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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २१९
सुन्दर वस्त्र से तथा श्वेत पुष्पों से सजा कर मण्डप को मनोहर बनाना चाहिये।।१६७।।
तस्य मध्ये तु शालीभिः स्थण्डिलं दण्डमानतः ॥१६८॥
उसके मध्य भाग में शालिधान्य से एक दण्ड प्रमाण का स्थण्डिल वास्तुमण्डल
निर्मित करना चाहिये ।।१६८।।
कृत्वाष्टाष्टपदं न्यस्य ब्रह्मादीन् वस्तुनायकान् ।
श्वेततण्डुलधाराभिर्विन्यस्याराध्य पुष्पकैः ॥१६९॥
गन्धैर्धूपैश्च दीपैश्च बलिं दत्त्वा विधानतः ।
तदूर्ध्वं पञ्चपञ्चैव कलशान् वस्त्रशोभितान् ॥१७०॥
चौंसठ पद बनाकर श्वेत चावल से ब्रह्मा आदि वास्तुदेवताओं को क्रमानुसार
स्थापित कर तथा पुष्प-गन्ध-धूप-दीप आदि से उनकी पूजा कर उन्हें विधिपूर्वक बलि
प्रदान करनी चाहिये। इसके ऊपर वस्त्रों से सुशोभित पच्चीस कलश रखना चाहिये।
मणिहेमसमायुक्तान् ससूत्रान् सापिधानकान् ।
निष्कलङ्कान्सुषिरान् हाटकोदकपूरितान् ॥१७१॥
उपपीठपदस्थांस्तान् स्वस्वनाम्नाभिधाय च।
ओङ्कारादिनमोऽन्तेन चार्चयित्वा न्यसेत्ततः ॥१७२॥
इन कलशों को रत्नों, सुवर्ण, सूत्रों एवं ढक्कनों से युक्त करना चाहिये। ये कलश
दोषरहित, छिद्ररहित एवं हाटक-जल ( सुनहरा, पीला जल ) अथवा धतूरायुक्त जल
से भरे होने चाहिये। उपपीठ वास्तुमण्डल पर रक्खे गये प्रत्येक घट को उस-उस
वास्तुदेवता ( जिसके पद पर कलश हो ) का नाम लेते हुये ओंकार से प्रारम्भ कर
नमः से अन्त करते हुये वास्तुदेवता की पूजा ( आवाहन करते हुये ) करनी चाहिये।
कलशस्योत्तरे पार्श्वे दर्भासनपरिस्तरे ।
चतुष्प्रदीपसंयुक्ते सर्वमङ्गलशोभिते ॥१७३॥
पूतचेता विशुद्धात्मा स्थपतिर्व्रतमास्थितः ।
पीत्वा शुद्धं पयो रात्रावुपोष्याधिवसेत्ततः ॥१७४॥
पवित्र मन एवं आत्मा वाले, व्रत में स्थित स्थपति को शुद्ध जल पीकर उपवास
रखते हुये कलश के उत्तरी भाग में कुश के बिस्तर पर, जिसके चतुर्दिक चार दीपक
जल रहे हों एवं जो माङ्गलिक पदार्थों से सुशोभित हो, रात्रि में निवास करना
चाहिये।।१७३-१७४।।
प्रासादस्याग्रतो यागमण्डपं विधिनाचरेत् ।
चतुर्द्वारसमायुक्तं चतुस्तोरणभूषितम् ॥१७५॥

२२० मयमतम्
वासोभिर्दर्भमालाभिः स्रक्सुमैः समलङ्कृतम्।
तन्मध्ये वेदिकां कुर्यात् तद्व्यासत्र्यंशमानतः ॥१७६॥
मन्दिर के अग्र भाग में विधिपूर्वक चार तोरणों से सुसज्जित, चार द्वारों से युक्त
याग-मण्डप निर्मित करना चाहिये। इस यागमण्डप को वस्त्रों, कुशमालाओं एवं पुष्पों
से अलङ्कृत करना चाहिये। इसके मध्य भाग में याग-मण्डप के विस्तार के तीसरे
भाग के माप से वेदिका का निर्माण करना चाहिये।।१७५-१७६।।
चतुरस्रं चतुर्दिक्षु विदिक्ष्वश्वत्थपत्रवत् ।
सुरेन्द्रेशानयोर्मध्ये कुण्डमष्टाश्रमिष्यते ॥१७७॥
त्रिमेखलासमायुक्तं वैकमेखलान्वितम् ।
चारों दिशाओं में चौकोर तथा दिक्कोणों में पीपल के पत्ते के सदृश कुण्ड निर्मित
करना चाहिये। इन्द्र एवं ईशकोण के मध्य अष्टकोण का तीन मेखला अथवा एक
मेखला से युक्त कुण्ड निर्मित करना चाहिये।।१७७।।
✴ कुम्भस्थापनम् ✴
स्थापको मूर्तिपैः सार्धं विधिना होममाचरेत् ॥१७८॥
शालिभिः स्थण्डिलं कृत्वा वेदिमध्ये विचक्षणः ।
मूर्तिकुम्भं न्यसेत् सम्यग् बीजमन्त्रमनुस्मरन् ॥१७९॥
कुम्भ की स्थापना—स्थापक को मूर्तिरक्षक के साथ विधिपूर्वक हवन करना
चाहिये। शालिधान्य द्वारा वेदि के मध्य में स्थण्डिल वास्तुमण्डल निर्मित कर बुद्धिमान
व्यक्ति को बीज-मन्त्र का स्मरण करते हुये सम्यक् रीति से मूर्तिकुम्भ का न्यास करना
चाहिये।।१७८-१७९।।
प्रासादस्य चतुर्दिक्षु वृत्तकुण्डविधानतः ।
सन्तर्प्य स्थापको जातवेदसं निवसेत्तदा ॥१८०॥
प्रासाद के चारो दिशाओं में वृत्ताकार कुण्ड में स्थापक को विधिपूर्वक अग्नि
स्थापित करनी चाहिये।।१८०।।
विमानं जन्मतः स्तूपिकान्तं वस्त्रैर्निवेष्टयेत् ।
कुशास्तीर्णैर्नवैर्वस्त्रैः स्तूपिकीलमलङ्क्रियात् ॥१८१॥
विमान ( मन्दिर ) को जन्म ( प्रारम्भ ) से लेकर स्तूपिकापर्यन्त वस्त्रों से आवृत्त
करना चाहिये। स्तूपिकील को कुशा से युक्त नवीन वस्त्र से सुसज्जित करना चाहिये।

