मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० मयमतम्
नन्द्यावर्त ग्राम (उपर्युक्त मार्गों से) युक्त होता है। यह नन्द्यावर्त आकृति का होता
है। बाहर की ओर जाने वाले मार्गों के बाहर चारो दिशाओं में चार द्वार होते हैं।।४९।।
युक्तानेकैकयुक्तं नन्द्यावर्ताभमिदमुदितम्।
आद्यैरष्टादशभिर्द्वाविंशत्यङ्गकैरूदग्वक्त्रैः ॥५०॥
अनेक मार्गों के आपस में संयुक्त होने से अनेक मार्ग-संयोग (तिराहे, चौराहे
आदि) बनते हैं। नन्द्यावर्त की आकृति के सदृश होने के कारण इस ग्राम को
'नन्द्यावर्त' कहते हैं।
पराग ग्राम का लक्षण इस प्रकार है—यहाँ अठारह से बाईस संख्या तक मार्ग
उत्तर से जाते हैं।।५०।।
षड्भिः प्राङ्मुखमार्गैर्युक्तं ह्येतत् परागमिति कथितम्।
प्राक्प्रत्यग्गतमार्गैः सप्तभिरुदगग्रैस्त्रिवेदशरैः ॥५१॥
छः मार्ग पूर्व से निकलते हैं। इस ग्राम को 'पराग' कहते हैं। (पद्म ग्राम में)
पूर्व-पश्चिम में सात मार्ग होते हैं तथा उत्तर से तीन, चार, पाँच—।।५१।।
षट्सप्तभिरपि युक्तैर्विंशतिभिः पञ्चधा पद्मम्।
अष्टभिरथ पूर्वाग्रैरुदगग्रैः साष्टविंशतिभिः ॥५२॥
छः या सात मार्ग निकलते हैं तथा बीस मार्ग-संयोग बनते हैं। इस प्रकार 'पद्म'-
ग्राम के पाँच भेद बनते हैं। (श्रीप्रतिष्ठित ग्राम में) आठ मार्ग पूर्व दिशा से तथा
अट्ठाईस से प्रारम्भ कर—।।५२।।
आद्यैर्द्धिः षोडशभिर्मार्गैरन्त्यैर्युतं यत्तु।
तच्छ्रीप्रतिष्ठितं स्यादष्टविधं ग्राममुद्दिष्टम् ॥५३॥
बत्तीस संख्या तक मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं। इसे 'श्रीप्रतिष्ठित' ग्राम कहते
हैं। इस प्रकार आठ प्रकार के ग्राम होते हैं।।५३।।
अथवा श्रीवत्सादिकमुपनेतव्यं तु विन्यासम्।
सर्वेषां ग्रामाणां नाभिं न प्रोतयेन्मतिमान् ॥५४॥
अथवा 'श्रीवत्स' आदि अन्य ग्रामों का भी विन्यास करना चाहिये। सभी ग्रामों के
नाभि (केन्द्र-स्थल) को बुद्धिमान व्यक्ति को विद्ध नहीं करना चाहिये।।५४।।
ग्रामे वाऽथ गृहे वा दण्डच्छेदोऽपि नैव कर्तव्यः।
सकलाद्यासनकान्तं विन्यासार्थं पदं बुधैर्ग्राह्यम् ॥५५॥
ग्राम अथवा गृह में दण्डच्छेद नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान व्यक्ति को ग्राम