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सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 395 में से

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. एकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २५७
ऊर्ध्वभूमौ रसांशे तु भागं सौष्ठिकविस्तृतम् ॥५४॥
कोष्ठकं द्विगुणायामं हारा भागेन योजयेत्।
तदूर्ध्वे तु चतुर्भागं द्विभागं मध्यनिर्गमम् ॥५५॥
ऊपरी तल के छः भाग होने चाहिये। सौष्ठिक की चौड़ाई एक भाग होनी चाहिये।
कोष्ठक की लम्बाई दुगुनी होनी चाहिये एवं हारा एक भाग से होनी चाहिये। उसके
ऊपर के तल का चार भाग करना चाहिये एवं दो भाग से मध्य-निर्गम निर्मित करना
चाहिये॥५४-५५॥
दण्डं वाऽध्यर्धदण्डं वा द्विदण्डं वा विशेषतः।
चतुरस्रमधिष्ठानं तद्वत् कन्धरमस्तकम् ॥५६॥
इसका माप एक दण्ड, डेढ़ दण्ड या दो दण्ड होना चाहिये। अधिष्ठान चौकोर
होना चाहिये एवं इसी प्रकार कन्धर (गल) तथा शीर्ष होना चाहिये॥५६॥
अष्टकूटं तथा नीडं कोष्ठकं तु तथैव च।
लम्बनीडमुपर्यष्टौ वर्षस्थलसमन्वितम् ॥५७॥
कूटों की संख्या आठ हो एवं इसी प्रकार नीड एवं कोष्ठक भी होना चाहिये।
ऊर्ध्व भाग में वर्षस्थल (जल का स्थान) से युक्त आठ लम्बनीड का निर्माण करना
चाहिये॥५७॥
नासिका स्वस्तिकाकारा सर्वत्र परिशोभिता।
नानामसूरकस्तम्भवेदीजालकतोरणम् ॥५८॥
स्वस्तिक के आकार की नासिका सभी स्थलों पर सुशोभित होती है। विभिन्न
प्रकार के मसूरक (अधिष्ठान), स्तम्भ, वेदी, जालक (झरोखा) एवं तोरण इस
भवन के अनुकूल होते हैं॥५८॥
उन्नतौ कूटकोष्ठौ चेदन्तरप्रस्तरन्वितौ।
एतद् गान्धारमित्युक्तमष्टास्रं वा गलं शिरः ॥५९॥
यदि कूट एवं कोष्ठ ऊँचे एवं अन्तर-प्रस्तर (आधार-वेदिका) से युक्त हों, गल
एवं शिर अष्टकोण हों तो ऐसे देवालय को 'गान्धार' कहते हैं॥५९॥
☸ श्रीभोगम् ☸
तदेव वर्तुलं वेदी कन्धरं शिखरं भवेत्।
शेषं पूर्ववदुद्दिष्टं नाम्ना श्रीभोगमिष्यते ॥६०॥
यदि वेदी, कन्धर एवं शिखर गोलाकार हों तथा अन्य अङ्ग पूर्व-वर्णित विधि के
मय०-१७