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२१
✵ वास्तुदेवताबलिः ✵
बल्यन्नं पायसान्नं च मुद्गान्नं च यवान्नकम्।
कृसरं गुलशुद्धान्नं पीतं कृष्णं तथारुणम् ॥१८४२॥
गृहीत्वा सकलस्याग्रे हेमपात्रे निधाय च।
दधिदुग्धघृतक्षौद्ररत्नपुष्पाक्षताम्बुभिः ॥१८४३॥
कदलीफलसंयुक्तं पात्रं चैवान्यशिल्पिभिः।
धारयित्वाम्बुभी रात्रौ वास्तुदेवबलिं चरेत् ॥१८४४॥
स्थापक को बलि का अन्न, खीर, यव ( जौ ) से पका अन्न, खिचड़ी, गुड़ एवं
शुद्ध अन्न ( चावल ), पीला, काला एवं लाल ( रंग में रंगा चावल )—ये सभी
सामग्री सुवर्ण-पात्र में लेकर वास्तु-देवता के आगे रखकर दही, दूध, घी, शहद, रत्न,
पुष्प, अक्षत एवं जल तथा केला से युक्त पात्र लेकर अन्य शिल्पियों के साथ रात्रि
में इन पदार्थों के द्वारा वास्तुदेवता को बलि प्रदान करनी चाहिये।।१८४२-१८४४।।
✵ चक्षुर्मोक्षणम् ✵
ततः प्रभाते विमले नक्षत्रकरणान्विते।
स्थपतिर्वरवेषाढ्यः प्राप्तपञ्चाङ्गभूषणः ॥१८४५॥
धृतहाटकयज्ञोपवीतः श्वेतानुलेपनः।
श्वेतपुष्पशिरः प्राप्तोष्णीषश्चाहतवस्त्रयुक् ॥१८४६॥
दिशामूर्त्यपरांश्चक्षुर्मोक्षणं विधिनाचरेत्।
स्नापयेत् कलशाम्भोभिरर्चयेद् गन्धपुष्पकैः ॥१८४७॥
आँख खोलना—इसके पश्चात् प्रातःकाल शुभ नक्षत्र एवं करण से युक्त वेला
में स्थपति को सुन्दर वेष धारण कर, पाँचों अंगों में आभूषण धारण कर, सुवर्ण-निर्मित
जनेऊ तथा श्वेत ( चन्दन ) का लेप धारण कर, शिर पर श्वेत पुष्प से युक्त पगड़ी तथा
कोरे वस्त्र को पहन कर दिशा-मूर्तियों एवं अन्य ( मूर्तियों ) की ओर चक्षुर्मोक्षण
( आँख खोलने का कृत्य ) करना चाहिये एवं इन मूर्तियों को गन्ध एवं पुष्प से युक्त
कलश के जल से स्नान कराना चाहिये।।१८४५-१८४७।।
प्रथमं हेमया तत्र सूच्या नयनमण्डलम्।
लिखित्वा तीक्ष्णशस्त्रेण मण्डलत्रयमुल्लिखेत् ॥१८४८॥
प्रथमतः सोने की सुई से नेत्र-मण्डल की आकृति बना कर ( तदनन्तर ) तीक्ष्ण
शस्त्र से तीन ( नेत्र ) मण्डल निर्मित करना चाहिये।।१८४८।।

२२२ मयमतम्
आच्छाद्य नववस्त्रेण ब्राह्मणान् धान्यसञ्चयान्।
धेनुं सवत्सां कन्यां च दर्शयित्वा यथाक्रमम् ॥१८९॥
ब्राह्मणों के लिये नवीन वस्त्र से अन्न के ढेर को ढँक कर बछड़े सहित गाय एवं
कन्या को क्रमशः दिखाना चाहिये॥१८९॥
✺ सम्प्रोक्षणम् ✺
विमानं पुनरारुह्य स्थपतिः स्थापकाज्ञया।
शङ्खकाहलतूर्यादिघोषैः स्वस्तिवाचनैः ॥१९०॥
स्तूप्यग्रादाप्रकृत्यन्तं चतुर्दिशि महाध्वजम्।
लम्बयेत् क्षौमपट्टैर्वा कार्पासैर्ग्रथितं नरम् ॥१९१॥
सम्प्रोक्षण कार्य—इसके पश्चात् स्थापक की आज्ञा से शङ्ख, काहल (पीट कर
बजाया जाने वाला वाद्य) तथा तूर्य आदि वाद्यों के स्वर एवं (ब्राह्मणों द्वारा किये जाने
वाले) स्वस्ति-पाठ के साथ स्थपति को मन्दिर पर चढ़ा कर स्तूपिका से प्रारम्भ कर
भूमि तक चारो दिशाओं में रेशमी अथवा सूती वस्त्र से निर्मित एवं नर (की आकृति
से युक्त) ध्वज को लटकाना चाहिये॥१९०-१९१॥
चन्दनागुरुतोयेन सर्वगन्धोदकेन च।
कलशोदैः कुशाम्भोभिरुपरिष्टात् समन्ततः ॥१९२॥
प्रोक्षयेत् स्थपतिः प्राज्ञो भुवनाधिपतिं जपेत्।
बुद्धिमान स्थपति को चन्दन एवं अगुरु के जल से, सभी गन्धों से युक्त जल से,
कलश के जल से एवं कुश के जल से ऊपर से चारो ओर प्रोक्षण करना चाहिये एवं
संसार के स्वामी की स्तुति करनी चाहिये॥१९२॥
✺ स्तूपिकुम्भः ✺
तैलतानां विमानानां पाञ्चभौतिकसंश्रितात् ॥१९३॥
स्तूपिकुम्भं सुवर्णेन ताम्रेण रजतेन वा।
उपलेष्टकसौधैर्वा कृत्वेष्टं कीलवत् स्मृतम् ॥१९४॥
देवालयों में स्तूपिकुम्भ सुवर्ण, ताँबा, चाँदी, प्रस्तर, ईंट अथवा सुधा—इन पाँच
पदार्थों के मिश्रण से निर्मित करना चाहिये। इसे कील के समान रखना चाहिये।
सुसंस्थाप्याचलं यावत् प्रोक्षयेद् गन्धवारिणा।
विमानादवरुह्याथ गर्भगृहं च मण्डपम् ॥१९५॥
प्रोक्षयित्वा मुखे स्थित्वा नत्वा देवं वदेदिदम्।

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२३
इसे स्थिर करते हुये स्थापित करके सुगन्धित जल से इसका प्रोक्षण करना
चाहिये। विमान ( देवालय ) से उतरने के पश्चात् गर्भगृह एवं मण्डप का प्रोक्षण करना
चाहिये तथा सम्मुख खड़े होकर वास्तुदेव को प्रणाम कर इस प्रकार कहना चाहिये।
धाराधिपातात् सलिलप्रकोपाद्
दंष्ट्र्या निपातात् पवनप्रकोपात् ।
अग्नेश्च दाहान्मुषितापचाराद्
रक्षत्विदं सद्म शिवं च मेऽस्तु ॥१९६॥
( हे ईश्वर ) इस भवन की गिरने से, जल के प्रकोप से, ( गजादि पशुओं के )
दाँत से गिरने से, वायु के प्रकोप से, अग्नि द्वारा जलने से एवं चोरों से रक्षा कीजिये
और मेरा कल्याण कीजिये ।।१९६।।
निरुजा मुदिता सधना प्रथिता यशसा महदद्भुतवीर्ययुता।
सततं निरुपद्रवकर्मयुता पृथिवी पृथु जीवतु धर्मविधेः ॥१९७॥
रोगरहित, प्रसन्नता, धनयुक्त, कीर्ति का विस्तार करने वाली, बड़े चमत्कारों से
एवं बल से युक्त, विना उपद्रव के निरन्तर कर्म से युक्त यह पृथिवी चिरकाल तक
धर्मपूर्वक रहे ।।१९७।।
ब्रह्मा विष्णुः शङ्करः सर्वदेवाः
क्षोणी लक्ष्मीर्वाग्वधूः सिंहकेतुः ।
ज्येष्ठ विश्वेदेवदेव्यः प्रजानां
श्रीसौभाग्यारोग्यभोग्यं कृषीरन् ॥१९८॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सभी देवता, क्षोणी ( पृथिवी ), लक्ष्मी, वाग्वधू ( सरस्वती ),
सिंहकेतु, ज्येष्ठा, विश्वेदेव तथा देवियाँ प्रजाजनों को श्री, सौभाग्य, आरोग्य एवं भोग
प्रदान करें।।१९८।।
उक्त्वैवं स्थपतेः कर्मण्यत्रैव परिनिष्ठिते ॥१९९॥
स्थापको विधिना शुद्धिं कुर्याद् यागादिकर्मभिः ।
प्रोक्षयित्वा घटाम्भोभिः पञ्चगव्यैः कुशोदकैः ॥२००॥
इस प्रकार कहने के पश्चात् स्थपति का कार्य पूर्ण हो जाता है। इसके पश्चात्
स्थापक को विधि-पूर्वक यज्ञ आदि कार्य से तथा घट के जल, पञ्चगव्य एवं कुश
के जल से प्रोक्षण कर ( विमान को ) शुद्ध करना चाहिये ।।१९९-२००।।
अर्चयेद् गन्धपुष्पाद्यैर्नैवेद्यं च प्रदापयेत् ।
प्रासादबीजमन्त्रांस्तु न्यसेत् सौधाधिदेवताम् ॥२०१॥

