सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 89

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६५
उत्कृष्ट ग्राम अथवा नगर में यदि नीच श्रेणी का देवालय हो तो वहाँ के पुरुषों
में नीच प्रवृत्ति एवं स्त्रियों में दुःशीलता होती है।।८१।।
तस्मात् सममधिकं वा तत्सङ्घ्येव प्रयोक्तव्या ।
हरिहरसदनं वास्तुकमन्यत् सर्वं यथेष्टं स्यात् ॥८२॥
इसलिये ग्राम अथवा नगर की श्रेणी के समान या अधिक श्रेणी का मन्दिर निर्मित
होना चाहिये। हरिहर मन्दिर अथवा अन्य सभी वास्तुनिर्मिति यथोचित होनी चाहिये।।८२।।
❋ दौवारिकाः ❋
चण्डेश्वरः कुमारो धनदः काली च पूतना चैव ।
कालीसुतश्च खड्गी चैते दौवारिकाः प्रोक्ताः ॥८३॥
चण्डेश्वर, कुमार, धनद, काली, पूतना, कालीसुत तथा खड्गी—ये देवता दौवारिक
कहे गये हैं।।८३।।
प्राक्प्रत्यङ्मुखमैशं ग्रामादिषु तत्पराङ्मुखं शुभदम् ।
विष्णुगृहं सर्वमुखं ग्रामस्यान्तर्मुखं शुभदम् ॥८४॥
ग्राम आदि में पूर्वमुख या पश्चिममुख शिव का स्थान होना चाहिये। यदि उनका
मुख ग्रामादि से बाहर की ओर हो तो प्रशस्त होता है। विष्णु का मुख सभी दिशाओं
में हो सकता है; किन्तु उनका मुख यदि ग्राम की ओर हो तो शुभ होता है।।८४।।
शेषं पूर्वाभिमुखं मातृणामुत्तराभिमुखम् ।
प्रत्यग्द्वारं सौरं गेहारम्भात् पुरामरावासम् ॥८५॥
शेष देवगण पूर्वमुख होने चाहिये। मातृदेवियों को उत्तरमुख स्थापित करना चाहिये।
सूर्यमन्दिर का द्वार पश्चिममुख होना चाहिये। पुर आदि में मनुष्यों के गृह से पहले देवालयों
का निर्माण कराना चाहिये।।८५।।
❋ वर्ज्यस्थानानि ❋
हृदये वंशस्थाने शूले सूत्रे च सन्धौ च ।
कर्णसिरायां षट्के नोक्तान्यमरालयादीनि ॥८६॥
त्याज्य स्थान—वास्तुमण्डल के हृदय, वंश, सूत्र, सन्धिस्थल तथा कर्णसिराओं—
इन छः स्थलों पर देवालय आदि का निर्माण नहीं होना चाहिये।।८६।।
❋ श्रेणिस्थानम् ❋
गोशाला दक्षिणतश्चोत्तरदेशे तु पुष्पवाटी स्यात् ।
पूर्वद्वारोपान्ते पश्चिमत्तस्तापसावासम् ॥८७॥
मय०-५