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सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 395 में से

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विंशोऽध्यायः 卐 द्विभूमिविधानम् २४३
अल्प-पञ्जर नीचे हों, बहत्तर अल्प-नासिक हों तथा विभिन्न अलङ्करणों से युक्त हों तो
उस देवालय को 'कल्याण' कहते हैं।।१८-१९।।
तदेव शिखरे चार्थकोष्ठकं रहितं तु चेत्।
चतुर्नीडासमायुक्तमेतत् पाञ्चालमिष्यते ॥२०॥
यदि देवालय के शिखरभाग पर अर्धकोष्ठ न हों तथा वहाँ चार नीडा ( सजावटी
खिड़की की आकृतिविशेष ) निर्मित हों तो उसे 'पाञ्चाल' कहते हैं।।२०।।
तदेवाष्टास्रकं वेदीकन्धरं शिखरं घटम्।
शिखरेऽष्टमहानासि नाम्नैतद् विष्णुकान्तकम् ॥२१॥
यदि देवालय की वेदी, कन्धर, शिखर एवं घट अष्ट-कोण हों तथा शिखर पर
आठ महानासी निर्मित हों, तो उसकी संज्ञा 'विष्णुकान्त' होती है।।२१।।
तदेव कूटशालानामन्तरप्रस्तरं विना।
तच्चतुर्भागमाधिक्यमायतं चतुरस्रकम् ॥२२॥
आयतास्रं तथा वेदीकन्धरं शिखरं भवेत्।
स्थूपीत्रयसमायुक्तमेतन्नाम्ना सुमङ्गलम् ॥२३॥
यदि देवालय कूट, शाला ( मध्य कोष्ठ ) एवं अन्तर-प्रस्तर से रहित हो, चार
भुजाओं वाला हो तथा लम्बाई चौड़ाई से चतुर्थांश अधिक हो, वेदी, कन्धर एवं शिखर
आयताकार हों एवं तीन स्तूपियाँ हों तो उसका नाम 'सुमङ्गल' होता है।।२२-२३।।
तदेवायतवृत्तं चेद् वेदिकाकन्धरं शिरः।
सर्वावयवसंयुक्तमेतद् गान्धारमिष्यते ॥२४॥
यदि देवालय की वेदिका, गल एवं शिरोभाग वृत्तायत ( लम्बाई लिये वृत्ताकार )
हों तथा सभी अङ्गों से भवन युक्त हो तो उसकी संज्ञा 'गान्धार' होती है।।२४।।
तारादर्धांशमाधिक्यमायतं चतुरस्रकम्।
द्व्यस्रवृत्तशिरोयुक्तं नेत्रशालामुखान्वितम् ॥२५॥
हस्तिपृष्ठमिदं द्व्यस्रं वृत्तं वापि मसूरकम्।
यदि देवालय आयताकार हो तथा लम्बाई चौड़ाई से आधा भाग अधिक हो,
शिरोभाग दो कोण से युक्त गोलाई लिये हो तथा मुखभाग ( सामने ) पर नेत्रशाला
( नेत्र की आकृति का प्रकोष्ठ ) हो तो उसे 'हस्तिपृष्ठ' कहते हैं। इसका अधिष्ठान
दो कोण से युक्त गोलाकार भी हो सकता है।।२५।।
चतुरस्रमधिष्ठानं वृत्तं स्याद् गर्भगृहकम् ॥२६॥