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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 395 में से

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पृष्ठ 56

३२ मयमतम्
इसका निर्माण ताल, केतक के रेशे, कपास, कुश अथवा न्यग्रोध ( बरगद ) के छाल
से होना चाहिये ।।१४।।
अङ्गुलाग्रसमस्थूला त्रिवर्तिर्ग्रन्थिवर्जिता ।
देवद्विजमहीपानां शेषयोश्च द्विवर्तिका ॥१५॥
देवता, ब्राह्मण एवं राजा ( क्षत्रिय ) के वास्तु-मापन के लिये रज्जु को अङ्गुल
के अग्र भाग के बराबर मोटा, तीन बत्तियों से निर्मित एवं विना गाँठ का बनाना चाहिये।
वैश्य एवं शूद्र के लिये रज्जु दो बत्तियों से बँटा होना चाहिये।।१५।।
✵ खातशङ्कुलक्षणम् ✵
खदिरः खादिरश्चैव मधूकः क्षीरिणी तथा।
खातशङ्कुद्रुमाः प्रोक्ता अन्यं वा सारदारुजम् ॥१६॥
गड्ढे में गाड़े जाने वाले शङ्कु का लक्षण—गड्ढे में गाड़े जाने वाले शङ्कु जिन
वृक्षों के काष्ठ से बनते हैं, उनके नाम हैं—खदिर, खादिर, महुआ, क्षीरिणी तथा अन्य
कठोर काष्ठ वाले वृक्ष।।१६।।
एकादशाङ्गुलाद्येकविंशन्मात्रं तु दैर्घ्यतः ।
पूर्णमुष्टिस्तु नाहं स्यान्मूलं सूचीनिभं भवेत् ॥१७॥
इसकी लम्बाई ग्यारह अङ्गुल से लेकर इक्कीस अङ्गुल तक होनी चाहिये एवं
व्यास एक मुट्ठी होना चाहिये। इसका मूल सूई की भाँति नुकीला होना चाहिये।।१७।।
गृहीत्वा वामहस्तेन प्राङ्मुखो वाप्युदङ्मुखः ।
दक्षिणेनाष्ठीलं गृह्य ताडयेदष्टभिः क्रमात् ॥१८॥
प्रहारैः स्थपतिः प्राज्ञस्तत् कुर्यात् स्थापकाज्ञया ।
स्थपति पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके स्थापक की आज्ञा से बाँयें हाथ में
खातशङ्कु लेकर एवं दाहिने हाथ में हथौड़ा लेकर क्रमशः आठ बार शङ्कु पर प्रहार
करे।१८।।
✵ सूत्रविन्यासम् ✵
प्रमाणसूत्रमित्युक्तं प्रमाणैर्निश्चितं हि यत् ॥१९॥
सूत्र को भूमि पर फैलाना—चूँकि इस सूत्र से भवन-निर्माणसम्बन्धी कार्य में
प्रमाण या माप निश्चित किया जाता है; अतः इसे 'प्रमाणसूत्र' कहा जाता है।।१९।।
तद्बहिः परितो भागे सूत्रं पर्यन्तमिष्यते ।
गर्भसूत्रादिविन्याससूत्रं देवपदोचितम् ॥२०॥