मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ मयमतम्
मार्ग की स्वस्तिक-योजना स्वस्तिक ग्राम के लिये कही गई है। इसमें छः मार्ग
पूर्व से एवं छः मार्ग उत्तर से निकलते हैं।।६०।।
प्रागिव मार्गोपेतं वीथिपदं स्वस्तिकं चैव ।
पूर्व-वर्णित मार्ग-योजना के अनुसार मार्गों की रचना स्वस्तिक होती है।
प्राचीनोदीचीनाश्चत्वारश्चैव मार्गाः स्युः ॥६१॥
ब्रह्मावृतपथमेकं कुट्टिममार्गास्त्रयः प्राच्याम् ।
एतद् भद्रकमुदितं नाम्ना नगरादिविन्यासम् ॥६२॥
पूर्व से एवं उत्तर से निकलने वाले मार्गों की संख्या चार होती है। एक मार्ग
ब्रह्मस्थान से निकलता है। तीन कुट्टिममार्ग पूर्व दिशा में होते हैं। इस मार्गयोजना को
भद्रक कहा जाता हैं। इस मार्गयोजना का प्रयोग नगरादि के विन्यास में किया जाता
है।।६१-६२।।
प्राङ्मुखमार्गाः पञ्चैवोत्तरमार्गास्तथैव स्युः ।
बहुकुट्टिमसंयुक्तं भद्रमुखं नाम वस्तु स्यात् ॥६३॥
पाँच मार्ग पूर्व दिशा से एवं पाँच मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं। बहुत से कुट्टिम
मार्ग निकलते हैं। इस मार्गयोजना को भद्रमुख कहते हैं।।६३।।
प्राचीनास्तु षडेवैवोत्तरवक्त्रास्तथा मार्गाः ।
यद् बहुकुट्टिमयुक्तं तद्वस्तु च भद्रकल्याणम् ॥६४॥
छः मार्ग पूर्व दिशा से एवं छः मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं तथा बहुत से
कुट्टिम मार्ग होते हैं, तो उसे भद्रकल्याण मार्गयोजना कहते हैं।।६४।।
पूर्वापरमुखमार्गाः सप्तैवोदङ्मुखाश्च तथा ।
शेषं प्रागिव सर्वं विन्यासं तन्महाभद्रम् ॥६५॥
पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाले सात मार्ग तथा उत्तर से (दक्षिण की ओर जाने
वाले) सात मार्ग हों तथा शेष योजना पूर्ववत् (बहुत से कुट्टिम मार्ग) हो तो उसे
महाभद्र मार्गयोजना कहते हैं।।६५।।
अष्टौ पूर्वमुखास्ते मार्गाश्चाष्टावुदग्वक्त्राः ।
द्वादशमार्गोपेतं बह्वर्गलकुट्टिमैर्युक्तम् ॥६६॥
यत्तद्वस्तुसुभद्रं नाम्ना विन्यासमुद्दिष्टम् ।
आठ मार्ग पूर्व दिशा से एवं आठ मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं। (इनके
अतिरिक्त) बारह मार्गों एवं बहुत से अर्गल कुट्टियों से (अर्गला के समान आपस में