२२४ मयमतम्
स्थापक को गन्ध एवं पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिये तथा नैवेद्य प्रदान करना
चाहिये; साथ ही देवालय के प्रधान देवता को निमित्त बना कर प्रासाद के बीज-मन्त्र
का न्यास करना चाहिये॥२०१॥
☀ दक्षिणादानम् ☀
प्रासादाभिमुखे स्थित्वा यजमानः प्रसन्नधीः।
स्थपतेर्धर्मसर्वस्वं क्लेशेन सह यद् भवेत्॥२०२॥
तत् सर्वं परिगृह्णीत सुप्रीत्या स्थापकाज्ञया।
पूजयेत्तु यथाशक्ति स्थापकं स्थपतिं ततः॥२०३॥
दक्षिणा एवं दान—प्रसन्न-मति यजमान देवालय के सम्मुख खड़े होकर स्थपति
के सम्पूर्ण धर्म (उत्तरदायित्व) को, जो उसके ऊपर कष्ट के साथ थे, उन सबको
प्रसन्न भाव से स्थापक की आज्ञा से ग्रहण करे एवं शक्ति के अनुसार स्थापक एवं
स्थपति का सत्कार करे॥२०२-२०३॥
पुत्रभ्रातृकलत्रैश्च यजमानो मुदा धनैः।
धान्यैश्च पशुभिर्वस्त्रैर्वाहनैर्भूमिदानकैः॥२०४॥
शेषानपि च तक्षादिविष्ठिसर्वान् स कर्मणि।
सन्तर्पयेद्धिरणयैश्च वस्त्रैर्वाऽपि मनोहरैः॥२०५॥
अपने पुत्र, भाई एवं पत्नी के साथ यजमान धन, अन्न, पशु, वस्त्र, वाहन तथा
भूमि के दान से एवं सोने तथा सुन्दर वस्त्रों से शेष तक्षक आदि सभी शिल्पियों को
भी सन्तुष्ट करे॥२०४-२०५॥
विमानस्तूपिकास्तम्भमण्डपालङ्कृतान्यपि ।
वस्त्रादीनि ध्वजं धेनुं प्रीत्या स्थपतये ददेत्॥२०६॥
विमान, स्तूपिका (स्तूपिका), स्तम्भ एवं मण्डप को अलङ्करणों से युक्त,
वस्त्रादि, ध्वज एवं गाय को प्रसन्न भाव से स्थपति को देना चाहिये॥२०६॥
☀ सम्प्रोक्षणावश्यकता ☀
एवमेवं कृतं वस्तु वर्धयेन्नित्यमा युगात्।
यजमानस्त्विहामुत्र फलं सम्यग् लभेद् दृढम्॥२०७॥
सम्प्रोक्षण की आवश्यकता—इस प्रकार से निर्मित वास्तु युगों तक नित्य
वृद्धि को प्राप्त होता है। यजमान को इस लोक एवं परलोक में स्थिर फल भली-भाँति
प्राप्त होता है॥२०७॥

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२५
अन्यथा चेत् फलं नैव लभते तत्र वस्तुनि ।
भूतप्रेतपिशाचादिराक्षसाश्च वसन्त्यलम् ॥२०८॥
तस्मात् प्रासादनिष्पन्ने सर्वथा प्रोक्षणं चरेत् ।
यदि वास्तु-कृत्य अन्य विधि से होता है तो वह वास्तु फलदायी नहीं होता है।
उस भवन में भूत, प्रेत, पिशाच एवं राक्षस निवास करते हैं। इसलिये प्रासाद निर्मित
हो जाने पर सब प्रकार से प्रोक्षण कर्म अवश्य करना चाहिये ॥२०८॥
मण्डपे च सभायां वा रङ्गे विहारशालके ॥२०९॥
हेमगर्भसभायां तु त्तुलाभारकूटके ।
विश्वकोष्ठे प्रपायां च धान्यागारे महानसे ॥२१०॥
वास्तुदेवबलिं दत्त्वाधिवास्य विधिना तथा ।
स्थपतिः पूतचित्तात्मा प्राप्तपञ्चाङ्गभूषणः ॥२११॥
नवाम्बरधरश्चैव नववस्त्रोत्तरीयकः ।
सर्वमङ्गलघोषैश्च जलसम्प्रोक्षणं चरेत् ॥२१२॥
मण्डप में, सभा में, रङ्गमण्डप में, विहारशाला में, हेमगर्भ के सभागार में,
तुलाभारकूट में, विश्वकोष्ठ में, प्रपा ( जल का प्याऊ ) में, धान्यगृह में तथा रसोई
में विधिपूर्वक वास्तुदेव को बलि प्रदान कर पवित्र चित्त एवं आत्मा से पाँच अङ्गों में
आभूषण धारण कर, नवीन वस्त्र पहन कर तथा नवीन उत्तरीय ( ऊपर ओढ़ने का
चादर ) धारण कर सभी प्रकार के मङ्गल-स्वर के साथ जलसम्प्रोक्षण कर्म सम्पन्न
करना चाहिये ॥२०९-२१२॥
✹ सम्प्रोक्षणकालः ✹
उत्तरायणमासे तु कृतं चेदुत्तमोत्तमम् ।
त्वरितेऽप्येवमेवं तु कुर्यात्तद् दक्षिणायने ॥२१३॥
सम्प्रोक्षण का समय—यदि सम्प्रोक्षण-कर्म उत्तरायण मासों में किया जाय तो
अति उत्तम होता है। यदि शीघ्रता हो तो दक्षिणायन मासों में भी करना चाहिये।। २१३।।
त्रिरात्रमेकरात्रं वा सद्योऽधिवासमेव वा ।
तत्रैवाविकले द्रव्ये लभेत् कर्ता महत् फलम् ॥२१४॥
कर्ता प्रासाद के पूरी तरह पूर्ण हो जाने पर तीन रात्रि, एक रात्रि अथवा उसी दिन
वहाँ अधिवास करे तो वह महान् फल प्राप्त करता है।।२१४।।
मय०-१५

