ओर बढ़ा दे। पुनः वायव्य
कोण में बढ़ी हुई रेखा के अन्तिम भाग से एक टेढ़ी रेखा पूर्व दिशा में बढ़ी हुई रेखा
से मिला दे। इसी प्रकार नैर्ऋत्य कोण से रेखा खींचने पर त्रिकोण कुण्ड तैयार होता है।
वृत्त कुण्ड बनाने की विधि इस प्रकार है—
विश्वांशैः स्वजिनांशकेन सहितै क्षेत्रे जिनांशे कृते।
व्यासार्धेन मितेन मण्डलमिदं स्याद् वृत्तसंज्ञं शुभम्।।
चौबीस अंगुल के चतुरस्र के मध्य से साढ़े तेरह अंगुल (तेरह अंगुल, चार यव,
दो यूका, पाँच लिक्षा, तीन बालाग्र) का परकाल लेकर गोलाकार आकृति बनाने पर
वृत्तकुण्ड का निर्माण होता है।
षट्कोण कुण्ड ( श्लोक ५० )
'कुण्डनिर्माण-स्वाहाकारपद्धतिः' में षट्कोण कुण्ड-निर्माण की दो विधियाँ वर्णित
हैं। प्रथम विधि के अनुसार चौबीस अंगुल के चतुरस्र के ऊपर अट्ठारह अंगुल, दो
यव के माप का वृत्त खींचे और उस पर छः निशान बराबर दूरी पर लगा दे। उन चिह्नों
से मिलाते हुये रेखा खींचने पर षडस्र कुण्ड की आकृति निर्मित होती है—
भक्तक्षेत्रजिनांशैर्धृतिमितलवकैः स्वाङ्घ्रिशैलांशयुक्तैः
व्यासाद्धैन्मण्डले तन्मितधृतगुणके कर्कटे चेन्दुदिक्तः।
षट्चिह्नेषु प्रदद्याद्रसमितगुणकानेकमोक्तु हित्वा
नाशै सन्ध्यतु दोषामपि च वृतिकृतेर्नेत्ररम्यं षडस्रम्।।
दूसरी विधि इस प्रकार है—
अथवा जिनभक्तकुण्डमानतिथिभागैः स्वरवभूपभागहीनैः।
मितकर्कटोद्भव वे तु वृत्ते विधुदिक्तः समषड्भुजैः षडस्रम्।।
चौबीस अंगुल का चतुरस्र बनाकर उसके ऊपर चौदह अंगुल, सात यव और
- यूका का एक गोलाकार वृत्त बनाना चाहिये। उस वृत्त में छः बराबर चिह्न कर रेखायें
खींचने से षडस्र कुण्ड निर्मित होता है।
मय०-२४
३७० मयमतम्
पद्मकुण्ड ( श्लोक ५१ )
पद्मकुण्ड की विधि पूर्वोक्त ग्रन्थ में इस प्रकार है—
अष्टांशाच्च यतश्च वृत्तशरके यत्रादिमं कर्णिका
युग्मे षोडशकेशराणि चरमे स्वाष्टत्रिभागोनिते।
भक्ते षोडशधा शरान्तरधृते स्युः कर्कटैऽष्टौ छदाः
सर्वास्तानखनकर्णिकां त्यज निजायामोच्चकां स्यात्कजम्।।
ग्रन्थकार के अनुसार चौबीस अंगुल का चतुरस्र बनाकर उसके ठीक मध्य में तीन
अंगुल का वृत्त बनाना चाहिये। तदनन्तर उस वृत्त के ऊपर छः अंगुल, नौ अंगुल,
बारह अंगुल, साढ़े चौदह अंगुल माप के परकाल से वृत्त निर्मित करना चाहिये। तदनन्तर
तीन तथा छः अंगुल के वृत्त को छोड़कर पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर दिशा में एक-
एक चिह्न अंकित करना चाहिये। पुनः नैर्ऋत्य, वायव्य, ईशान और अग्निकोण में
