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सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 395 में से

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पृष्ठ 287

एकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २६३
हस्तव्यासं द्विदण्डं तत्पादव्यासं तु बाहलम्।
हस्ते यथाबलं योज्यं प्रविशेत् स्थितशायिनोः ॥९३॥
हस्त की चौड़ाई दो दण्ड एवं मोटाई उसकी चतुर्थांश होनी चाहिये। स्थित
( खड़ी स्थिति ) एवं शायिन ( लेटी स्थिति ) वाले फलकों को हस्त में दृढ़तापूर्वक
बैठाना चाहिये। ( हस्त सीढ़ी के पार्श्व का एक अङ्ग है ) ॥९३॥
अयुग्ममेव सोपानं गुह्यागुह्यवशात्ततः।
एकभक्तिविनिष्क्रान्तं मण्डपादिषु बाह्यतः ॥९४॥
सोपानों की संख्या विषम होनी चाहिये। ये गुप्त ( भित्ति आदि में छिपी ) या प्रकट
हो सकती हैं। मण्डप आदि में बाहर की ओर एक भित्ति ( सीढ़ी का एक विशेष भाग )
निकली होनी चाहिये ॥९४॥
सोपानं सर्ववर्णानां प्रादक्षिण्याधिरोहणम्।
प्रशस्तं विपरीतं तद् विनाशाय भवेदिह ॥९५॥
सभी वर्ण वाले व्यक्तियों के भवन में सीढ़ी दक्षिण ( दाहिनी ) की ओर घूमनी
चाहिये। यह शुभ होता है। इसके विपरीत ( बाँयीं ओर मुड़ना ) विनाशकारक होता
है॥९५॥
अधिष्ठानाधिरोहार्थं सोपानं पार्श्वयोर्मुखम्।
हस्तिहस्तं चाश्वपादफलकान्तं प्रयोजयेत् ॥९६॥
अधिष्ठान पर चढ़ने के लिये निर्मित सोपान मुख एवं दोनों पार्श्वों की ओर होना
चाहिये। हस्तिहस्त ( सीढ़ी का एक भाग, सम्भवतः रेलिङ्ग ) का निर्माण अश्वपाद से
लेकर फलक ( ऊपरी फलक ) तक होना चाहिये ॥९६॥
सोपानं तदधिष्ठानस्तम्भप्रस्तरवद् भवेत्।
एवं विधिविशिष्टं तु सोपानं सम्पदां पदम् ॥९७॥
अधिष्ठान का सोपान उसके स्तम्भ-प्रस्तर के बराबर ( ऊँचा ) होना चाहिये। इस
विधि से निर्मित सोपान सम्पत्ति-कारक होता है ॥९७॥
एवं प्रोक्तं दैवतानां नराणां वासे योग्यं तोरणं चैव युक्त्या।
सोपानं तद्भेदमाकारमस्मिन् सम्यग् योज्यं वास्तुविद्याविधिज्ञैः ॥९८॥
इस प्रकार देवालय एवं मनुष्यों के आवास के अनुरूप तोरण एवं सोपान के भेद
एवं आकार का वर्णन किया गया। वास्तु-विद्या के ज्ञाता को भवन के अनुसार उचित
रीति से इनकी योजना बनानी चाहिये ॥९८॥