२२६ मयमतम्
✴ कलशस्थापनम् ✴
एकत्रिपञ्चकलशेषु तथाऽधिदेवा
एकत्रिपञ्च कथिता इह मूर्त्तयस्ताः ।
तत्तत् स्वमन्त्रसहितं तदधः सहेम-
रत्नं निधाय विधिना कलशान्न्यसेत्तत् ॥२१५॥
देवालय में एक, तीन या पाँच देवतामूर्ति हों तो एक, तीन या पाँच कलशों में
मन्त्रसहित उनके नीचे सुवर्ण के साथ रत्न को रखकर विधिपूर्वक कलशों का न्यास
करना चाहिये।।२१५।।
एवं मुदा भवनकर्मसमाप्तिमत्र
कुर्याज्जनेशजनगोकुलसम्पद्वृद्ध्यै ।
यद्वैपरीत्यमसमाप्तिकवस्तुवेशं
तद्वास्तुदेवबलिहीनमनर्थदं स्यात् ॥२१६॥
इति मयमते वास्तुशास्त्रे शिखरकरणभवनकर्म-
समाप्तिविधानं नामाष्टादशोऽध्यायः
इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक भवन का निर्माण पूर्ण होता है तो गृहस्वामी, उसके
परिवार, उसके परिजन एवं उसके गायों के वंश की वृद्धि होती है। इसके विपरीत
वास्तुकार्य सम्पन्न होने पर एवं वास्तुदेवता के बलि से रहित होने पर वह निर्मित भवन
अनर्थकारी होता है।।२१६।।
व्याख्यात्मक टिप्पणी
१. गललक्षण ( श्लोक २-६ )
इसका वर्णन शिल्परत्न (पूर्व., ३१ अ.) में विस्तार से प्राप्त होता है। यहाँ
गल के प्रमाण, प्रकार एवं मूषा आदि इस प्रकार वर्णित हैं—
ऊर्ध्वभूमेः पादतुङ्गं गलमानमुदाहृतम्।
आद्यङ्घ्रोनततुल्यं वा गलोन्नतमिहोच्यते।।
तदुच्चात् त्रिचतुष्पञ्चभागैकं वेदिकोन्नतम्।
शेषं गलोदयं ख्यातमशेषं वा गलोदयम्।।
त्रिचतुष्पञ्चहस्तं वा गलव्यासमुदाहृतम्।
अङ्घ्रेर्वेद्यङ्घ्रिप्रवेशं यत्तद्वद्वा गलवेशनम्।।

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२७
त्रिपादं वा तदर्थं वा वेद्यङ्गेर्गलवेशनम्।
वेदास्त्रं नागकर्णं वस्वस्रं द्राविडे गलम्।।
वृत्तं तु वेसरे हर्म्ये शीर्षानुकूलमाचरेत्। (१-५)
इसी ग्रन्थ में दूसरा मत इस प्रकार है—
अथान्यथा—
वेदिकाद्विगुणोऽध्यर्धसमो वा स्याद्गलोदयः।
भित्तिविस्तारनामांशं वेदिकावेशनं भवेत्।।
ग्रीवावेशं तदूर्ध्वं स्याच्छरांशोनोऽपि तत्समः।
मृणालिकावक्रपादभूतहंसमृगैरपि ।।
व्यालनाट्यकथाभिर्वा गलभूषणमाचरेत्।
कूटकोष्ठमहानासिपञ्जराद्यैरथापि वा।। (१२-१४)
२. शिखरभेद ( श्लोक ७-१५ )
शिखरभेद का वर्णन शिल्परत्न ( पूर्व. ३२ अ. ) में इस प्रकार प्राप्त होता है—
तारात् पञ्चद्विभागं वा नवसप्तांशमेव वा।
त्रयोदशांशरुद्रांशं विमानानां विभागतः।।१।।
अत्यष्टितिथिभागं वा वेदरामांशकं तु वा।
षट्पञ्चांशं तु वा नागसप्तभागमथापि वा।।२।।
विस्तारार्धं तु वा कुर्यादष्टधा शिखरोदयम्।
वैदेहं मागधं चापि कौरवं कौसलं तथा।।३।।
शौरसेनं च गान्धारं क्रमेणावन्तिकं स्मृतम्।
व्यासार्धं शिखरोत्सेधं किञ्चिन्न्यूनं च मानुषम्।।४।।
व्यासार्धं तुङ्गमाद्यं तु तत्तुङ्गे सप्तभाजिते।
एकैकांशविवृद्ध्याष्टौ भवन्ति शिखरोदयाः।।५।।
व्यामिश्रकं कलिङ्गं च तथा काशिकमेव च।
वैराटं द्राविडं चैव बाह्लिकं कौल्लकं पुनः।।६।।
तथा शौण्डिकमित्येते व्यामिश्रादिलुपोदयाः।
एते दैवविमानानां पाषण्डश्रमिणां तथा।।७।।
प्रतिलोमकुलानां तु विशेषेण शुभावहाः।
अथवान्यप्रकारेण भवन्ति शिखरोदयाः।।८।।

२२८ मयमतम्
शिखरों की ऊँचाई के भी सात नाम प्राप्त होते हैं—
कालिङ्गकाश्यवाराटकौल्लकानि च शौण्डिकम्।
काश्मीरं चैव गाङ्गेयौ शिखराणि पृथग् विदुः ।।१४।।
विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (१२) में भवन-निर्माण की निर्माण-शैली में पाञ्चाली आदि
का उल्लेख इस प्रकार प्राप्त होता है—
पाञ्चाली मागधी चान्या शौरसेनी च वाङ्गिकी।
कोसली चापि कालिङ्गी द्राविडीति क्रियाकला।। (१२.१२)
३. लुपामान (श्लोक २३-२९)
लुपा के प्रमाण का उल्लेख वास्तुविद्या के अध्याय १० एवं ११ में अत्यन्त
विस्तार से प्राप्त होता है। लुपा की योजना में एक विधि यह भी है कि किसी फलक
पर पहले पूरी योजना अङ्कित कर लेनी चाहिये—
अथवा मन्दबुद्धीनां क्रियालाघवसिद्धये।
निम्नोन्नतविहीनायां फलकायामथालिखेत्।। (११.१)
इसकी पूरी प्रक्रिया ११वें अध्याय में विस्तार से वर्णित है।
(ख) शिल्परत्न (पूर्व. ३३) में सम्पूर्ण अध्याय में लुपा-योजना के विषय में
विस्तार से चर्चा की गई है। वहाँ भी फलक पर लुपाओं की स्थिति अङ्कित करने की
चर्चा प्राप्त होती है—
तत्तदिष्टलुपायाममिष्टयोगात् प्रकल्पयेत्।
लुपाफलकमादाय तक्षितं तक्षकोत्तमैः।। (३३.१७)
(ग) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (अ. ६३) में प्रमाणसहित लुपा-निर्माण का वर्णन
किया गया है।
(घ) मनुष्यालयचन्द्रिका (अ. ६) में लुपा-संयोजन का प्रमाणसहित वर्णन प्राप्त
होता है। उसकी योजना बनाते समय सबसे पहले समचतुरस्र आकृति खींचनी चाहिये।
इसकी चौड़ाई के बराबर सीधी लुपायें एवं कर्णों पर विकृति लुपायें अङ्कित करनी
चाहिये—
अब्ध्यस्रं मञ्चकस्य प्रततिमितमथाकल्प्य तत्कर्णमर्धी-
कृत्य न्यसेद् भुजायामथ विकृतिलुपापङ्क्तिमत्रैव कुर्यात्।
तत्तत्कर्णप्रमाणं खलु विकृतिलुपानां पृथग् विस्तृतिः स्यात्
पार्श्वे कार्यं ध्वजादित्रयमपि च वितानं च लम्बं च सूत्रम्।। (५.२१)
४. लुपाभेद (श्लोक ३०-३१)
(क) वास्तुविद्या (११ अ.) में प्रकृति, कोटि एवं उपकोटि लुपाओं का वर्णन