एक-एक चिह्न अंकित करना चाहिये। इस प्रकार आठ चिह्न बनते हैं। पुनः दिशाओं
एवं विदिशाओं में मध्य में आठ चिह्न बनाना चाहिये। सोलह चिह्न हो जाने पर एक-
एक चिह्न छोड़कर पद्माकृति निर्मित करने पर पद्मकुण्ड का निर्माण होता है।
अष्टकोण कुण्ड ( श्लोक ५२ )
अष्टकोण कुण्ड के निर्माण की दो विधियाँ पूर्वोक्त ग्रन्थ में वर्णित हैं। प्रथम विधि
के अनुसार चौबीस अंगुल चतुरस्र के ठीक मध्य में साढ़े अट्ठारह अंगुल का वृत्त
निर्मित कर उसमें बराबर दूरी पर सोलह चिह्न लगाना चाहिये। तदनन्तर दिशा एवं
दिक्कोण के मध्य चिह्न से दिशाओं एवं विदिशाओं के चिह्नों को छोड़कर रेखायें
खींचने से अष्टास्र कुण्ड निर्मित होता है—
क्षेत्रे जिनांशे गजचन्द्रभागैः स्वाष्टाक्षिभागेन युतैस्तु वृत्ते।
विदिग्दिशोरन्तरतोऽष्टसूत्रैस्तृतीययुक्तैरिदमष्टकोणम् ।।
दूसरी विधि के अनुसार चौबीस अंगुल के चतुरस्र पर चौदह अंगुल, दो यव एवं
तीन यूका माप का एक वृत्त खींचना चाहिये। इस वृत्त में आठ चिह्न दिशा एवं विदिशा
छोड़कर ( उनके मध्य में ) बराबर दूरी पर लगाना चाहिये एवं उन चिह्नों को रेखाओं
से मिलाने पर अष्टास्र कुण्ड निर्मित होता है—
मध्ये गुणे वेदमयैर्विभक्ते शक्रैर्मिजर्ध्याब्धिलवेन युक्तैः।
वृत्ते कृते दिग्विदिगान्तराले गजैर्भुजैः स्यादथवाष्टकोणम्।।
जलक्रीड़ा मण्डप ( श्लोक १७६-१८१ )
जलक्रीड़ा-मण्डप का वर्णन विभिन्न वास्तुग्रन्थों में प्राप्त होता है। राजभवन की
क्रीडा-वाटिका में जलयन्त्रों से युक्त धारा-मण्डप का निर्माण होता है—
पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३७१
वामे भागे दक्षिणे वा नृपाणां त्रेधा कार्या वाटिका क्रीडनार्थम्।
एकद्वित्रिदण्डसंख्याशतं स्यान्मध्ये धारामण्डपं तोययन्त्रैः ।।
( राजवल्लभमण्डन-९.१८ )
जलयन्त्र की स्थापना के लिये भद्र, जलवापी, वेदिका, कोणों में कूप एवं मध्य
में बारह स्तम्भ होते हैं—
क्षेत्रं सप्तविभागभाजितमतो भद्रं च भागत्रयं
तन्मध्ये जलवापिका जिनपदैरेकांशतो वेदिका।
स्तम्भैर्द्वादशभिश्च मध्यरचितः कोणेषु कूपान्वितः
कर्तव्यो जलयन्त्र एष विधिवद् भोगाय पृथ्वीभुजाम् ।।
( राजवल्लभमण्डन-९.१९ )
जलयन्त्र एवं धारा-मण्डप का वर्णन अपराजितपृच्छा (अ.-८८-९९) में विस्तार
से प्राप्त होता है।
अलिन्द्र ( श्लोक १९३ )
ग्रन्थ में वर्णित 'अलिन्द्र' सम्भवतः अन्य वास्तुग्रन्थों में वर्णित अलिन्द है, जिसे
ओसारा या बरामदा कहा जाता है।