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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 395 में से

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पृष्ठ 134

११० मयमतम्
अश्वत्थं करकं सिंहं छत्रं स्वर्णेन कारयेत् ।
अश्वत्थः पुरतः स्थाप्यश्छत्रं तस्योपरि स्थितम् ॥५९॥
कुण्डिकापरभागे तु केसरी दक्षिणे भवेत् ।
सौगते धामके गर्भं श्रीवत्साशोकसिंहकम् ॥६०॥
सुगत के भवन के गर्भन्यास के लिये सोने के पीपल, करक ( कमण्डलु ), सिंह
एवं छत्र निर्मित कराना चाहिये। सामने के भाग में अश्वत्थ ( पीपल ) स्थापित करना
चाहिये एवं उसके ऊपर छत्र स्थापित करना चाहिये। वाम भाग में कुण्डिका
( कमण्डलु ) एवं दाहिने भाग में केसरी ( सिंह ) तथा गर्भ में श्रीवत्स, अशोक एवं
सिंह स्थापित करना चाहिये॥५९-६०॥
कमण्डल्वक्षमाला च शिखिपिच्छं तु हेमजम् ।
त्रिच्छत्रं करकं तालवृन्तं रुक्ममयं भवेत् ॥६१॥
( श्रीवत्स, अशोक एवं सिंह के अतिरिक्त ) कमण्डलु, अक्षमाला एवं मोर का
पंख सुवर्णमय तथा त्रिच्छत्र, करक एवं तालवृन्त ( ताल का पंखा ) सोने से निर्मित
होना चाहिये॥६१॥
वृक्षस्तु पुरतः स्थाप्यश्छत्रं तस्योपरि स्थितम् ।
पिच्छं दक्षिणभागेऽक्षमाला वामे तु कुण्डिका ॥६२॥
( जिनमन्दिर में ) वृक्ष को सम्मुख, उसके ऊपर छत्र स्थापित करना चाहिये।
मोर-पंख को दाहिने भाग में एवं वामभाग में कुण्डिका ( कमण्डलु ) के साथ अक्षमाला
स्थापित करनी चाहिये॥६२॥
श्रीरूपं मध्यमे स्थाप्यं केसरीं तत्र विन्यसेत् ।
अपरे करकं तालवृन्तं गर्भो जिनालये ॥६३॥
जिन-मन्दिर में श्रीरूप को गर्भ के मध्य में स्थापित करना चाहिये एवं सिंह को
भी वहीं स्थापित करना चाहिये। करक एवं तालवृन्त को उसके बायें स्थापित करना
चाहिये॥६३॥
शुकं चक्रं च हैमं तु सिंहं शङ्खं च राजतम् ।
मृगं ताम्रमयञ्चैव कृष्णलोहेन नन्दकम् ॥६४॥
एवं दुर्गाविमाने तु गर्भं कुर्याद् विचक्षणः ।
खट्वाङ्गं नन्दकं शक्तिं क्षेत्रपालस्य हेमजम् ॥६५॥
बुद्धिमान ( स्थपति ) को दुर्गा-मन्दिर के गर्भ-विन्यास में शुक एवं चक्र सुवर्ण-