अष्टादशोऽध्यायः 卐 प्रासादोर्ध्ववर्गाः २२९
प्राप्त होता है—
कूटोत्तराग्रयोः कर्णं गतां तां प्रकृतिं विदुः ।।१०।।
तन्मानभुजया कर्णरेखा या लिखिता पुरा।
सा रेखा शिल्पशास्त्रज्ञैः कोटिरित्यभिधीयते ।।११।।
तदन्तरालगायाश्च उपकोट्यादयः स्मृताः ।।१२।।
(ख) मनुष्यकालयचन्द्रिका ( ६ अ. ) में प्रकृति लुपा ( ऋजुमञ्च ) एवं विकृति
लुपा—कोटि एवं उपकोटि लुपा का वर्णन प्राप्त होता है। सीधी लुपायें प्रकृति लुपा
तथा पार्श्व में स्थित झुकी लुपायें कोटि एवं कोटि पर आश्रित लुपायें उपकोटि संज्ञक
होती हैं—
ऋजुमञ्चाख्यास्तुल्याः प्रकृतिलुपाः पार्श्वसंस्थिताः सर्वाः।
कोट्युपकोटाद्याः स्युर्विकृतिलुपास्तास्त्वतुल्यदीर्घतताः ।।६।।
५. छादन ( श्लोक ४६ )
मनुष्यकालयचन्द्रिका ( अ. ७ ) में लोष्टनिर्मित फलक एवं ताम्र आदि धातुओं से
निर्मित आच्छादन का वर्णन प्राप्त होता है—
लोष्टैराच्छाद्यते चेदखिलनिलयने पट्टिकाप्रस्तरः स्यात्
तत्स्थाने क्वापि कार्योऽपि च घनफलकाप्रस्तरो बद्धकीलः।
लोष्ठाधाराय किञ्चित्तलमपि च खनेच्चञ्चुसन्धारणार्थं
ताम्रैराच्छाद्यते चेन्न तु तलरचना देवगेहादिकेषु ।।७।।
(ख) शिल्परत्न ( ३४ अ. ) में शिखराच्छादन का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है—
अथ शौल्बे राजतैर्वा सौवर्णैर्वा सुरालये।
शिखराच्छादनं कुर्यात् फलकैरर्थसौलभात् ।।३०।।
६. ललाटभूषण ( श्लोक ४८-८१ )
मनुष्यकालयचन्द्रिका ( अ. ५ ) में भी भवन के शीर्ष भाग के अलङ्करण का वर्णन
किया गया है—
यद्वा कपोतवलभीविलसत्तु लोलुपोद्यत्पिधानफलकादितुलाविशेषैः।
युक्तञ्च खण्डफलकादिविचित्रचित्रभूतिप्रभेदसहितं महितं विदध्यात्।।४०।।
(ख) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ६३ अ. ) में लुपाओं पर चित्रण का उल्लेख प्राप्त
होता है—
गन्धर्वमुखयुक्ता वा लतापुष्पक्रियान्विता ।।४।।
(ग) शिल्परत्न ( पू०. ३५ अ. ) में शीर्ष-भूषण का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है—

२३० मयमतम्
वल्लीमण्डलचित्राद्यैर्भूषयेन्मुखपट्टिकाम् ।
मुखपट्ट्यवशेषं तदवगाढमुदाहृतम् ।।९।।
अवगाढाख्यभागं तु मृणालादिविभूषितम्।
शूलाभं वा स्थलाभं वा सव्यालं वा सनाटकम्।।१०।।
मालिकाकूटकोष्ठादिमण्डितं वा विमानवत्।
चित्रपत्राख्यमकरतोरणाढ्यमथापि वा।।११।।
तोरणाभ्यन्तरे लक्ष्मीः साभिषेकाम्बुजासना।
अन्यैर्नानालङ्करणैर्नासीगाढं तु, मण्डयेत्।।१२।।
ललाटिकावगाढं तु तथैव च विभूषयेत्।।१३।।
७. स्थूपिका (श्लोक ८२-९१)
स्थूपिका का विशद वर्णन शिल्परत्न (पूर्व. अ. ३६) में प्राप्त होता है।
८. सुधा (श्लोक ९२-१०८)
सुधावर्णन शिल्परत्न (पूर्व. अ. १४) श्लोक ५८-७५ के सदृश है।
९. मूर्ध्नेष्टका (श्लोक ११६-१२०)
मूर्ध्नेष्टका का वर्णन शिल्परत्न (पूर्व. अ. ३४) में द्रष्टव्य है। वहाँ इसका वर्णन
पूरे अध्याय में किया गया है।
१०. स्थूपिकाकील (श्लोक १२१)
स्थूपिकाकील के विषय में शिल्परत्न (पूर्व. अ. ३४) में इस प्रकार वर्णन प्राप्त
होता है—
लोहजं दारुजं वाथ स्थूपीदण्डं तु कारयेत्।।४।।
१०. स्थूपिकाकील की आकृति (श्लोक १२६)
स्थूपिकाकील की आकृति के विषय में शिल्परत्न (पूर्व. ३४ अ.) में इस प्रकार
उल्लेख किया गया है—
तस्याग्रमङ्गुलं व्यासं मूलादग्रं क्रमात् कृशम्।
तुङ्गे गुणांशे त्वेकांशं मूले वेदास्रमाचरेत्।।८।।
वस्वस्रं मध्यमग्रे तु वृत्ताकारं प्रकल्पयेत्।
चतुरस्रोपरिष्टात्तु सर्वं वृत्तमथापि वा।।९।।
कर्तव्यं तस्य मूले तु शिखिपादेन योजनम्।

अथैकोनविंशोऽध्यायः
( एकभूमिविधानम् )
एकभौमं चतुर्मानं वक्ष्ये संक्षिप्य शास्त्रतः ।
त्रिचतुर्हस्तमारभ्य नव पङ्क्त्यन्तविस्तृतम् ॥१॥
एक तल का विधान—एक तल वाले भवन ( देवालय ) का शास्त्र के अनुसार
चार प्रकार का प्रमाण संक्षेप में कहता हूँ। यह तीन हाथ से प्रारम्भ कर नौ हाथ तक
एवं चार हाथ से प्रारम्भ कर दस हाथ तक विस्तृत होता है।।१।।
तारे सप्तदशोत्सेधमध्यर्धं तत्रिपादकम् ।
द्विगुणं तु तदुत्सेधं शान्तिकं पौष्टिकं भवेत् ॥२॥
जयदं चाद्भुतं चैव चतुर्थोदयमीरितम् ।
इनकी ऊँचाई चौड़ाई के दस भाग में सातवें भाग के बराबर, चौड़ाई का डेढ़ गुना,
चौड़ाई का तीन चौथाई ( अर्थात् चौड़ाई के दुगुने से चतुर्थांश कम ) या चौड़ाई का
दुगुना ऊँचा ( ये चार प्रकार के मान ) होनी चाहिये। चार प्रकार की ऊँचाई वाले भवन
की संज्ञा शान्तिक, पौष्टिक, जयद एवं अद्भुत होती है।।२।।
चतुरं वृत्तमायामं द्व्यस्रवृत्तं षडस्रकम् ॥३॥
अष्टास्रमाकृतिर्ह्येषां शिखरेऽपि तथैव च ।
इन ( देवालयों ) की आकृति चौकोर, गोल, आयताकार, दो कोणों के साथ
गोलाई लिये, षट्कोण तथा अष्टकोण होती है। इनका शिखर भी इनकी आकृति के
अनुरूप होता है।।३।।
✺ मुखमण्डपम् ✺
समं त्रिपादमर्धं वा मुखमण्डपमिष्यते ॥४॥
देवालय के मुखभाग पर निर्मित मण्डप का माप देवालय के समान, तीन चौथाई
अथवा आधा होना चाहिये।।४।।
समं तन्मण्डपं तस्य सान्तरालं सवेशकम् ।
युग्मस्तम्भसमायुक्तं युक्त्या सर्वाङ्गशोभितम् ॥५॥

