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सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 395 में से

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पृष्ठ 81

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ५७
बारह एवं सोलह ब्राह्मण (आवास) की दृष्टि से क्षुद्रक ग्राम के दस भेद होते
हैं। यदि ऐसा न हो तो एक से दस ब्राह्मण को भूमि दान में देना चाहिये।।३०।।
एककुटुम्बिसमेतं कुटिकं स्यादेकभोगमिति कथितम् ।
तस्य सुखालयमिष्टं शेषाणां दण्डकादीनि ॥३१॥
जिस ग्राम में एक ब्राह्मण-परिवार रहता हो, उसे 'कुटिक' ग्राम तथा 'एकभोग'
ग्राम कहते हैं। वहाँ 'सुकालय' प्रशस्त होता है तथा 'दण्डक' आदि अन्य ग्रामों में
प्रशस्त होता है।।३१।।
युग्मायुग्मविभागैर्द्विविधं स्यात् सर्ववस्तुविन्यासम् ।
युग्मे सूत्रपथं स्यादसमे पदमध्यमे च वीथी स्यात् ॥३२॥
अन्योन्यसङ्करश्चेदशुभं स्यात् सर्वजन्तूनाम् ।
सभी प्रकार के वास्तु-विन्यास दो विभागों—युग्म एवं अयुग्म (सम संख्या एवं
विषम संख्या) में रक्खे जाते हैं। युग्म वास्तुविन्यास में सूत्रपथ से मार्गविन्यास एवं
अयुग्म विन्यास में मध्यम पद से वीथी का विन्यास किया जाता है।।३२।।
✺ ग्रामनामानि ✺
दण्डकमपरं स्वस्तिकमित ऊर्ध्वं प्रस्तरं चैव ॥३३॥
पश्चात् प्रकीर्णकं स्यान्नन्द्यावर्तं परागमथ पद्मम् ।
स्याच्छ्रीप्रतिष्ठितेनैवाष्टविधं ग्राममुद्दिष्टम् ॥३४॥
ग्रामों के नाम—ग्राम आठ प्रकार के होते हैं—दण्डक, स्वस्तिक, प्रस्तर,
प्रकीर्णक, नन्द्यावर्त, पराग, पद्म एवं श्रीप्रतिष्ठित।।३३-३४।।
✺ वीथिविधानम् ✺
सर्वेषां ग्रामाणां मङ्गलवीथ्यावृता बहिस्त्वबहिः ।
ब्रह्मस्थानं हृदितं तस्मिन् देवालयं तु वा पीठम् ॥३५॥
मार्ग-विधान—सभी ग्राम अन्दर एवं बाहर से मङ्गलवीथी से आवृत होते हैं।
ग्राम के ब्रह्मस्थान (मध्य भाग) में देवालय या पीठ (देवों के निमित्त बना चबूतरा)
होता है।।३५।।
एकद्वित्रिचतुर्भिः पञ्चभिरपि कार्मुकैश्च मार्गततिः ।
प्राक्प्रत्यग्गतमार्गा ऋतुदण्डमहापथाख्यास्ते ॥३६॥
मार्गों की चौड़ाई एक, दो, तीन, चार या पाँच कार्मुक (दण्ड) होती है; किन्तु
पूर्व से पश्चिम जाने वाले 'महापथ' संज्ञक मार्ग छः दण्ड चौड़े होते हैं।।३६।।