मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशोऽध्यायः 卐 त्रिभूमिविधानम् २४९
उसके ऊपरी तल ( तृतीय तल ) के मध्य भाग में भद्र का निर्माण होना चाहिये।
बुद्धिमान् ( स्थपति ) को भद्र का माप एक दण्ड, डेढ़ दण्ड या दो दण्ड रखना
चाहिये।।५।।
विमानोच्चे विशेषेण चतुर्विंशतिभाजिते ।
पाशगङ्गाश्विनीभिस्तु सत्रिपादगुणांशकैः ॥६॥
सार्धांशैः सार्धबन्धांशैः सपादांशार्धकांशकैः ।
सार्धत्रिभिस्तु भागेन योजयेत्तु विचक्षणः ॥७॥
धरातलमधः स्तम्भमञ्चमङ्घ्रिकमञ्चकम् ।
तलिपं प्रस्तरं वेदीकन्धरं शिखरं घटम् ॥८॥
देवालय की सम्पूर्ण ऊँचाई को चौबीस भागों में विभक्त करना चाहिये। तीन भाग
से धरातल ( अधिष्ठान ), चार भाग से अधःस्तम्भ ( प्रथम तल की ऊँचाई ), दो भाग
से मञ्च, पौने चार भाग से ( द्वितीय तल का ) अङ्घ्रिक ( स्तम्भ ), डेढ़ भाग से
मञ्चक, साढ़े तीन भाग से तलिप ( तृतीय मंजिल का स्तम्भ अथवा ऊँचाई ), सवा
भाग से प्रस्तर, आधे भाग से वेदी एवं गल, साढ़े तीन भाग से शिखर एवं एक भाग
से घट का निर्माण करना चाहिये ।।६-८।।
कूटं नीडं कोष्ठकं चाष्टकं तद्वेदास्त्राभं जन्मतः स्तूपिकान्तम् ।
ऊर्ध्वे भूमावल्पनीडं द्विरष्टाविष्टं ह्यस्मिन् षण्णवत्यल्पनासम् ॥९॥
नानाधिष्ठानाङ्घ्रिवेदीयादियोगं मूर्ध्न्यष्टाधं तथादभ्रनासम् ।
कोष्ठं कूटादुन्नतं चेत्समं च शम्भोर्वासं स्वस्तिकं तत्रिभौमम् ॥१०॥
देवालय में आठ कूट ( कोण के कोष्ठ ), आठ नीड ( कूट एवं कोष्ठ के मध्य
के कोष्ठ ) एवं आठ कोष्ठक ( मध्य कोष्ठ ) होना चाहिये। इन्हें जन्म ( प्रारम्भ ) से
स्तूपिकापर्यन्त चौकोर बनाना चाहिये। ऊपरी तल पर सोलह अल्पनीड ( छोटे कोष्ठ )
एवं छियानबे अल्पनास का निर्माण करना चाहिये। अधिष्ठान, स्तम्भ एवं वेदिका
आदि की आकृति विभिन्न प्रकार की हो सकती है। शीर्षभाग पर आठ अभ्रनास
( सजावटी खिड़कियाँ ) होती हैं। कोष्ठ कूट से उन्नत हों एवं आपस में समान ऊँचाई
के हों, तो वह देवालय शम्भु का वास होता है एवं यह तीन तल का देवालय
‘स्वस्तिक’ संज्ञक होता है।।९-१०।।
❋ विमलाकृतिकम् ❋
तारे सप्तनवांशे तु भागं सौष्ठिकविस्तृतम् ।
शालाभागं तथा द्व्यंशं हाराभागेन कल्पयेत् ॥११॥