२३२ मयमतम्
( देवालय के ) समान मण्डप अन्तराल ( मण्डप एवं मन्दिर का मध्य भाग )
एवं वेशक ( प्रवेश, पोर्च ) से युक्त तथा सम संख्या वाले स्तम्भों से युक्त एवं सम्पूर्ण
अङ्गों से अलंकृत होना चाहिये।।५।।
सार्धहस्तं द्विहस्तं वा प्रासादस्यांशमेव वा।
अन्तरालस्य विस्तारं द्विदण्डं तस्य वेशनम् ।।६।।
सावकाशान्तरालं चेद् द्वित्रिहस्तान्तरं तु वा।
पार्श्वे सोपानसंयुक्तं हस्तिहस्तविभूषितम् ।।७।।
अन्तराल का विस्तार डेढ़ हाथ, दो हाथ या प्रासाद के बराबर एवं उसकी लम्बाई
दो दण्ड होनी चाहिये। उसका वेशन अवकाश एवं अन्तराल से युक्त हो तो उसका
माप दो या तीन हाथ का होना चाहिये। वेशन के बगल में सोपान निर्मित हो एवं वह
गज के सूँड़ से सुसज्जित हो।।६-७।।
धाम्नः कुड्यस्यार्धकं तत्समं वा
पादोनं वा भित्तिविष्कम्भमानम्।
पार्श्वे चैतद् द्वित्रिदण्डैस्तु वेशं
कुर्यादग्रे मण्डपस्यास्य धीमान् ।।८।।
भित्तिनिष्कम्भ का मान प्रधान भवन की भित्ति के बराबर, उसका आधा या उससे
चतुर्थांश कम होना चाहिये। पार्श्व भाग में दो या तीन दण्ड माप का वेशन एवं अग्र
भाग में मण्डप होना चाहिये, ऐसा बुद्धिमान ( ऋषि ) का मत है।।८।।
तत्युन्नतायतकरेषु च हस्तमानाद्
हीनं त्रिपादकरमर्धमथापि पादम्।
तत्रैव वस्तुनि यथोचितमाचरेद्वै
हानिं च वृद्धिकमनिन्द्यमनेकशास्त्रैः ।।९।।
विस्तार, ऊँचाई एवं लम्बाई के हस्तमान में एक हाथ कम ( अर्थात् ) तीन
चतुर्थांश, आधा अथवा चौथाई प्रमाण होना चाहिये। वहीं ( प्रधान ) भवन के निर्माण
में अनेक शास्त्रकारों द्वारा किसी भी प्रकार की वृद्धि अथवा हानि को वर्जित किया गया
हैं।।९।।
✺ धामपर्यायनामानि ✺
विमानं भवनं हर्म्यं सौधं धाम निकेतनम्।
प्रासादं सदनं सद्म गेहमावासकं गृहम् ।।१०।।

एकोनविंशोऽध्यायः 卐 एकभूमिविधानम् २३३
आलयं निलयं वासमास्पदं वस्तु वास्तुकम्।
क्षेत्रमायतनं वेश्म मन्दिरं धिष्ण्यकं पदम् ॥११॥
लयं क्षयमगारं च तथोदवसितं पुनः।
स्थानमित्येवमुक्ताश्च पर्यायाख्या हि पण्डितैः ॥१२॥
भवन के पर्यायवाची नाम—विद्वानों के अनुसार भवन के पर्यायवाची शब्द
ये हैं—विमान, भवन, हर्म्य, सौध, धाम, निकेतन, प्रासाद, सदन, सद्म, गेह, आवासक,
गृह, आलय, निलय, वास, आस्पद, वस्तु, वास्तुक, क्षेत्र, आयतन, वेश्म, मन्दिर,
धिष्ण्यक, पद, लय, क्षय, अगार, उदवसित तथा स्थान॥१०-१२॥
❋ गर्भगृहमानम् ❋
हर्म्यतारत्रिभागैकं भूतांशेषु गुणांशकम्।
धातुभागे युगांशः स्याद्बाणांशं नवभागिके ॥१३॥
रुद्रांशे रसभागं तु धातु त्रयोदशांशके।
तिथ्यंशे वसुभागं तु सप्तदश नवांशकम् ॥१४॥
विस्तारार्धं तु ते सर्वे नालीगृहविशालताः।
गर्भगृह=प्रधान भूतिकक्ष का मान—विस्तार में गर्भगृह का प्रमाण मन्दिर के
प्रमाण के तीन भाग में एक भाग, पाँच भाग में तीन भाग, सात में चार भाग, नौ में
पाँच भाग, ग्यारह में छः भाग, तेरह में सात भाग, पन्द्रह में आठ भाग, सत्रह में नौ
भाग या आधा होना चाहिये॥१३-१४॥
❋ स्तूपिकामानम् ❋
फलिके पञ्चभागे तु युगार्धं पद्मविस्तृतम् ॥१५॥
पद्मतारत्रिभागैकं कुम्भतारमिति स्मृतम्।
कुम्भतारत्रिभागैकं कुम्भस्याधो वलग्नकम् ॥१६॥
वलग्नस्य त्रिभागैकं कुम्भस्योपरि कन्धरम्।
कन्धरत्रिगुणं पाली तत्रिभागेन कुड्मलम् ॥१७॥
स्तूपिका का प्रमाण—फलिक के पाँच भाग में दो भाग के बराबर पद्म की
चौड़ाई रखनी चाहिये। पद्म की चौड़ाई के तीसरे भाग के बराबर कुम्भ की चौड़ाई रखनी
चाहिये। कुम्भ के विस्तार के तीसरे भाग के बराबर कुम्भ के नीचे वलग्न का मान
होना चाहिये। वलग्न के तीसरे भाग के बराबर कुम्भ के ऊपर कन्धर होना चाहिये।
कन्धर का तीन गुना पाली का प्रमाण एवं उसके तीसरे भाग के बराबर कुड्मल का
मान होना चाहिये॥१५-१७॥

