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सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 395 में से

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पृष्ठ 66

४२ मयमतम्
ब्रह्मा मध्ये स्थितः शम्भुस्तन्मुखस्थाश्चतुःसुराः ।
आर्यो विवस्वान् मित्रश्च भूधरश्चैव कीर्तिताः ॥४०॥
मध्य में स्थित ब्रह्मा शम्भु हैं तथा आर्य, विवस्वान्, मित्र एवं भूधर—ये चार
देवता उनकी ओर मुख करके स्थित होते हैं॥४०॥
चरकी च विदारी च पूतना पापराक्षसी ।
ईशानादि बहिः स्थाप्याश्चतुष्कोणे स्त्रियः स्मृताः ।
नपदा बलिभोक्तारः शेषाणां पदमुच्यते ॥४१॥
ईशान आदि चारो कोणों के बाहर क्रमशः चार स्त्री-देवताओं—चरकी, विदारी,
पूतना एवं पापराक्षसी की स्थापना होनी चाहिये। ये चारो विना पद के ही बलि (वास्तु
के निमित्त हविष् ) ग्रहण करती हैं। शेष देवों का पद कहा गया है॥४१॥
विंशत्सूत्रैः सन्धिभिः सप्तवेदैः
षट्षट्संख्याभिश्चतुष्कैश्र षट्कैः ।
अर्कैः शूलैर्वेदसंख्याः सिराभिः
संयुक्तं स्यादष्टकेनैकमेतत् ॥४२॥
इस प्रकार इकयासी संख्याओं का एक पद वास्तुचक्र में मण्डलदेवताओं का होता
है, जिसका विवरण अग्रलिखित है—२० + ७ + ६ + ६ + ६ + ६ + ६ + १२ + ४ +
८ = ८१ अर्थात् खड़ी और पड़ी दश-दश रेखायें होने से इकयासी पद का वास्तुचक्र
सम्पन्न होता है॥४२॥
❋ मण्डूकपदम् ❋
चतुःषष्टिपदे मध्ये ब्रह्मणश्च चतुष्पदम् ॥४३॥
चौंसठ पद वाले मण्डूक पद में मध्य के चार पद में ब्रह्मा होते हैं॥४३॥
आर्यकादिचतुर्देवाः प्रागादित्रित्रिभागिनः ।
आपाद्यष्टामराः कोणेष्वर्धार्धपदभागिनः ॥४४॥
(ब्रह्मा के पश्चात् उनके चारो ओर ) आर्यक आदि चार देवता ( आर्य, विवस्वान्,
मित्र, भूधर ) पूर्व से आरम्भ होकर तीन-तीन पद में स्थित होते हैं। आप आदि आठ
देवता ( आप, आपवत्स, सविन्द्र, साविन्द्र, इन्द्र, इन्द्रराज, रुद्र एवं रुद्रजय ) ब्रह्मा
के चारो कोणों में आधे-आधे पद में प्रतिष्ठित होते हैं॥४४॥
महेन्द्रराक्षसाद्याश्च पुष्पभल्लाटकादयः ।
दिशि दिश्यथ चत्वारो देवा द्विपदभोगिनः ॥४५॥