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सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 395 में से

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पृष्ठ 139

द्वादशोऽध्यायः 卐 गर्भविन्यासः ११५
नाट्य-गृह का गर्भविन्यास कुटिकामुख या मण्डितस्तम्भ के मूल में अथवा दोनों
स्थानों पर करना चाहिये।।९१।।
आतोद्यानि च सर्वाणि सर्वलोहमयानि च।
श्रीवत्सं पङ्कजं पूर्णकुम्भं हेमजमिष्यते ॥९२॥
नाट्य-गृह के गर्भ-विन्यास में सभी प्रकार के धातुओं से निर्मित सभी वाद्य-यन्त्र
रखना चाहिये। श्रीवत्स, कमल तथा पूर्ण कुम्भ सोने से निर्मित होना चाहिये।।९२।।
हेमगर्भसभागर्भो द्वारस्तम्भे विधीयते ।
पूर्वोक्ते कर्णपादे वा गर्भस्थानं तु तस्य वै ॥९३॥
सभागार के गर्भ-स्थापन में ( पूर्वोक्त ) सुवर्ण-निर्मित पदार्थों को रखना चाहिये।
गर्भ-स्थापन सभागार के द्वार अथवा स्तम्भ के नीचे अथवा कोण में स्थित स्तम्भ के
मूल में करना चाहिये।।९३।।
तुलाभाराभिषेकार्थं मण्डपे वाऽथ तद् भवेत् ।
पाषण्ड्याश्रमिणां वासे तत्तच्चिह्नं तु गर्भकम् ॥९४॥
उपर्युक्त हेम-गर्भ का स्थापन तुलाभार एवं अभिषेक मण्डप ( राजभवन के
विशिष्ट अवसरों पर प्रयोग होने वाले मण्डप ) में भी होता है। पाखण्डी ( विधर्मी )
लोगों के आवास में उनके चिह्नों को भवन के गर्भ में स्थापित करना चाहिये।।९४।।
जात्यन्तराणां सर्वेषां तत्तच्चिह्नं प्रयोजयेत् ।
गृहिणी गर्भिणी कर्तुर्यदि गर्भं न निक्षिपेत् ॥९५॥
( चारो वर्णों से पृथक् ) अन्य जाति वालों के आवास में उनके विशिष्ट चिह्नों
को भवन-गर्भ में स्थापित करना चाहिये। यदि भवन के स्वामी की पत्नी गर्भवती हो
तो उसे भवनगर्भ का स्थापन नहीं करना चाहिये।।९५।।
रत्नानि धातवश्चैव स्वल्पविस्तारभाजने ।
तद्दैवस्थानभावज्ञैर्न्यस्तव्यानीह तानि वै ॥९६॥
छोटे पात्र ( गर्भ में स्थापित होने वाली मञ्जूषा ) में वास्तु-देवों के स्थानों के ज्ञाता
को देवों के अनुरूप रत्न एवं धातुओं को यथोचित विधि से रखना चाहिये।।९६।।
द्वारप्रदक्षिणे स्थाने स्वामिस्थानस्य दक्षिणे ।
अभ्यन्तरमुखं गर्भं वस्तुमध्यं बहिर्मुखम् ॥९७॥
पात्र को द्वार के दक्षिण भाग में या गृहस्वामी के कक्ष के दाहिने भाग में स्थापित
करना चाहिये। ( सामान्यतया ) इस पात्र का मुख भवन के भीतरी भाग की ओर होना