२३४ मयमतम्
समं त्रिपादमर्धं वा महानासीविनिर्गमम् ।
तद्व्यासत्रिचतुर्भागहीनं स्कन्धान्ततुङ्गकम् ॥१८॥
महानासी (सजावटी खिड़की) का विनिर्गम (निर्माणयोजना शिखर के विशिष्ट
भाग के) बराबर, तीन चतुर्थांश अथवा आधा चौड़ा होना चाहिये। इसकी ऊँचाई
उसकी चौड़ाई से तीन या चार भाग कम एवं स्कन्ध के अन्तिम भाग तक रखनी
चाहिये।।१८।।
शक्तिध्वजं तदर्धोच्चं त्रिपादं वा विधीयते ।
कन्थरोच्चत्रिभागैकं वेदिकोदयमीरितम् ।
सार्धदण्डं द्विदण्डं वा क्षुद्रनास्या विशालकम् ॥१९॥
शक्तिध्वज को उसका आधा ऊँचा अथवा तीन चौथाई प्रमाण का होना चाहिये।
कन्धर की ऊँचाई के तीसरे भाग से वेदिका का उदय (प्रारम्भ) कहा गया है।
क्षुद्रनासा (छोटी सजावटी खिड़की) की चौड़ाई आधा दण्ड या दो दण्ड होनी
चाहिये।।१९।।
✺ द्वारम् ✺
पादोत्सेधे पङ्क्तिनन्दाष्टभागे द्वारोत्सेधं तत्तदेकांशहीनम् ।
विस्तारं स्यात्तदुच्छ्रार्धमानं द्वारं कुर्याद्धर्म्यमध्ये नृपाणाम् ॥२०॥
द्वार की ऊँचाई स्तम्भ की ऊँचाई के दश भाग में नौ भाग, आठ में नौ भाग या
सात में आठ भाग के बराबर होनी चाहिये। इसकी चौड़ाई ऊँचाई की आधी होनी
चाहिये। राजभवन के मध्य भाग में द्वार होना चाहिये।।२०।।
योगव्यासं पादविष्कम्भमानं पादाधिक्यं वा तदर्धं त्रिपादम् ।
बाहुल्यं स्यादुच्छ्रये वेदभागे बाह्ये साब्जक्षेपणं तत्रिभागैः ॥२१॥
द्वार के पाख (चौखट का पार्श्व) की चौड़ाई स्तम्भ के बराबर अथवा उससे
चतुर्थांश अधिक होनी चाहिये एवं उसकी मोटाई चौड़ाई की आधी या तीन चतुर्थांश
होनी चाहिये। बाहरी भाग में द्वार का बाहुल्य पद्मों से सुसज्जित होना चाहिये एवं
इसकी मोटाई चौड़ाई के तीन चतुर्थांश भाग के माप की होनी चाहिये।।२१।।
भित्तिव्यासे द्वादशांशे तु बाह्ये
पञ्चांशान्तद्वारयोगस्य मध्यम् ।
तद्वच्चान्तः स्तम्भमध्यं तयोस्त
न्मध्यं प्रोक्तं भित्तिमध्यं विधिज्ञैः ॥२२॥
भित्ति के व्यास के बाहरी भाग के बारह भाग करने चाहिये। पाँचवें भाग में द्वार-

एकोनविंशोऽध्यायः 卐 एकभूमिविधानम् २३५
योग का मध्य भाग होना चाहिये तथा दूसरी ओर से भी इतनी ही दूरी रखनी चाहिये।
इन दोनों (बिन्दुओं) के मध्य को विद्वानों ने भित्तिमध्य कहा है।।२२।।
❋ नालमानम् ❋
जन्मान्तं वा जगत्यन्तं कैरवान्तं गलान्तकम् ।।२३।।
पट्टिकान्तं तलं पञ्चभेदं सर्वेषु धामसु।
छिद्रं विद्यादधश्चोर्ध्वं बाह्ये नालं प्रयोजयेत् ।।२४।।
नाली का मान—सभी भवनों में तल के पाँच भेद होते हैं—जन्म का अन्तिम
भाग, जगती का अन्तिम भाग, कैरव का अन्तिम भाग, गल का अन्तिम भाग एवं
पट्टिका का अन्तिम भाग। इनके निचले एवं ऊपरी भाग में छिद्र होना चाहिये एवं नाली
बाहर होनी चाहिये।।२३-२४।।
द्वादशाङ्गुलमारभ्य त्रित्र्यङ्गुलविवर्धनात्।
चतुर्विंशाङ्गुलं यावदायामं पञ्चधा भवेत् ।।२५।।
बारह अङ्गुल से प्रारम्भ करते हुये तीन-तीन अङ्गुल की वृद्धि से चौबीस अङ्गुल-
पर्यन्त पाँच प्रकार की नाली की लम्बाई होती है।।२५।।
अष्टाङ्गुलं समारभ्य द्विद्व्यङ्गुलविवर्धनात्।
तारं षोडशमात्रान्तं पञ्चधा परिकीर्तितम् ।।२६।।
आठ अङ्गुल से प्रारम्भ कर दो-दो अङ्गुल बढ़ाते हुये सोलह अङ्गुलपर्यन्त पाँच
प्रकार की नाली की चौड़ाई होती है।।२६।।
समं त्रिपादमर्धं वा घनं छिद्रं तु मध्यमे।
त्रिचतुष्पञ्चषण्मात्रं तारं तत्समनिम्नकम् ।।२७।।
इनकी मोटाई (गहराई) चौड़ाई के बराबर, तीन चौथाई या आधी होनी चाहिये।
मध्यम माप तीन, चार, पाँच या छः अङ्गुल चौड़ा एवं उतना ही गहरा होता है।।२७।।
मूलात् पञ्चत्रिभागं स्यादग्रं धारासमन्वितम्।
घटितं सिंहवक्त्रेण किञ्चिन्मूलान्नताग्रकम् ।।२८।।
नाली के अग्र भाग (दूसरे छोर) की चौड़ाई मूल भाग के पाँच भाग में से तीन
भाग के बराबर एवं धारा से युक्त होनी चाहिये। इसका अग्र भाग मूल भाग से कुछ
नीचा (ढालदार) एवं सिंह के मुख से युक्त होता है।।२८।।
एवं नालं प्रकर्तव्यं वामे प्रासादमध्यमे।
अन्तःपीठस्य नालस्य समं वा बहिरिष्यते ।।२९।।

२३६ मयमतम्
इस प्रकार देवालय के मध्य भाग के वाम भाग में प्रणाल का निर्माण करना
चाहिये। अन्तःपीठ का नाल बराबर ( सतह पर ) एवं बाहर होना चाहिये।।२९।।
❋ अलङ्करणम् ❋
विस्तारायाममुत्सेधं सर्वाण्यङ्गानि च क्रमात्।
संक्षेपतः समादिष्टान्यलङ्कारमथोच्यते ।।३०।।
सञ्जा—प्रासाद के सभी अङ्गों का संक्षेप में क्रमशः विस्तार, लम्बाई एवं ऊँचाई
का वर्णन किया गया है। अब उसके अलङ्करण का वर्णन किया जा रहा है।।३०।।
वृत्तग्रीवामस्तकं वैजयन्तं श्रीभोगं स्यात् कर्णकूटोपयुक्तम् ।
मध्येभद्रं श्रीविशालं तदेव वस्वस्रं चेच्छीर्षकं स्वस्तिबन्धम् ।।३१।।
यदि देवालय की ग्रीवा एवं मस्तक ( शीर्ष भाग ) वृत्ताकार हो तो उसकी संज्ञा
'वैजयन्त' होती है। यदि देवालय के कर्णभाग ( कोणों ) में कूट निर्मित हों तो वह
'श्रीभोग' संज्ञक होता है। यदि मध्य भाग में भद्र हो, तो वह 'श्रीविशाल' एवं शीर्षभाग
यदि अष्टकोण हो तो वह 'स्वस्तिबन्ध' संज्ञक प्रासाद होता है।।३१।।
वेदास्त्राभं तच्छिरः श्रीकरं स्याद् द्व्यस्रं वृत्तं हस्तिपृष्ठं हि नाम्ना ।
ऋत्वस्त्राभं शीर्षकं स्कन्दकान्तं तत्तन्नाम्ना तत्तदायामयुक्ते ।।३२।।
चार कोण वाले शीर्ष से युक्त प्रासाद 'श्रीकर', दो कोण एवं वृत्ताकार प्रासाद
'हस्तिपृष्ठ' तथा छः कोण के शीर्ष वाला प्रासाद 'स्कन्दकान्त' संज्ञक होता है। ये
सभी भवन लम्बाई लिये होते हैं।।३२।।
मध्ये भद्रयुतं कर्णकूटयुक्तं तु मस्तके।
कोष्ठकं भद्रनास्यङ्गं वृत्तं वा गलमस्तकम् ।।३३।।
नाम्नैतत् केसरं प्रोक्तं युगास्रं वा गलं शिरः ।
पञ्चसप्तर्तुभागे तु त्रिद्व्यंशैर्मध्यभद्रकम् ।।३४।।
केसर संज्ञक प्रासाद में मध्य भाग में भद्र एवं शीर्षभाग में कर्णकूट, कोष्ठक एवं
भद्रनासी आदि अङ्ग निर्मित होते हैं। इसके गल एवं मस्तक ( छत, आच्छादन )
वृत्ताकार अथवा चतुष्कोण होते हैं। मध्य-भद्रक का प्रमाण ( भवन की चौड़ाई के )
पाँच, सात या छः भाग के तीसरे एवं दूसरे भाग के बराबर होना चाहिये।।३३-३४।।
❋ धामभेदाः ❋
नागरं द्राविडं चैव वेसरं च त्रिधा मतम् ।
चतुरस्रायतास्रं यन्नागरं परिकीर्तितम् ।।३५।।

