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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

३१८ मयमतम्
स्वस्तिकाकृतिकं नासो सर्वत्र प्रविधीयते ।
मुखेऽमुखे महानासी वंशनासी द्विपाश्र्वयोः ॥८७॥
शिरःक्रकरकोष्ठं वा युग्मस्थूपिसमायुतम् ।
लुपारोहिशिरो वाऽपि मण्डपाकृतिरेव वा ॥८८॥
स्वस्तिक के आकृति की नासा ( सजावटी छोटी खिड़की ) सभी स्थानों पर होनी
चाहिये। सामने एवं पीछे महानासी तथा दोनों पार्श्वों में वंशनासी का निर्माण करना
चाहिये। शिरोभाग में क्रकर कोष्ठ ( विशिष्ट आकृति ) या सम संख्या में स्थूपी होनी
चाहिये। साथ ही इसके शिरोभाग पर लुपा हो अथवा इसकी आकृति मण्डप के सदृश
होनी चाहिये॥८७-८८॥
✺ रतिकान्त-द्वारशोभा ✺
रतिकान्तस्य संस्थानं विस्ताराध्यर्धमायतम् ।
कूटकोष्ठादि सर्वाङ्गं पूर्ववत् परिकल्पयेत् ॥८९॥
शालाकारशिरस्तस्मिन् षण्णासी मुखपृष्ठयोः ।
सार्धकोटिसमायुक्तं मध्यवेशनसंयुतम् ॥९०॥
रतिकान्त रीति से द्वारशोभा—रतिकान्त शैली में लम्बाई चौड़ाई से डेढ़ गुनी
अधिक होती है। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अंगों को पूर्ववर्णित विधि से करना
चाहिये। इसका शिरोभाग शाला के आकार का होना चाहिये एवं षण्णासी ( छोटी-
छोटी छः सजावटी खिड़कियाँ ) सामने एवं पीछे होनी चाहिये तथा अर्धकोटि
( विशिष्ट आकृति ) का निर्माण करना चाहिये। स्थूपियों की संख्या सम होनी चाहिये।
इसे अन्तःपाद ( भीतरी स्तम्भ ) एवं उत्तर से युक्त तथा मध्यवेशन ( मध्य भाग में
कक्ष ) से युक्त निर्मित करना चाहिये॥८९-९०॥
✺ कान्तविजय-द्वारशोभा ✺
कान्तविजयसंस्थानं तारत्रिद्व्यंशमायतम् ॥९१॥
पूर्ववद् भूमिभागं च कूटकोष्ठादि पूर्ववत् ।
अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं नानाङ्गैः समलंकृतम् ॥९२॥
शिखरे च मुखे पृष्ठे षण्णास्यः पार्श्वयोर्द्वयोः ।
सभाकारः शिरस्तस्मिन्नयुग्मस्थूपिकान्वितम् ॥९३॥
द्वारशोभात्रयं प्रोक्तं द्वाराङ्गं मुखशोभितम् ।
कान्तविजय रीति से द्वारशोभा—कान्तविजय द्वारशोभा की लम्बाई उसकी

चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३१९
चौड़ाई से दो तिहाई अधिक होती है। इसके तल पूर्व वर्णित एवं कूट तथा कोष्ठ आदि
अंग भी पूर्ववर्णित विधि से निर्मित करने चाहिये। इसे भीतरी स्तम्भों एवं उत्तर से युक्त
तथा विविध अंगों से सुसज्जित करना चाहिये। शिखर के आगे एवं पीछे षण्णासी
(छः नासियाँ) तथा दोनों पार्श्वों में सभा के आकार का शिरोभाग होना चाहिये, जिस
पर विषम संख्या में स्थूपिकायें होनी चाहिये।
इस प्रकार द्वारशोभा के तीन भेदों का वर्णन किया गया, जो अपने सभी अंगों
से युक्त हैं एवं जिनका मुखभाग अलंकृत है।।९१-९३।।
✵ विजयविशाल-द्वारशाला ✵
विजयविशालसंस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् ॥९४॥
सपादं वाऽथ सार्धं वा पादोनद्विगुणायतम् ।
सप्तनन्दशिवांशैश्च तलं द्वित्रिचतुष्टयम् ॥९५॥
द्वारशालासंज्ञक गोपुर का विजयविशाल प्रकार—विजयविशाल द्वारशाला
की लम्बाई उसकी चौड़ाई की

३२० मयमतम्
विशालालय प्रकार की द्वारशाला—विशालालय द्वारशाला की लम्बाई उसकी
चौड़ाई से चतुर्थांश कम दुगुनी रखनी चाहिये। इसके तल पूर्ववर्णित विधि से निर्मित
होने चाहिये तथा इसे कूट एवं कोष्ठ आदि से सुसज्जित होना चाहिये। इसको शीर्ष-
भाग पर अर्धकोटि, भद्र तथा आगे एवं पीछे भद्रनासी से युक्त करना चाहिये। दोनों
पार्श्वों में चार नासियाँ, शिखर भाग शालायुक्त एवं विषम संख्या में स्थूपिकायें निर्मित
होनी चाहिये। शेष अंग पूर्व के सदृश निर्मित होने चाहिये।।९८-९९।।
☀ विप्रतीकान्त-द्वारशाला ☀
विप्रतीकान्तसंस्थानं त्र्यंशे द्व्यंशाधिकायतम् ।।१००।।
कूटकोष्ठादि सर्वाङ्गं पूर्ववत् परिकल्पयेत् ।
पूर्ववद् भूमिभागं च चतुर्दिग्गतभद्रकम् ।।१०१।।
चतस्रः शिखरे नास्यः शिरो भद्रसमन्वितम् ।
अन्तः पादोत्तरैर्युक्तमयुग्मस्थूपिकान्वितम् ।।१०२।।
द्वारशालात्रयं प्रोक्तं सर्वाङ्गं परिमण्डितम् ।
विप्रतीकान्त रीति से द्वारशाला—विप्रतीकान्त द्वारशाला की लम्बाई उसकी
चौड़ाई से दो तिहाई अर्थात् तीन भाग में से दो भाग के बराबर अधिक रखनी चाहिये।
कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अंगों को पहले के समान निर्मित करना चाहिये। तलों का
निर्माण पूर्ववर्णित विधि से करना चाहिये। चारो दिशाओं में भद्रक, शिखर पर चार
नासियाँ एवं शिरो भाग को भद्र से युक्त करना चाहिये। इसके भीतरी भाग में स्तम्भ
एवं उत्तर निर्मित करना चाहिये एवं इसे विषम संख्या में स्थूपिकाओं से युक्त करना
चाहिये। इस प्रकार सभी अवयवों से युक्त तीन प्रकार की द्वारशालाओं का वर्णन किया
गया।।१००-१०२।।
☀ श्रीकान्त-द्वारप्रासादः ☀
श्रीकान्तस्य च संस्थानं विस्ताराध्यर्धमायतम् ।।१०३।।
नन्दपङ्क्तिशिवांशैश्च त्रिचतुष्पञ्चभूमयः ।
अन्तः पादोत्तरैर्युक्तमन्याराद्यैरलंकृतम् ।।१०४।।
द्वारस्योर्ध्वेऽन्तरे रङ्गं परिभद्रसमन्वितम् ।
मुखेऽमुखे महानासी शालाकारशिरो भवेत् ।।१०५।।
अर्धकोटिसमायुक्तं चतुष्पञ्जरशोभितम् ।
द्वारप्रासादसंज्ञक गोपुर का श्रीकान्त प्रकार—श्रीकान्त द्वारप्रासाद की लम्बाई

चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३२१
उसकी चौड़ाई से डेढ़ गुनी अधिक होती है। इसकी चौड़ाई को नौ, दस या ग्यारह
भागों में बाँटना चाहिये। इसमें तीन, चार या पाच तल का निर्माण करना चाहिये। द्वार
के ऊपर भीतरी भाग में रङ्ग एवं परिभद्र निर्मित करना चाहिये। इसका शिरोभाग शाला
( कोष्ठक ) के आकार का हो एवं सामने तथा पीछे महानासी का निर्माण होना
चाहिये। इसे अर्धकोटि से युक्त एवं चार पञ्जरों से सुशोभित होना चाहिये।
✺ श्रीकेश-द्वारप्रासादः ✺
श्रीकेशस्य तु संस्थानं तारत्रिभागमायतम् ॥१०६॥
पूर्ववद् भूमिभागं च द्वारे निर्गमकुट्टिमम् ।
सान्धारं कूटकोष्ठादिसर्वावयवसंयुतम् ॥१०७॥
श्रीकेश रीति से द्वारप्रासाद—श्रीकेश द्वारप्रासाद में लम्बाई चौड़ाई से तीन
गुनी अधिक होती है। इसके तल पहले के सदृश होने चाहिये एवं द्वार पर निर्गम
कुट्टिम ( थोड़ा बाहर निकला हुआ अधिष्ठान ) निर्मित होना चाहिये। इसे अन्धार
( मध्य में स्थित मार्ग ) से युक्त एवं कूट-कोष्ठ आदि सभी अवयवों से युक्त होना
चाहिये॥१०६-१०७॥
नानामसूरकस्तम्भवेदिकाद्यैरलंकृतम् ।
अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं मध्ये वारणशोभितम् ॥१०८॥
मुखेऽमुखे महानासी शालाकारशिरःक्रियम्।
पार्श्वयोर्वेदनास्यः स्युः सर्वावयवशोभितम् ॥१०९॥
स्वस्तिकाकृतिवन्नासी सर्वत्र परिशोभिता।
नन्द्यावर्तगवाक्षादिजालकाद्यैर्विचित्रितम् ॥११०॥
इसे विभिन्न प्रकार के अधिष्ठानों, स्तम्भों एवं वेदिका आदि से सुसज्जित करना
चाहिये। इसके भीतरी भाग में स्तम्भ एवं उत्तर तथा मध्य भाग में वारण का निर्माण
करना चाहिये। इसका शिरोभाग शाला के आकार का हो एवं सामने तथा पीछे
महानासी होनी चाहिये। दोनों पाश्वों में चार नासियाँ निर्मित होनी चाहिये एवं इसे सभी
अंगों से युक्त होना चाहिये। सभी स्थानों पर स्वस्तिक के आकृति वाली नासियाँ
सुशोभित होनी चाहिये तथा इसे नन्द्यावर्त गवाक्ष एवं जालक ( झरोखा ) आदि से
सुसज्जित करना चाहिये॥१०८-११०॥
✺ केशविशाल-द्वारप्रासादः ✺
केशविशालसंस्थानं विस्ताराध्यर्धमायतम्।
पूर्ववद् भूमिभागं च मध्यवारणशोभितम् ॥१११॥
मय०-२१

३२२ मयमतम्
कूटकोष्ठाद्यलङ्कारं पूर्ववत् परिकल्पयेत्।
मुखे पृष्ठे द्विपाश्र्वे तु महानासीचतुष्टयम् ॥११२॥
सभाकारशिरस्तस्य मुखे पृष्ठे द्विपाश्र्वयोः।
अयुग्मस्तूपिकायुक्तं द्वारप्रासादकत्रयम् ॥११३॥
केशवविशालसंज्ञक द्वारप्रासाद गोपुर--केशविशाल द्वारप्रासाद की लम्बाई
चौड़ाई की डेढ़ गुनी अधिक होती है तलों का निर्माण पहले के समान होना चाहिये
एवं मध्य भाग में वारण ( दालान, ओसारा ) होना चाहिये। कूट, कोष्ठ आदि
अलंकरणों का निर्माण पहले की भाँति होना चाहिये। सामने, पीछे एवं दोनों पार्श्वों में
चार महानासी निर्मित करनी चाहिये। इसका शिरोभाग सभा के आकार का हो। उसके
मुखभाग, पृष्ठभाग एवं दोनों पार्श्वों में विषम संख्या में स्तूपिकायें होनी चाहिये। इस
प्रकार द्वारप्रासाद गोपुर के तीन भेद होते हैं।।१११-११३।।
✵ स्वस्तिक - द्वारहर्म्यम् ✵
स्वस्तिकस्य तु संस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् ।
पङ्क्तिरुद्रार्कभागैस्तु वेदपञ्चर्तुभूमयः ॥११४॥
अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं भूमिभागं च पूर्ववत् ।
कूटकोष्ठादिसर्वाङ्गैैरन्थाराद्यैरलङ्कृतम् ॥११५॥
सभाशिखरसंयुक्तं स्वस्तिकाकृतिनासियुक् ।
अष्टनासि सभाग्रे तु अयुग्मस्तूपिकान्वितम् ॥११६॥
द्वारहर्म्य गोपुर का स्वस्तिकसंज्ञक भेद—स्वस्तिकसंज्ञक द्वारहर्म्य गोपुर की
लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होती है एवं चौड़ाई को दस, ग्यारह या बारह भागों में बाँटना
चाहिये। इसे चार, पाँच या छः तल से युक्त निर्मित करना चाहिये। भीतरी भाग में
स्तम्भ एवं उत्तर होना चाहिये तथा तलों की योजना पूर्व-वर्णित होनी चाहिये। कूट,
कोष्ठ आदि सभी अवयवों तथा अन्थार आदि से इसे सुसज्जित करना चाहिये। इस
गोपुर को सभाकार शिखर से युक्त तथा स्वस्तिकाकार नासियों से युक्त करना चाहिये।
सभा के अग्र-भाग में आठ नासियाँ एवं विषम संख्या में स्तूपिकाओं का निर्माण करना
चाहिये।।११४-११६।।
✵ दिशास्वस्तिक - द्वारहर्म्यम् ✵
दिशास्वस्तिकसंस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् ।
पूर्ववद् भूमिभागं च कूटकोष्ठाद्यलंकृतम् ॥११७॥
अन्थार्यन्थरहाराङ्गं खण्डहर्म्याभिमण्डितम् ।
मुखेऽमुखेऽतिभद्रांशं शिरश्चायतमण्डलम् ॥११८॥

चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३२३
महानासि चतुर्युक्तं चतुष्पञ्जरशोभितम्।
अन्तः पादोत्तरैर्युक्तं सर्वावयवसंयुक्तम् ॥११९१॥
अनुक्तं पूर्ववत् सर्वमयुग्मस्तूपिकान्वितम् ।
दिशास्वस्तिक संज्ञक द्वारहर्म्य—दिशास्वस्तिक संज्ञक द्वारहर्म्य गोपुर की
लम्बाई विस्तार की दुगुनी होनी चाहिये। इसके तलों की योजना तथा कूट-कोष्ठादि
सज्जा पहले के सदृश होनी चाहिये। इसे अन्धारी ( भीतरी भित्ति ), अन्धार, हाराङ्ग
एवं खण्डहर्म्य से युक्त करना चाहिये। इसका शिरोभाग आयतमण्डलाकार ( गोलाई
लिये लम्बाई ) एवं सामने तथा पीछे अतिभद्रांश निर्मित करना चाहिये। इसे चार
महानासियों एवं चार पञ्जरों से अलंकृत करना चाहिये। भीतरी भाग को स्तम्भ, उत्तर
एवं सभी अंगों से युक्त करना चाहिये। जिनका यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है, उन
सबको पहले के समान निर्मित करना चाहिये तथा विषम संख्या में स्तूपिकायें निर्मित
होनी चाहिये॥१११७-११९१॥
✺ मर्दल-द्वारहर्म्यम् ✺
मर्दलस्य तु संस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् ॥१२०॥
पूर्ववद् भूमिभागं च कूटकोष्ठाद्यलंकृतम् ।
पुरे पृष्ठे सभागं स्याद् विस्तारत्र्यंशनिर्गमम् ॥१२१॥
शालाकारशिरोयुक्तं क्षुद्रनासीविभूषितम् ।
मुखे पृष्ठे महानासी चतुष्पञ्जरशोभितम् ॥१२२॥
अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं द्वारहर्म्यं त्रिधोदितम् ।
मर्दल संज्ञक द्वारहर्म्य गोपुर—मर्दल की लम्बाई उसकी चौड़ाई की दुगुनी
होती है। तलों का निर्माण एवं कूट तथा कोष्ठ आदि अलंकरणों का निर्माण पूर्ववर्णित
विधि से होता है। सामने एवं पीछे सभा के अग्र भाग के सदृश निर्माण होना चाहिये
तथा इसका निर्गत विस्तार के तीसरे भाग के बराबर होना चाहिये। इसका शीर्षभाग
शाला के आकार का हो एवं क्षुद्रनासियों से सुसज्जित हो। मुखभाग एवं पृष्ठभाग की
महानासी एवं चार पञ्जरों से सज्जा होनी चाहिये। भीतर स्तम्भ एवं उत्तर निर्मित होना
चाहिये। इस प्रकार द्वारहर्म्य तीन प्रकार से वर्णित है॥१२०-१२२॥
✺ मात्राकाण्ड-द्वारगोपुरम् ✺
मात्राकाण्डस्य संस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् ॥१२३॥
रुद्रार्क त्रयोदशांशैः पञ्चषट्सप्तभूमयः ।
पूर्ववद्भूमिभागं च कूटकोष्ठादि पूर्ववत् ॥१२४॥

३२४ मयमतम्
अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं चतुर्दिग्गतभद्रकम्।
गृहपिण्ड्यलिन्द्रहाराभिर्मण्डितं खण्डहर्म्यवत् ॥१२५॥
शालाकारशिरः कुर्यान्महानासी मुखेऽमुखे ।
पार्श्वयोः क्षुद्रनास्यश्च यथायुक्त्या प्रयोजयेत् ॥१२६॥
द्वारगोपुर का मात्राकाण्ड संज्ञक भेद—मात्राकाण्ड की लम्बाई चौड़ाई की
दुगुनी होती है। इसकी चौड़ाई के ग्यारह, बारह या तेरह भाग करने चाहिये एवं पाँच,
छः या सात तल होने चाहिये। तलयोजना पूर्ववत् एवं कूट तथा कोष्ठ आदि भी पहले
के सदृश होने चाहिये। इसके भीतरी भाग में स्तम्भ एवं उत्तर हों तथा चारो दिशाओं
में भद्रक निर्मित हों। इसे गृहपिण्डी ( भीतरी भित्ति ), अलिन्द एवं हारा से अलंकृत
करना चाहिये तथा खण्डहर्म्य निर्मित होना चाहिये। इसका शिरोभाग शाला की
आकृति का हो तथा सामने एवं पीछे महानासी निर्मित हो। दोनों पाश्र्वों में क्षुद्रनासियाँ
यथोचित रीति से निर्मित होनी चाहिये॥१२३-१२६॥
❋ श्रीविशाल-द्वारगोपुरम् ❋
श्रीविशालस्य संस्थानं पञ्चांशे द्व्यंशमायतम्।
पूर्ववद् भूमिभागं च मूलतः क्रकरीकृतम् ॥१२७॥
शिरः क्रकरकोष्ठं च सभा वा तत्र शीर्षकम्।
नानामसूरकस्तम्भवेदिकाद्यैरलंकृतम् ॥१२८॥
चतुर्दिक्षु महानासी क्षुद्रनासीविभूषिता।
स्वस्तिकाकृतिवन्नास्यः सर्वत्र परिकल्पयेत् ॥१२९॥
श्रीविशाल संज्ञक द्वारगोपुर—श्रीविशाल द्वारगोपुर की चौड़ाई के पाँच भाग
में से दो भाग के बराबर अधिक लम्बाई रखनी चाहिये। तल-योजना पहले के सदृश
होनी चाहिये तथा मूल से ऊपर क्रकरी आकार ( क्रास का आकार ) में निर्मित करना
चाहिये। इसके शिरोभाग पर क्रकरकोष्ठ ( क्रास के आकार का कोष्ठ ) या सभा का
आकार निर्मित करना चाहिये। इसे विभिन्न प्रकार के अधिष्ठानों, स्तम्भों एवं वेदिकाओं
से सुसज्जित करना चाहिये। चारो दिशाओं में महानासी एवं क्षुद्रनासी निर्मित करना
चाहिये। स्वस्तिकाकार नासियाँ सभी ओर निर्मित होनी चाहिये॥१२७-१२९॥
❋ चतुर्मुख-द्वारगोपुरम् ❋
चतुर्मुखस्य संस्थानं चतुर्भागाधिकायतम् ।
पूर्ववद् भूमिभागं च दिशाभद्रकसंयुतम् ॥१३०॥
हारामध्ये तु कर्तव्यं कुड्यकुम्भलतान्वितम् ।
तोरणैर्जालकैर्वृत्तस्फुटिताद्यैरलंकृतम् ॥१३१॥

चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३२५
कूटैर्नीडैस्तथा कोष्ठैः क्षुद्रकोष्ठैर्विभूषितम्।
गृहपिण्ड्यलिन्द्रहाराभिर्मण्डितं खण्डहर्म्यवत् ।।१३२।।
चतुर्मुख संज्ञक द्वारगोपुर—चतुर्मुख द्वारगोपुर की लम्बाई उसकी चौड़ाई से
चार भाग अधिक होती है। इसके तलों का भाग पूर्व-वर्णित हो एवं प्रत्येक दिशा में
भद्रक हो। हारा के मध्य में कुम्भलता से युक्त भित्ति हो एवं तोरण, जालक तथा
वृत्तस्फुटित (अलङ्करणविशेष) आदि से सुसज्जित हो। कूटों, नीडों (सजावटी
खिड़कियों), कोष्ठों एवं क्षुद्रकोष्ठों से अलंकृत हो एवं गृहपिण्डी, अलिन्द्र, हारा एवं
खण्डहर्म्य आदि से सुसज्जित हो।।१३०-१३२।।
सभाशिरस्तु वा शालाकारं वा शीर्षकं तु तत् ।
चतुर्नासिसमायुक्तं पार्श्वे द्वे द्वे तु नासिके ।।१३३।।
उपर्युपरिकूटाद्यैः सर्वाङ्गैः समलङ्कृतम् ।
अन्तःसोपानसंयुक्तं द्वारगोपुरकं त्रिधा ।।१३४।।
इसका शिरो-भाग सभा की आकृति का या शाला की आकृति का होता है। यह
चार नासियों से युक्त होता है एवं पार्श्वों में दो-दो नासिकायें होती हैं। ऊपरी (तल)
कूट आदि सभी अंगों से सुसज्जित होता है तथा भीतर सोपान से युक्त होता है। इस
प्रकार यह गोपुर तीन प्रकार का होता है।।१३३-१३४।।
वर्षस्थलसमोपेतं निवारितलकं तु वा।
घनाघनाङ्गयुक्तानि श्रीकरादीनि युक्तितः ।।१३५।।
श्रीकर आदि गोपुर वर्षा के स्थल (वर्षा के जल के निकास-स्थल) से युक्त
अथवा इससे रहित हो सकते हैं एवं ये सघन अथवा घनरहित अंगों से युक्त
आवश्यकतानुसार निर्मित किये जाते हैं।।१३५।।
नानाविधस्तम्भमसूरकाणि नानाविधाङ्गानि सलक्षणानि ।
नानोपपीठानि समण्डकानि भद्राण्यभद्राणि घनाघनानि ।।१३६।।
एकादिसप्तान्ततलानि युक्त्या शोभादिपञ्चादशगोपुराणि ।
शालासभामण्डपशीर्षकाणि प्रोक्तानि सद्भान्यमरेश्वराणाम् ।।१३७।।
इति मयमते वास्तुशास्त्रे गोपुरविधानं
नाम चतुर्विंशोऽध्यायः
❦ ❧
शोभा आदि पन्द्रह गोपुरों में अनेक प्रकार के स्तम्भ, मसूरक (अधिष्ठान),
अनेक प्रकार के लक्षणों से युक्त अवयव, विविध प्रकार के उपपीठ मण्डक सहित,

३२६ मयमतम्
भद्र से युक्त या भद्ररहित तथा घने या विरल अंग आदि से युक्त एक से लेकर सात
तलों तक का निर्माण उचित रीति से करना चाहिये। इनके शीर्षभाग शाला के आकार,
सभा के आकार या मण्डप के आकार के निर्मित होने चाहिये। इस प्रकार राजाओं एवं
देवों के भवनों के गोपुरों का वर्णन किया गया।।१३६-१३७।।
व्याख्यात्मक टिप्पणी
गोपुर-भेद (श्लोक ११)
पाँच प्रकार के गोपुरों का वर्णन मानसार में इस प्रकार प्राप्त होता है—
आद्यके द्वारशोभं तु द्वारशाला द्वितीयके।।
द्वारप्रासादो मध्ये द्वारहर्म्यं मयाधिके।
महामर्यादादिकुड्ये च महागोपुरमीरितम्।। (३३.४-५)
शिल्परत्न में भी इस ग्रन्थ की पुष्टि प्राप्त होती है—
द्वारशोभा द्वारशाला द्वारप्रासादहर्म्यके।
द्वारगोपुरमित्येके क्रमान्नाम्ना प्रकीर्तिताः।।
(पूर्व.-४१.२)
गोपुर-तलनिर्माण (श्लोक ३४-३६)
गोपुर के तल-निर्माण के प्रसंग में शिल्परत्न का मत इस प्रकार है—
एकद्वित्रितलं वा तु द्वारशोभाख्यमाचरेत्।
द्वित्रिवेदतलं कुर्यात् द्वारशालाख्यगोपुरम्।।
त्रिवेदसायकतलं द्वारप्रासादकं तथा।
हर्म्याख्यगोपुरं वेदपञ्चषट्तलमाचरेत्।।
द्वारगोपुरकं कुर्यात् पञ्चषट्सप्तभूमिकम्।
(पूर्व.-४१.३-५)
इन गोपुरों के प्रमाण शिल्परत्न (पूर्व. ४१ अ.) में प्राप्त होते हैं। इन्हें प्रमाण-
भेद की दृष्टि से श्रेष्ठ, मध्यम एवं कन्यस कहा गया है—
महत्तरे तु श्रेष्ठानि मध्यमे मध्यमत्रयम्।
क्षुद्रल्पयोः प्रशस्तं हि कन्यसत्रयगोपुरम्।। (४१.१६)
इनके उत्तम, मध्यम एवं अधम भेद तथा इनके उपभेद मानसार (३३.७-११)
में प्राप्त होते हैं।

चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३२७
विभिन्न तल वाले गोपुर ( श्लोक ३६-५८ )
विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (अ. २८-३२ / ४-२९) में एक तल से प्रारम्भ कर नौ तल
तक के गोपुरों का वर्णन प्राप्त होता है--
सप्तभौमं गोपुरं वा नवभौमयुतं तु वा।
(विश्व. वास्तु., २८-३२/२९)
गोपुरों के अलंकरण ( श्लोक ८१-८३ )
गोपुर के अलंकरणों के विषय में अन्य शिल्प-ग्रन्थों में भी वर्णन प्राप्त होता है।
शिल्परत्न के अनुसार—
मसूरकस्तम्भवैदिजालकैस्तोरणादिभिः ।।
यथायुक्ति यथाशोभं युक्तमेव करोत्वतः।
( पूर्व.-४१.५५-५६ )
प्रकल्पयेद् दृढं शिल्पी यथाशोभं यथाबलम्।
( विश्व. वास्तु.-२८.३२/२८ )

