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सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 395 में से

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पृष्ठ 279

एकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २५५
तेरह हाथ की चौड़ाई को नौ भागों में बाँटना चाहिये। गर्भगृह को तीन भाग से
एवं गृहपिण्डी ( भित्ति ) एक भाग से बनानी चाहिये। अन्धार ( अलिन्द, बरामदा ) को
एक भाग से तथा एक भाग से उसके चारो ओर अन्धारिका ( अलिन्द के बाहर की
दीवार ) बनानी चाहिये।।४०-४१।।
अंशेन सौष्ठिकं कोष्ठं विस्तारं त्रिगुणायतम् ।
अर्धेन नीडविस्तारं शेषं हाराङ्गमिष्यते ॥४२॥
एक भाग से सौष्ठिक एवं कोष्ठ का विस्तार रखना चाहिये। इसकी लम्बाई
चौड़ाई से तीन भाग अधिक होनी चाहिये। आधे भाग से नीड का विस्तार तथा शेष
भाग से हारामार्ग निर्मित होना चाहिये।।४२।।
कोष्ठमध्ये त्रिदण्डेन नासी निर्गमनान्विता ।
उपर्यपि षडंशेऽंशं कूटं तद्द्विगुणायतम् ॥४३॥
कोष्ठकं भागत्तो हारा पञ्जरैरन्विता भवेत् ।
ऊर्ध्वभागं त्रिभागेन मध्ये दण्डेन निर्गमम् ॥४४॥
कोष्ठ के मध्य में तीन दण्ड के प्रमाण से निर्गमन ( बाहर की ओर निकला भाग )
से युक्त नासी होनी चाहिये। ऊपरी तल के छः भाग करने चाहिये। उसके एक भाग
से कूट निर्मित करना चाहिये। कोष्ठक की लम्बाई दुगुनी होनी चाहिये। एक भाग से
पञ्जर से युक्त हारा होनी चाहिये। उसके ऊपरी भाग ( तल ) के तीन भाग करने
चाहिये। मध्य भाग में एक दण्ड का निर्गम होना चाहिये।।४३-४४।।
चतुरस्रमधिष्ठानं वस्वस्रं गलमस्तकम् ।
आदौ तले चतुष्कर्णे कूटं वेदास्रमस्तकम् ॥४५॥
यदि अधिष्ठान चौकोर हो तो गल तथा शिखर अष्टकोण होना चाहिये। प्रथम तल
के चारो कोनों पर कूट होना चाहिये एवं शिरोभाग चौकोर होना चाहिये।।४५।।
अष्टास्रमूर्ध्वभूमौ तु सौष्ठिकानां तु मस्तकम् ।
अष्टकूटं तथा नीडं कोष्ठकं तु तथैव हि ॥४६॥
ऊपरी तल पर सौष्ठिकों ( कोष्ठों ) का शीर्ष अष्टकोण होना चाहिये। इसी प्रकार
आठ कूट, नीड एवं कोष्ठक होना चाहिये।।४६।।
क्षुद्रनीडं तथाप्यष्टावष्टौ स्युर्गलनासिकाः ।
स्वस्तिकाकारसंयुक्तं नासिकाभूषणं भवेत् ॥४७॥
भद्रकोष्ठमिदं नाम्ना यथार्थं परिकीर्तितम् ।