एकोनविंशोऽध्यायः 卐 एकभूमिविधानम् २३७
भवन के भेद—भवन के तीन भेद होते हैं—नागर, द्राविड एवं वेसर। सम,
चतुर्भुज एवं आयताकार भवन नागर कहे गये हैं।।३५।।
अष्टास्रं च षडस्रं च तत्तदायाममेव च।
सौधं द्राविडमित्युक्तं वेसरं तु प्रकथ्यते ॥३६॥
वृत्तं वृत्तायतं द्व्यस्रं वृत्तं चान्यं प्रकथ्यते।
आठ भुजा ( एवं कोण ) तथा छः भुजा ( एवं कोण ) वाला लम्बा भवन द्राविड़
कहा जाता है। वृत्ताकार, लम्बाई लिये वृत्ताकार, दो कोण एवं वृत्ताकार भवन वेसर
कहलाता है।।३६।।
स्थूप्यन्तं चतुरस्रं यन्नागरं परिकीर्तितम् ॥३७॥
ग्रीवात् प्रभृति वस्वस्रं विमानं द्राविडं भवेत्।
ग्रीवात् प्रभृति वृत्तं यद् वेसरं तदुदाहृतम् ॥३८॥
स्तूपिका पर्यन्त चौकोर भवन को नागर कहते हैं। ग्रीवा से अष्टकोण विमान
( भवन, प्रासाद ) द्राविड होता है। ग्रीवा से वृत्ताकार भवन वेसर कहलाता है।
❋ विमानतलदेवता ❋
तले तले विमानानां दिक्षु देवान् न्यसेत् क्रमात्।
पूर्व्वां द्वारपालौ तु नन्दिकालौ च विन्यसेत् ॥३९॥
विमान = देवालय के तलों के देवता—विमानों ( देवालयों ) के प्रत्येक तल
में दिशाओं में देवताओं का क्रमशः न्यास करना चाहिये। पूर्व दिशा में नन्दी एवं काल
के रूप में द्वारपाल का विन्यास करना चाहिये।।३९।।
दक्षिणे दक्षिणामूर्तिं पश्चिमेऽच्युतमेव हि।
अथवा लिङ्गसम्भूतमुत्तरे तु पितामहम् ॥४०॥
दक्षिण दिशा में दक्षिणामूर्ति को, पश्चिम दिशा में अच्युत को या लिङ्गसम्भूत को
एवं उत्तर में पितामह को विन्यस्त करना चाहिये।।४०।।
मण्डपे मध्यदेशे तु दक्षिणे तु विनायकम्।
तत्पूर्वे पश्चिमे वाऽपि नृत्तरूपं विशेषतः ॥४१॥
मण्डप के मध्य भाग में दक्षिण में विनायक, एवं उनके पूर्व या पश्चिम में नृत्तरूप
का विन्यास विशेष रूप से करना चाहिये।।४१।।
कात्यायनीमुदग्भागे क्षेत्रपालं तथैव च।
स्थानकासनसंयुक्ता दिशामूर्तीर्न्यसेद् बुधः ॥४२॥

२३८ मयमतम्
विशेषेण कथोपेतं रूपाण्यपि विधानतः ।
एवं मूलतले प्रोक्तमुपर्युपरि वक्ष्यते ॥४३॥
उत्तर भाग में कात्यायनी एवं क्षेत्रपाल को तथा स्थानक या आसन ( खड़े अथवा
बैठे ) मुद्रा में दिशामूर्तियों का विन्यास करना चाहिये। विशिष्ट कथाओं से युक्त
आकृतियों का भी नियमानुसार अङ्कन करना चाहिये। इस प्रकार मूल-तल ( भूतल )
के देवता-विन्यास का वर्णन किया गया। अब ऊपरी तलों के विन्यास का वर्णन किया
जा रहा है।।४२-४३।।
पुरन्दरं न्यसेत् पूर्वे सुब्रह्मण्यमथापि वा।
दक्षिणे वीरभद्रः स्यान्नारसिंहश्च पश्चिमे ॥४४॥
उत्तरे तु विधाता स्याद् धनदो वा विधीयते ।
एवं द्वितलविन्यासं त्रितले तु मरुद्गणान् ॥४५॥
तले तलेऽमरान् सिद्धान् गन्धर्वादिमुनीन् न्यसेत् ।
षोडश प्रतिमाश्चैव सर्वत्र परिकीर्तिताः ॥४६॥
दूसरे तल में पूर्व दिशा में पुरन्दर या सुब्रह्मण्य को, दक्षिण में वीरभद्र को, पश्चिम
में नरसिंह को एवं उत्तर में विधाता या धनद को विन्यस्त करना चाहिये। तीसरे तल
में मरुद्गणों का विन्यास करना चाहिये। प्रत्येक तल में देवों, सिद्धों, गन्धर्वादियों एवं
मुनियों का विन्यास करना चाहिये। प्रत्येक तल में सोलह प्रतिमाओं का विन्यास होना
चाहिये।।४४-४६।।
ग्रीवाधस्तात् प्रतेरूर्ध्वे कोणे कोणे वृषान् न्यसेत् ।
सर्वेषामपि देवानां तत्तद्वाहनमीरितम् ॥४७॥
प्रदक्षिणावृतं तस्य सर्वदेवालये तथा।
इत्येवमादिभिर्युक्तं विमानं सम्पदां पदम् ॥४८॥
कूटैर्नीडैस्तोरणैर्मध्यभद्रैर्युक्तायुक्तं तत्तु सर्वाङ्गशोभम् ।
नानाधिष्ठानाङ्घ्रिवेद्यादियोगं धाम प्रोक्तं तैतिलानां मयेह ॥४९॥
इति मयमते वास्तुशास्त्रे एकभूमिविधानं
नामैकोनविंशोऽध्यायः
ग्रीवा के नीचे एवं प्रति के ऊपर कोने-कोने पर वृषभों का विन्यास करना चाहिये।
सभी देवों के वाहन का वर्णन किया गया है। सभी देवालयों में देवता के दक्षिण भाग
में उनका विन्यास करना चाहिये। इस प्रकार सभी विशेषताओं से युक्त विमान ( मन्दिर )