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सर्वकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 395 में से

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८६ मयमतम्
तन्तुवायों ( जुलाहों ) का आवास होना चाहिये। उसके उत्तर में कुम्हारों का आवास
होना चाहिये और इनके समीप ही जात्यन्तरों ( छोटी जाति वालों ) का आवास होना
चाहिये।।७३-७४।।
शेषं प्रागिव सर्वं योग्यं तत्सर्वतोभद्रम्।
एवं षोडश भेदा ह्युदिताश्चाद्यैर्मुनीन्द्रैस्तु ।।७५।।
शेष सभी पूर्ववर्णित नियमों के अनुसार होना चाहिये। यह सर्वतोभद्र व्यवस्था
है। इस प्रकार प्राचीन मुनियों ने नगर के सोलह भेदों का वर्णन किया है।।७५।।
मार्गच्छेदं नेष्टं पदमध्ये चत्वरं न स्यात्।
शेषं युक्त्यानुक्तं सम्यग्योज्यं नृपेच्छया तज्ज्ञैः ।।७६।।
क्षुद्राणामपि चैषां मध्यानां चापि सर्वेषाम्।
नगर के मध्य पद में न तो मार्ग बाधित होना चाहिये तथा न ही वहाँ चौराहा होना
चाहिये। शेष की योजना राजा की इच्छानुसार मध्य में करनी चाहिये, जिनका यहाँ
वर्णन नहीं किया गया है।।७६।।
✺ अन्तरापणम् ✺
तत्र कुटुम्बावलिकं वक्ष्येऽहं चान्तरापणकम् ।।७७।।
हाट-योजना—अब मैं ( मय ) कुटुम्बावलिक ( परिवारों के आवास की पंक्ति )
तथा बाजारों का वर्णन करता हूँ।।७७।।
परितो रथपथयुक्तं मध्ये वणिजां गृहश्रेणी ।
तद्दक्षिणतः पार्श्वे गेहं स्यात्तन्तुवायानाम् ।।७८।।
बाजार के चारो ओर रथ के चलने योग्य मार्ग हों एवं मध्य में व्यापारियों के गृहों
की पङ्क्ति होनी चाहिये। उनके दक्षिण पार्श्व में जुलाहों के गृह होने चाहिये।।७८।।
उत्तरतस्तद्वासावलिकं स्याच्चक्रिकाणां तु।
कर्मोपजीविनां स्याद्वासं रथपथ्यनेकानाम् ।।७९।।
उत्तर भाग में कुम्हारों के भवन होने चाहिये। अन्य शिल्पियों के गृह भी रथमार्ग
से संयुक्त होने चाहिये।।७९।।
ब्रह्मावृतपथमेकं तत्रान्तरापणं कार्यम् ।
ताम्बूलादि फलञ्च प्रोक्तं सारान्वितं द्रव्यम् ।।८०।।
जो मार्ग ब्रह्म-पद को घेरता हो, उस पर पान, फल एवं सारयुक्त सामग्रियों का
हाट बनाना चाहिये।।८०।।