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः
( मण्डपसभाविधानम् )
✺ मण्डपविधानम् ✺
देवानां द्विजभूमीशवैश्यानां शूद्रजन्मनाम् ।
तत्तद्योग्यं यथायुक्त्या मण्डपं प्रविधीयते ॥१॥
मण्डप का विधान—देवों, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों एवं शूद्रों के अनुकूल
मण्डपों का वर्णन उचित रीति से किया जा रहा है॥१॥
✺ मण्डपयोग्या देशाः ✺
प्रासादाभिमुखे पुण्यक्षेत्रे वारामके शुभे ।
ग्रामादिवस्तुमध्ये च चतुर्दिक्षु विदिक्ष्वपि ॥२॥
बाह्याभ्यन्तरतो वाऽपि गृहाणां मध्यमे मुखे ।
मण्डप के अनुकूल स्थान—( मण्डपों का स्थान ) प्रासाद ( देवालय ) के अग्र
भाग में, पुण्यक्षेत्र ( तीर्थस्थल ) में, आराम ( उद्यान, पार्क ) में, ग्राम आदि वास्तु-
क्षेत्र के बीच में, चारो दिशाओं एवं दिशाओं के कोणों में, गृहों के बाहर, भीतर, मध्य
में एवं सामने होता है॥२॥
[L16

पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३२९
जन-सामान्य के दर्शन हेतु विशेष अवसरों पर निर्मित मण्डप ), बलालौनक-मण्डप
( सैन्य कार्यसम्बन्धी मण्डप ), सन्धिकार्यार्हक मण्डप ( जिस मण्डप में सन्धि आदि
से सम्बन्धित कार्य सम्पन्न हों ), क्षौर मण्डप ( जहाँ मुण्डन आदि कार्य सम्पन्न हों )
तथा भुक्तिकर्मसुखान्वित मण्डप ( जहाँ समूहभोज एवं सुख उठाया जाय )।।३-५।।
⁕ मण्डपनामानि ⁕
तेषां क्रमेण नामानि वक्ष्यन्ते विधिनाऽधुना ।
मेरुकं विजयं सिद्धं पद्मकं भद्रकं शिवम् ॥६॥
वेदं चालङ्कृतं दर्भं कौशिकं कुलधारिणम् ।
सुखाङ्गं सौख्यकं गर्भं माल्यं माल्याद्भुतं तथा ॥७॥
देवद्विजनरेन्द्राणां द्विरष्टचतुरस्रकम् ।
मण्डपों के नाम—अब उन मण्डपों के नामों का क्रमशः विधिपूर्वक उल्लेख
किया जा रहा है। ये सोलह चतुष्कोण मण्डप हैं, जो देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के
लिये होते हैं। ( उनके नाम इस प्रकार हैं— ) मेरुक, विजय, सिद्ध, पद्मक, भद्रक,
शिव, वेद, अलंकृत, दर्भ, कौशिक, कुलधारिण, सुखाङ्ग, सौख्यक, गर्भ, माल्य तथा
माल्याद्भुत ।।६-७।।
धनं सुभूषणाख्यं चाप्याहल्यं स्रुगकं तथा ॥८॥
कोणं च खर्वटं चैव श्रीरूपाख्यं च मङ्गलम् ।
एतान्यष्टौ सुरादीनां नृपाणामायतास्रकम् ॥९॥
मार्गं सौभद्रकं चैव सुन्दराख्यं तु मण्डपम् ।
साधारणं च सौख्यं च तथैवेश्वरकान्तकम् ॥१०॥
श्रीभद्रं सर्वतोभद्रमित्यष्टौ वैश्यशूद्रयोः ।
धन, सुभूषण, आहल्य, स्रुगक, कोण, खर्वट, श्रीरूप एवं मङ्गल—ये आठ
आयाताकार मण्डप देवता आदि के एवं राजाओं के अनुकूल होते हैं तथा वैश्य एवं
शूद्रों के अनुकूल मण्डपों के नाम इस प्रकार हैं—मार्ग, सौभद्रक, सुन्दर, साधारण,
सौख्य, ईश्वरकान्त, श्रीभद्र तथा सर्वतोभद्र ।।८-१०।।
भक्तिमानं तथा पादायामं पादविशालकम् ॥११॥
अधिष्ठानं तदाधारं प्रपां मध्यमरङ्गकम् ।
अलङ्कारं क्रमाद् वक्ष्ये स्तम्भपक्षं तदाकृतम् ॥१२॥
इनके स्तम्भों के भक्तिमान ( विभाजन का प्रमाण ), लम्बाई एवं चौड़ाई, इनके

३३० मयमतम्
अधिष्ठान, आकार, प्रपा (निर्मिति विशेष), मध्यम रङ्ग, अलङ्कार, स्तम्भों के पक्ष
(स्तम्भों की योजना) एवं उनकी आकृति—इन सभी का वर्णन अब मैं (मय ऋषि)
करता हूँ।।११-१२।।
☀ भक्तिमानम् ☀
सार्धहस्तं समारभ्य षट्षडङ्गुलवर्धनात् ।
पञ्चहस्तावधिर्यावत् त्रिः पञ्चैवाङ्घ्रिकान्तकम् ।।१३।।
अथ विस्तारभक्त्यैषामायामं प्रविधास्यते ।
एकद्वित्रिचतुष्पञ्चभागे भक्त्यन्तरे कृते ।।१४।।
एकभागेन वृद्धिः स्यादायामं स्वविशालतः ।
अथ स्वभक्तिविस्तृतात्रिमात्रङ्कर्या करान्ततः ।।१५।।
आयाममष्टधा प्रोक्तं तेन मानेन योजयेत् ।
सायतं चापि तत् सर्वं तन्नाम्नैव प्रपद्यते ।।१६।।
भक्ति का प्रमाण, प्रमाणयोजना—डेढ़ हाथ से प्रारम्भ कर छः-छः अंगुल
बढ़ाते हुये पाँच हाथ तक पन्द्रह प्रकार के स्तम्भ-मान प्राप्त होते हैं। इसकी लम्बाई
का मान चौड़ाई के भक्तिमान से ग्रहण किया जाता है। चौड़ाई से ग्रहण किये गये
लम्बाई के मान के लिये चौड़ाई को एक, दो, तीन, चार या पाँच भाग में बाँटना
चाहिये एवं लम्बाई को एक भाग अधिक होना चाहिये। अपने विस्तार के भक्तिमान
से तीन-तीन अंगुल बढ़ाते हुये एक हाथ तक ले जाना चाहिये। इस प्रकार लम्बाई
के आठ प्रमाण प्राप्त होते हैं। इससे प्रमाणयोजना बनानी चाहिये तथा सभी लम्बे
मण्डप इसी भक्तिमान से निर्मित होने चाहिये।।१३-१६।।
☀ स्तम्भमानम् ☀
सार्धद्विहस्तमारभ्य षट्षडङ्गुलवर्धनात् ।
अष्टहस्तान्तमङ्घ्युच्चं त्रयोविंशत्प्रमाणकम् ।।१७।।
त्रित्र्यङ्गुलविवृद्ध्या वा स्तम्भोत्सेधः प्रकीर्तिताः।
स्तम्भ-प्रमाण—ढाई हाथ से प्रारम्भ कर छः-छः अंगुल बढ़ाते हुये आठ हाथ
तक स्तम्भ की ऊँचाई ले जानी चाहिये। इस प्रकार स्तम्भ के तेईस प्रमाण बनते हैं।
अथवा तीन-तीन अंगुल बढ़ाते हुये स्तम्भ का मान प्राप्त होता है।।१७।।
अष्टाङ्गुलं समारभ्यैवार्धाङ्गुलवर्धनात् ।।१८।।
नन्दपङ्क्त्यङ्गुलं यावत् संख्यया पूर्ववत्ततिः ।
पादोच्चैरपि रुद्रांशधर्मनन्दाष्टभाजिते ।।१९।।

पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३३१
मूलतारं तु भागेन तत्तद्भागोनमग्रतः ।
स्तम्भ का विस्तार ( घेरा ) आठ अंगुल से प्रारम्भ कर आधा अंगुल बढ़ाते हुये
उन्नीस अंगुल तक ले जाना चाहिये। इस स्तम्भ के मूल का विस्तार प्राप्त करने के
लिये उसकी ऊँचाई के ग्यारह, दस, नौ या आठ भाग करने चाहिये एवं उसमें से एक
कम करने पर ( दस, नौ, आठ, सात भाग ) मूल के विस्तार या परिधि का होता
है ।।१८-१९।।
✹ अधिष्ठानोत्सेधः ✹
पादोच्चार्धमधिष्ठानं सामान्यं सर्ववस्तुषु ॥२०॥
पादोच्चे पञ्चभागे तु द्विभागोच्चं तु वा तलम् ।
स्तम्भोत्सेधत्रिभागैकं वा मसूरकतुङ्गकम् ॥२१॥
अधिष्ठान की ऊँचाई—सामान्यतया सभी वास्तुओं में स्तम्भ की ऊँचाई के
आधे प्रमाण से अधिष्ठान का मान रक्खा जाता है। अथवा स्तम्भ की ऊँचाई के पाँच
भाग करने पर अधिष्ठान दो भाग के बराबर रक्खा जाता है या स्तम्भ की ऊँचाई के
तीन भाग करने पर एक भाग के बराबर अधिष्ठान रक्खा जाता है।।२०-२१।।
✹ उपपीठोत्सेधः ✹
सोपपीठमधिष्ठानं केवलं वा मसूरकम् ।
अधिष्ठानसमोच्चं वा द्विगुणं त्रिगुणं तु वा ॥२२॥
उपपीठविधाने तु यदुक्तं तेन वोन्नतम् ।
उपपीठसमुत्सेधं यथायुक्ति यथारुचि ॥२३॥
उपपीठतलस्तम्भप्रस्तरालंकृतिक्रमम् ।
प्राग्वदेव समुद्दिष्टं शेषं युक्त्या समाचरेत् ॥२४॥
उपपीठ की ऊँचाई—अधिष्ठान उपपीठ से युक्त या केवल अधिष्ठान ( उपपीठरहित
अधिष्ठान ) होना चाहिये। उपपीठ ऊँचाई में अधिष्ठान के बराबर, उसका दुगुना या
तीन गुना होता है। अथवा उसकी ऊँचाई उसी प्रकार रखनी चाहिये, जैसी उपपीठ-
विधान के प्रसंग में वर्णित है। उपपीठ की ऊँचाई इच्छानुसार या आवश्यकतानुसार
रखनी चाहिये। उपपीठ, तल ( अधिष्ठान ), स्तम्भ एवं प्रस्तर की सज्जा के विषय
में पहले कहा जा चुका है। शेष यथावसर करना चाहिये।।२२-२४।।
✹ मण्डपलक्षणम् ✹
अधिष्ठानोपरिस्तम्भं प्रस्तरं च त्रिवर्गकम् ।
कपोतप्रतिसंयुक्तं यत्तन्मण्डपमिष्यते ॥२५॥

३३२ मयमतम्
मण्डप का लक्षण—अधिष्ठान, उसके ऊपर स्तम्भ एवं प्रस्तर—इन तीन वर्गों
से युक्त, कपोत एवं प्रति से युक्त निर्माण को मण्डप कहा जाता है॥२५॥
❋ मण्डपशब्दार्थः ❋
मण्डं सुभूषणं तं पातीति मण्डपमिष्यते ।
मण्डप शब्द का अर्थ—मण्ड अर्थात् अलङ्करण। उसकी जो रक्षा करता है,
उसे मण्डप कहते हैं।
❋ प्रपालक्षणम् ❋
सामान्यं सर्ववर्णानां प्रपारूपं वदाम्यहम् ॥२६॥
प्रपारूपाङ्गपादान्ते चोत्तरादूर्ध्ववंशकम् ।
प्राग्वंशमनुवंशं च नालिकेरदलादिभिः ॥२७॥
अन्यैरपि तथा पत्रैर्द्रव्यैः प्रच्छादिता प्रपा ।
प्रपा का लक्षण—सभी वर्णों के अनुकूल प्रपा के सामान्य स्वरूप का वर्णन
करता हूँ। इसके स्तम्भ भूतल से प्रारम्भ होते हैं एवं इनके ऊपर उत्तर होते हैं। उत्तर
( स्तम्भ के ऊपर भित्ति ), उसके ऊपर ऊर्ध्ववंश ( प्रधान वंश, छाजन के लट्ठे ) होते
हैं। इनके साथ प्राग्वंश ( प्रधान वंश से जुड़े पूर्व की ओर जाने वाले वंश ), अनुवंश
( सहायक वंश ) आदि होते हैं। प्रपा का आच्छादन नारियल के पत्ते तथा अन्य पत्तों
से किया जाता है।।२६- २७।।
प्राग्वदेवाङ्घ्रिकायामं चतुःषडष्टदशाङ्गुलम् ॥२८॥
पादविष्कम्भमेतेषां प्रमाणं सारदारुजम् ।
त्वक्सारं च यथालाभं तथा तत्र प्रयोजयेत् ॥२९॥
स्तम्भों की लम्बाई पूर्ववर्णन के अनुसार रखनी चाहिये। स्तम्भ का विष्कम्भ
( स्तम्भ का घेरा ) चार, छः, आठ यां दस अंगुल होना चाहिये। यह मान सारदारु
( ठोस काष्ठ ) से निर्मित स्तम्भ का कहा गया है। वंश-निर्मित स्तम्भ का मान भी
यही है। जहाँ जैसी आवश्यकता हो, वहाँ वैसा निर्माण करना चाहिये।।२८-२९।।
पादोच्चे पङ्क्तिनन्दाष्टसप्तषट्पञ्चभागिके ।
स्तम्भ की ऊँचाई के दस, नौ, आठ, सात, छः या पाँच भाग करना चाहिये।
❋ रङ्गलक्षणम् ❋
वेदिकोच्चं तु भागेन मध्ये रङ्गं प्रयोजयेत् ॥३०॥

पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३३३
स्तम्भोत्सेधचतुर्भागे भागेनैव मसूरकम्।
द्विभागं तलिपायामं भागेन प्रस्तरं भवेत् ॥३१॥
रङ्ग का लक्षण—( पूर्ववर्णित भाग के बराबर ) वेदिका की ऊँचाई होनी चाहिये।
एक भाग से मध्य भाग में रङ्ग निर्मित करना चाहिये। स्तम्भ की ऊँचाई के चार भाग
करने पर एक भाग से मसूरक ( अधिष्ठान ), दो भाग से स्तम्भ की लम्बाई एवं एक
भाग से प्रस्तर निर्मित करना चाहिये।।३०-३१।।
युग्मायुग्मद्विभक्त्यैकभक्त्या वा तद्विशालकम्।
अष्टस्तम्भसमायुक्तं चतुःस्तम्भान्वितं तु वा ॥३२॥
प्रपादीनां तु संस्थानं यथा वा रङ्गमीरितम्।
भवन-योजना सम संख्या में हो या विषम संख्या में हो, रङ्ग की विशालता दो
भाग या एक भाग रखनी चाहिये। आठ स्तम्भों से युक्त अथवा चार स्तम्भों से युक्त
रङ्ग का निर्माण प्रपा आदि के समान करना चाहिये।।३२।।
सर्वावयवसंयुक्तं मिश्रद्रव्यसमन्वितम् ॥३३॥
शालासभाप्रपाणां तु मण्डपानां तु मध्यमे।
प्रतिष्ठितचतुःस्थानं त्रिमानं रङ्गमिष्यते ॥३४॥
रङ्ग सभी अंगों से युक्त एवं मिश्रित पदार्थों से युक्त होता है। शाला, सभागार,
प्रपा एवं मण्डपों के मध्य में—इन चार स्थलों पर रङ्ग का निर्माण होता है। इसका
मान तीन प्रकार का कहा गया है।।३३-३४।।
✺ मालिकामण्डपम् ✺
मण्डपोपरि भूमिस्तु मालिकामण्डपं भवेत्।
मण्डपोर्ध्वे सशिखरं द्वितलं यदि सम्भवम् ॥३५॥
मध्यस्थभूमिदेशत्वात् प्रतिमध्यं तदुच्यते।
मालिका-मण्डप—मण्डप के ऊपर का तल मालिका मण्डप होता है। यदि
मण्डप के दो तल हों तो वह शिखरयुक्त होता है। दोनों तलों के मध्य में स्थित भाग
को प्रतिमध्य कहते हैं।।३५।।
✺ मेरुकम् ✺
मेरुकं चतुरस्रं स्याच्चतुष्पादेकभक्तिकम् ॥३६॥
नासिकाष्टकसंयुक्तं ब्रह्मासनमिति स्मृतम्।
मेरुक—मेरुक मण्डप चौकोर, चार स्तम्भों से युक्त, एक भाग (भक्ति) माप

३३४ मयमतम्
का तथा आठ नासिकाओं से युक्त होता है। इसे ब्रह्मासन कहा गया है।।३६।।
✺ विजयम् ✺
द्विभक्तिचतुरस्रं तु विजयं नाम मण्डपम् ।।३७।।
अष्टपादसमायुक्तमष्टनास्या विभूषितम्।
अधिष्ठानादिवर्गाढ्यं त्यक्तमध्यस्थपादकम् ।।३८।।
नवपादसमायुक्ता प्रपा कल्याणकारिता।
विजय—विजय संज्ञक मण्डप दो भक्ति से युक्त एवं चतुष्कोण होता है। यह
आठ स्तम्भों एवं आठ नासियों से अलंकृत होता है। यह अधिष्ठान से युक्त एवं मध्य
स्तम्भ से रहित होता है। विवाह के लिये नौ स्तम्भों से युक्त प्रपा निर्मित होनी
चाहिये।।३७-३८।।
✺ सिद्धम् ✺
त्रिभक्ति चतुरस्रं तु षोडशस्तम्भसंयुतम् ।।३९।।
नासिकाभिर्द्विरष्टाभिर्युक्तं मध्येऽङ्गणान्वितम्।
मध्योर्ध्वकूटयुक्तं वा चतुर्द्वारसमन्वितम् ।।४०।।
चतुर्दिक्षु बहिद्वारि चतुस्तोरणभूषितम्।
यागादिकर्मयोग्यं स्याद्देवद्विजमहीभृताम्।
नाम्ना सिद्धमिति प्रोक्तं सर्वकर्मसु पूजितम् ।।४१।।
सिद्ध—सिद्ध संज्ञक मण्डप तीन भक्ति ( प्रमाण की इकाई ) वाला, चतुष्कोण,
सोलह स्तम्भ से युक्त, सोलह नासिकाओं से युक्त एवं मध्य में आँगन से युक्त होना
चाहिये, जिसके ऊपर मध्य भाग में कूट हो सकता है। चारो दिशाओं में चार द्वार हों।
बाहरी द्वारों को चार तोरणों से अलंकृत करना चाहिये। यह मण्डप देवों, ब्राह्मणों एवं
राजाओं के यज्ञ-कार्य के अनुकूल होता है। यह सिद्ध नामक मण्डप सभी कार्यों के
अनुकूल कहा गया है।।३९-४१।।
✺ यागमण्डपम् ✺
कृत्वैकाशीतिभागान् निशितविपुलधीर्मण्डपाभ्यन्तरं त-
न्मध्ये वेदी नवांशा भवति हि परितस्त्रीणि भागानि मध्ये।
अस्रं योन्यर्धचन्द्रं गुणभुजमपरं वै सुवृत्तं षडस्रं
पद्मं वस्वश्रकुण्डं सुरपतिभवनादिक्रमेणैव कुर्यात् ।।४२।।
यज्ञमण्डप—बुद्धिमान् स्थपति को मण्डप के भीतरी भाग को इक्यासी भागों में

पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३३५
बाँटना चाहिये। मध्य के नौ भागों में वेदी होती है। चारो ओर तीन भाग छोड़कर मध्य
में चौकोर, योनि के आकार का, अर्धचन्द्राकार, त्रिकोण, वृत्ताकार, षट्कोण, पद्मपुष्प
के आकार का या अष्टकोण कुण्ड पूर्व दिशा से प्रारम्भ करते हुये निर्मित करना
चाहिये।।४२।।
⁕ कुण्डलक्षणम् ⁕
हस्तविस्तृतनिखातवच्चतुष्कोटिकं दिशि दिशि त्रिसूत्रकम्।
सत्रिमेखलमथ द्विकं तु वा धातुभूतगुणमात्रकोन्नतम् ।।४३।।
कुण्ड का लक्षण— (कुण्ड के लिये) एक हाथ चौड़ा तथा एक हाथ गहरा
चौकोर गड्ढा निर्मित करना चाहिये। यदि इसे तीन मेखला से युक्त करना हो तो तीन
सूत्र या दो मेखला से युक्त करना हो तो दो सूत्र खींचना चाहिये। इन मेखलाओं की
ऊँचाई सात, पाँच या तीन अंगुल रखनी चाहिये।।४३।।
व्यासमब्ध्यनलपक्षमात्रकैर्योनिमूर्ध्वत इभोष्ठवत् कुरु।
तारदैर्घ्यकसमुद्गमं चतुःषण्मनोऽङ्गुलिभिरग्निसम्मुखम् ।।४४।।
उपर्युक्त मेखलाओं की चौड़ाई क्रमशः चार, तीन एवं दो अंगुल रखनी चाहिये।
योनि की आकृति गज के ओष्ठ के समान निर्मित करना चाहिये। इसकी चौड़ाई,
लम्बाई एवं गहराई क्रमशः चार, छः एवं एक अंगुल रखनी चाहिये तथा इसे अग्नि
की ओर होना चाहिये।।४४।।
वेदबन्धनयनाङ्गुलोन्नतव्यासमेखलयुतं तु वा पुनः।
तालगाढमथवैकमेखलं सर्वकुण्डमकर्णयोनिकम् ।।४५।।
कुण्ड के मेखलाओं की ऊँचाई चार, तीन या दो अंगुल होनी चाहिये। अथवा
कुण्ड की गहराई एक बित्ता हो एवं एक मेखला से युक्त हो। सभी कुण्डों की योनि
कोने में नहीं होनी चाहिये।।४५।।
वृत्तसन्निभमथो तदाकृतिं वा युगेषुरसमात्रवैपुलम्।
व्यासवेदगुणभागतुङ्गकं नाभिमब्जमिव कुण्डमध्यमे ।।४६।।
कुण्ड का केन्द्र (नाभि) कमल के समान होना चाहिये। इसकी आकृति वृत्त के
समान होनी चाहिये। इसका व्यास चार, पाँच या छः अंगुल होना चाहिये तथा इसकी
ऊँचाई चार या तीन भाग होनी चाहिये।।४६।।
⁕ योनिकुण्डम् ⁕
न्यस्यैकांशं पञ्चभागे पुरस्तात्
कोणस्याधार्धं गृहीत्वा ततस्तत्।

३३६ मयमतम्
कोणं यावद् भ्रामयेत्तद्वदन्यद्
योन्याकारं स्याद् द्विसूत्रप्रयोगात् ॥४७॥
योनि की आकृति का कुण्ड—कुण्ड के पूर्व भाग को पाँच भागों में बाँटना
चाहिये। कोण से आधा भाग ग्रहण कर ( सीधी रेखा द्वारा उत्तर एवं दक्षिण के ) मध्य
भाग को जोड़ना चाहिये। इसके पश्चात् ( उत्तर, पश्चिम ) कोण को गोलाई से घेरना
चाहिये। इसी प्रकार दूसरी ओर भी करना चाहिये अर्थात् दक्षिण-पश्चिम के कोण को
भी गोलाई से घेरना चाहिये। इस प्रकार दो सूत्रों के प्रयोग से योनि की आकृति निष्पन्न
होती है।।४७।।
✵ अर्धचन्द्रकुण्डम् ✵
व्यासे धर्मांशेंऽशमूर्ध्वार्धधस्तान्नीत्वैव ज्यासूत्रकं पातयित्वा ।
तन्मानेन भ्रामयेदर्धचन्द्रं कुण्डं युक्त्या वास्तुविद्याविधिज्ञैः ॥४८॥
अर्धचन्द्राकार कुण्ड—कुण्ड के व्यास के दसवें भाग में ऊपर एवं नीचे ( बिन्दु
बनाना चाहिये। उस बिन्दु से ) ज्यासूत्र ( सीधी रेखा ) खींचना चाहिये। इस मान से
[L

पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३३७
मत्स्यं कृत्वा युग्मयुग्मं द्विपाश्र्वात्
षट्कोणं स्यात्पातयेत्सूत्रषट्कम् ॥५०॥
छः कोण का कुण्ड—( चतुष्कोण ) कुण्ड के क्षेत्र को पाँच भागों में बाँटना
चाहिये। एक वृत्त इस प्रकार खींचना चाहिये, जिससे उसकी परिधि उन पाँच भागों
से अधिक हो। इसके पश्चात् प्रत्येक भाग में मत्स्य की आकृति निर्मित करनी चाहिये।
इस प्रकार छः सूत्रों के द्वारा षट्कोण कुण्ड निर्मित होता है॥५०॥
✺ पद्मकुण्डम् ✺
वृत्तं कृत्वा पूर्ववत्तस्य मध्ये
वृत्तं भ्राम्यं यत्र यन्मध्यतस्तत् ।
पद्मस्याकारं यथा कर्णिकादीन्
कुर्याद्विद्वान् पद्मकुण्डं क्रमेण ॥५१॥
पद्माकार कुण्ड—पूर्ववर्णित विधि से वृत्त बनाकर उसके मध्य में एक वृत्त
निर्मित करना चाहिये। इसके पश्चात् मध्य से प्रारम्भ करते हुये पद्म का आकार एवं
कर्णिका आदि जिस प्रकार बनें, उस प्रकार विद्वान् को पद्मकुण्ड निर्मित करना चाहिये।
✺ अष्टास्रकुण्डम् ✺
क्षेत्रव्यासे षट्चतुर्भागिकेऽस्मिन्
भागं बाह्ये न्यस्य सूत्रं समन्तात् ।
कोणस्यार्धं कोणकाभ्यां तु लेख्यं
ह्यष्टास्रंस्यादष्टसूत्रप्रयोगात् ॥५२॥
अष्टकोण कुण्ड—कुण्ड के क्षेत्र को चौबीस भागों में बाँटना चाहिये। एक भाग
बाहर रहे, इस प्रकार एक वृत्त खींचना चाहिये। दोनों कोणों से एवं कोणों के अर्ध
भाग से आठ सूत्रों ( रेखाओं ) से अष्टकोण कुण्ड निर्मित करना चाहिये॥५२॥
✺ सप्तास्रकुण्डम् ✺
तारे पङ्क्त्यंशेंऽशकं न्यस्य बाह्ये वृत्तं भ्राम्यं क्षेत्रकेऽष्टाष्टभागे ।
सैकैर्वेद्राष्टांशकैः पट्टदैर्घ्यं सप्तास्रं स्यात् सप्तसूत्रप्रयोगात् ॥५३॥
सप्तकोण कुण्ड—कुण्ड के क्षेत्र को दस भागों में बाँटना चाहिये। उसमें एक
वृत्त इस प्रकार खींचना चाहिये, जिससे एक भाग क्षेत्र के बाहर रहे। सात सूत्रों के
प्रयोग से सप्तकोण कुण्ड निर्मित होता है, जिसका पट्टदैर्घ्य ( सातों कोणों का माप )
तैंतीस हो एवं क्षेत्र का माप चौंसठ हो॥५३॥
मय०-२२