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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 395 में से

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पृष्ठ 64

४० मयमतम्
भृङ्ग, पितृ, सुग्रीव, वरुण, शोष, मारुत, मुख्य, सोम एवं अदिति बाह्य पदों के
देवता कहे गये हैं।।२६।।
आपवत्सार्यसावित्रा विवस्वानिन्द्रमित्रकौ ।
रुद्रजो भूधरश्चान्तर्मध्ये ब्रह्मा स्थितः प्रभुः ॥२७॥
अन्दर के पदों के देवता आपवत्स, आर्य, सावित्र, विवस्वान्, इन्द्र, मित्र, रुद्रज
एवं भूधर हैं। केन्द्र में ब्रह्मा स्थित होते हैं, जो सबके स्वामी कहे गये हैं।।२७।।
✺ उपपीठादि ✺
तत्पार्श्वयोर्द्वयोरेकभागेनैकेन वर्धनात् ।
उपपीठं भवेदत्र देवतास्ताः पदे स्थिताः ॥२८॥
उपपीठ वास्तु-विन्यास में वे ( पूर्वोक्त ) देवता अपने पदों के अतिरिक्त अपने
दोनों पाश्र्वों में एक-एक पद की वृद्धि प्राप्त करते हुये स्थित होते हैं।।२८।।
तत्तत्पार्श्वद्वयोश्चैवमेकैकांशविवर्धनात् ।
इन्द्रकान्तपदं यावत्तावद्युञ्जीत बुद्धिमान् ॥२९॥
बुद्धिमान् ( स्थपति ) को चाहिये कि उन देवों के दोनों पाश्र्वों में एक-एक पद की
वृद्धि तब तक करे, जब तक इन्द्रकान्त पद न बन जाय।।२९।।
समानि यानि भागानि चतुःषष्ठिदाचरेत् ।
असमान्यपि सर्वाणि चैकाशीतिपदोक्तवत् ॥३०॥
जिन वास्तु-विन्यासों में सम संख्या में पद हों, उन्हें चौंसठ पद वाले वास्तु के
समान एवं विषम संख्या में पद हों तो इक्यासी पद वाले वास्तु के समान ( देवों को )
रखना चाहिये।।३०।।
पदानामपि सर्वेषां मण्डूकं चापि तत्परम् ।
चण्डितं सर्ववस्तूनामाह्रत्यं च यतस्ततः ॥३१॥
सभी वास्तु-विन्यासों में मण्डूकसंज्ञक वास्तुपद-विन्यास सभी निर्माण-कार्यों के
लिये उपयुक्त होता है; क्योंकि यह ( तान्त्रिक ) विधि पर आधारित होता है।।३१।।
तस्मात् संक्षिप्य तन्त्रेभ्यो वक्ष्येऽहमपि तद् द्वयम् ।
चतुःषष्टिपदे चैकाशीतौ सकलनिष्कले ॥३२॥
इसलिये मैं ( मय ऋषि ) तन्त्रों से संक्षेप में विषय ग्रहण कर सकल एवं निष्कल
चौंसठ एवं इक्यासी दो पदविन्यासों का वर्णन करता हूँ।।३२।।
सूत्रे च पदमध्ये च ब्रह्माद्याः स्थापिताः सुराः ।
प्रागुदग्दिक्समारभ्यैवोच्यन्ते देवताः पृथक् ॥३३॥