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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २९१
अष्टाद्याः परिवारा मध्यान्तर्हारयोरुदिताः ।
प्रत्यग्दिङ्मुखहर्म्ये मित्रे वृषभस्थितिः प्रोक्ता ॥५४॥
वास्तु-विन्यास सम पदों का हो अथवा विषम पदों का हो, परिवार-देवता प्राकार
की भित्ति पर निर्मित होने चाहिये। उससे पृथक् होने की स्थिति में मध्य पद के पास
होने चाहिये। जहाँ तीन अथवा पाँच प्राकार हों, वहाँ प्रारम्भिक आठ देवता मध्याहार
या अन्ताहार पर निर्मित होने चाहिये। यदि देवालय पश्चिम-मुख हो तो मित्र के पद
पर वृषभ की स्थिति होनी चाहिये॥५३-५४॥
कमलजगुहहरयस्ते भूधरभागार्ययोर्विवस्वति च ।
यन्मुखमीश्वरभवनं तन्मुखमेवोदितं तेषाम् ॥५५॥
शिष्टा हर्म्याभिमुखाः पूर्वोक्तपदे निधातव्याः ।
कमलज, गुह एवं हरि को भूधर, आर्य एवं विवस्वान् के पद पर होना चाहिये।
जिस दिशा में ईश्वर के भवन का मुख हो, उसी दिशा में उनका भी मुख होना चाहिये।
शेष देवों को पूर्ववर्णित पदों पर होना चाहिये एवं उनका मुख देवालय की ओर होना
चाहिये॥५५॥
प्राक्प्रत्यङ्मुखमुक्षा देवाभिमुखो न वाऽभिमुखः ॥५६॥
अवागुत्तरदिशि मुखिनौ चण्डेशेभाननौ च मतौ ।
प्रासादमण्डपसभाशालाकाराणि कार्याणि ॥५७॥
परिवारविमानानि सर्वाण्यङ्गानि युक्तिवशात् ।
देवालय का मुख चाहे पूर्व दिशा में हो, चाहे पश्चिम में हो, वृष का मुख अथवा
पृष्ठभाग शिव की ओर होना चाहिये। चण्डेश एवं गजानन का मुख क्रमशः दक्षिण
एवं उत्तर की ओर होना चाहिये। देव-परिवार के भवन सभी अङ्गों से युक्त, उचित रीति
से प्रासाद, मण्डप, सभा अथवा शाला के आकार का निर्मित करना चाहिये।
✺ मालिकापङ्क्तिः ✺
मध्यान्तर्हारयोरेव मालिकापङ्क्तिरिष्यते ॥५८॥
एकद्वित्रिचतुर्भूमिर्युक्ता वा पञ्चभूमिका ।
भित्तेरुपरि भित्तिः स्यात् पादः पादोपरि स्मृतः ॥५९॥
भित्तेरुपरि पादो वा पादोपरि न भित्तिका ।
कूटकोष्ठादियुक्ता वा जालभित्तिरलङ्कृता ॥६०॥
मण्डपाकृतियुक्ता वा शालाकारसभान्विता ।