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सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 395 में से

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पृष्ठ 264

अथ विंशोऽध्यायः
( द्विभूमिविधानम् )
द्वितलं पञ्चधा मानं वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात्।
पञ्चषड्ढस्तमारभ्य द्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥१॥
सैकार्कमनुहस्तान्तमुत्सेधं पूर्ववद् भवेत्।
तारे सप्तर्तुभागे तु भागं सौष्ठिकविस्तृतम् ॥२॥
( मन्दिर के ) दूसरे तल के पाँच प्रकार के प्रमाण को क्रमशः संक्षेप में कहता
हूँ। पाँच-छः हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ की वृद्धि से तेरह या चौदह हाथपर्यन्त
उसकी ऊँचाई पूर्व-वर्णित नियम के अनुसार होनी चाहिये। ( निचले तल के ) विस्तार
के छः या सात भाग करने चाहिये। उसके एक भाग को सौष्ठिक ( कर्णकूट ) के लिये
ग्रहण करना चाहिये॥१-२॥
कोष्ठं तु द्विगुणायामं शेषं हारं सपञ्जरम्।
विमानोत्सेधं विभजेदष्टाविंशतिसङ्ख्यया ॥३॥
कोष्ठ ( मन्दिर के मध्य भाग का कूट ) की लम्बाई के लिये दो या तीन भाग
का प्रमाण एवं शेष भाग में हार ( गलियारा ) एवं पञ्जर ( अलङ्करणविशेष ) होना
चाहिये। विमान ( देवालय ) की ऊँचाई को अट्ठाईस भागों में बाँटना चाहिये॥३॥
ईशद्गृतुबन्धांशैर्भूतनेत्रशिवांशकैः ।
नेत्रसार्धचतुर्भागैरध्यर्धेन यथाक्रमम् ॥४॥
मसूरकाङ्घ्रिकं मञ्चाङ्घ्रिमञ्चवितर्दिकम्।
कन्धरं शिखरं कुम्भं मूलतः परिकल्पयेत् ॥५॥
( उपर्युक्त अट्ठाईस भाग में ) तीन भाग मसूरक ( अधिष्ठान ), छः भाग अङ्घ्रि
( भूतल ), तीन भाग मञ्च, पाँच भाग अंघ्रि ( तल ), दो भाग मञ्च, एक भाग वितर्दिक
( वेदिका ), दो भाग कन्धर, साढ़े चार भाग शिखर एवं डेढ़ भाग कुम्भ के लिये होता
हैं। यह परिकल्पना मूल से ( शिखरपर्यन्त ) की गई है॥४-५॥
❋ स्वस्तिकम् ❋
चतुरस्रमधिष्ठानं तद्वत् कन्धरमस्तकम्।
चतुष्कूटसमायुक्तं चतुष्कोष्ठसमन्वितम् ॥६॥