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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 395 में से

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पृष्ठ 86

६२ मयमतम्
मानुषमथ पैशाचं क्रमशः सङ्कल्प्य युक्त्या तु ।
दैविकमानुषभागे विप्राणां स्याद् गृहश्रेणी ॥६२॥
इसके पश्चात् मानुष एवं पैशाच क्षेत्र का निश्चय करना चाहिये। दैव एवं मानुष
क्षेत्र में ब्राह्मणों के गृह होने चाहिये।।६२।।
कर्मोपजीविनां स्यात्पैशाचे तत्र वा द्विजावासम् ।
तस्मिन् सुरगणभवनं क्रमशः प्रागादिषु स्थाप्यम् ॥६३॥
अपने कार्य के द्वारा अपनी आजीविका चलाने वालों का गृह पैशाच क्षेत्र में होना
चाहिये अथवा वहाँ ब्राह्मणों का आवास होना चाहिये। उनके मध्य पूर्व आदि दिशाओं
में क्रमानुसार देवालय की स्थापना करनी चाहिये।।६३।।
❋ प्रासादस्थानम् ❋
एतस्याभ्यन्तरे विप्रदेवतास्थापनं भवेत् ।
शिवहर्म्यं च ग्रामाणां समं बाह्येऽथवा भवेत् ॥६४॥
वास्तु-क्षेत्र के भीतर ब्राह्मण एवं देवता की स्थापना करनी चाहिये। शिवालय की
स्थापना ग्राम के बाहर होनी चाहिये अर्थात् शिवालय की स्थापना इच्छानुसार ग्राम के
भीतर या बाहर कहीं भी हो सकती है।।६४।।
भृङ्गराजांशके वाऽपि पावके तु विनायकम् ।
ऐशांशे शिवहर्म्यं स्यात् सौम्ये वानान्तरेषु वा ॥६५॥
भृङ्गराज के या पावक के भाग पर विनायक का मन्दिर होना चाहिये। ईश के पद
पर, सोम के पद पर अथवा अन्य किसी वास्तुपद पर शिवमन्दिर की स्थापना करनी
चाहिये।।६५।।
बाह्येऽस्य तु गृहश्रेणी मानेन विधिना कुरु ।
शैवानां परिवाराणां प्रोक्तं स्थानमिहोच्यते ॥६६॥
देवालय के बाहर गृहों की श्रेणी पूर्ववर्णित मान के अनुसार नियमपूर्वक होनी
चाहिये। शिव के परिवार-देवताओं के स्थान का यहाँ वर्णन किया जा रहा है।।६६।।
सूर्यपदे सौरं स्यादग्निपदे कालिकावेश्म ।
भृशभागे विष्णुगृहं याम्यायां षण्मुखस्थानम् ॥६७॥
सूर्य के वास्तुपद पर सूर्यदेवता का स्थान एवं अग्नि के पद पर कालिका का
मन्दिर होना चाहिये। भृश के वास्तुपद पर विष्णुमन्दिर तथा यम के पद पर षण्मुख
( कार्तिकेय ) का मन्दिर होना चाहिये।।६७।।