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सर्वकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 805
* अध्याय १९१ *७९५

| भीमेश्वरं ततो गच्छेन्नारदेश्वरमुत्तमम्।<br>आदित्येशं महापुण्यं स्मृतं किल्बिषनाशनम्॥ ५<br>नन्दिकेशं परिष्वज्य पर्याप्तं जन्मनः फलम्।<br>वरुणेशं ततः पश्येत् स्वतन्त्रेश्वरमेव च।<br>सर्वतीर्थफलं तस्य पञ्चायतनदर्शनात्॥ ६<br>ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र युद्धं यत्र सुसाधितम्।<br>कोटितीर्थं तु विख्यातमसुरा यत्र मोहिताः॥ ७<br>यत्रैव निहता राजन् दानवा बलदर्पिताः।<br>तेषां शिरांस्यगृह्णन्त सर्वे देवाः समागताः॥ ८<br>तस्तु संस्थापितो देवः शूलपाणिर्वृषध्वजः।<br>कोटिर्विनिहता तत्र तेन कोटीश्वरः स्मृतः॥ ९<br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य सदेहः स्वर्गमारुहेत्।<br>यदा त्विन्द्रेण क्षुद्रत्वाद् वज्रं कीलेन यन्त्रितम्॥ १०<br>तदाप्रभृति लोकानां स्वर्गमार्गो निवारितः।<br>यः स्तुतं श्रीफलं दद्यात् कृत्वा चान्ते प्रदक्षिणाम्॥ ११<br>पार्वतं सहदीपं तु शिरसा चैव धारयेत्।<br>सर्वकामसुसम्पन्नो राजा भवति पाण्डव॥ १२<br>मृतो रुद्रत्वमाप्नोति ततोऽसौ जायते पुनः।<br>स्वर्गादेत्य भवेद् राजा राज्यं कृत्वा दिवं व्रजेत्॥ १३<br>बहुनेत्रं ततः पश्येत् त्रयोदश्यां तु मानवः।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ १४<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थं परमशोभनम्।<br>नराणां पापनाशाय ह्यगस्त्येश्वरमुत्तमम्॥ १५<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते।<br>कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी॥ १६<br>घृतेन स्नापयेद् देवं समाधिस्थो जितेन्द्रियः।<br>एकविंशकुलोपेतो न च्यवेद्वैश्रवात् पदात्॥ १७<br>धेनुमुपानहौ छत्रं दद्याच्च घृतकम्बलम्।<br>भोजनं चैव विप्राणां सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥ १८<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र बलाकेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सिंहासनपतिर्भवेत्॥ १९ | नहीं होता। इसके बाद श्रेष्ठ भीमेश्वर और नारदेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। आदित्येश तीर्थ महान् पुण्यशाली और पापका नाशक कहा गया है। नन्दिकेशका दर्शन करनेसे जन्म धारण करनेका पर्याप्त फल सुलभ हो जाता है। इसके बाद वरुणेश एवं स्वतन्त्रेश्वरका दर्शन करे। इस पञ्चायतनका दर्शन करनेसे सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। राजेन्द्र! इसके बाद कोटितीर्थ नामसे प्रसिद्ध स्थानमें जाना चाहिये। जहाँ युद्ध हुआ था और जहाँ असुरगण मोहित हुए थे, राजन्! जहाँ बलके घमंडमें चूर दानवगण मारे गये थे और आये हुए देवगणोंने उनके सिरोंको ग्रहण कर लिया था, जहाँ देवताओंद्वारा हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए भगवान् वृषध्वज महादेवकी प्रतिष्ठा की गयी थी, वहाँ करोड़ों दानवोंका संहार हुआ था, अतः वह कोटीश्वर तीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस तीर्थका दर्शन करनेसे सशरीर स्वर्गारोहण प्राप्त होता है। जबसे इन्द्रने कृपणताके कारण वज्रको कीलसे कीलित कर दिया तबसे साधारण लोगोंके लिये स्वर्गका मार्ग बंद हो गया॥३-१० १/२॥<br><br>पाण्डुनन्दन! जो स्तुति करनेके पश्चात् अन्तमें इस तीर्थकी प्रदक्षिणा कर बिल्वफल प्रदान करता है तथा दीपकसहित पर्वतप्रतिमा सिरपर धारण करता है, वह सभी कामनाओंसे सम्पन्न होकर राजा होता है और मृत्यु होनेपर रुद्रत्वको प्राप्त करता है। पुनः जब वह स्वर्गसे लौटकर जन्म लेता है, तब राजा होता है और राज्यका उपभोग करनेके बाद स्वर्गमें चला जाता है। इसके बाद त्रयोदशी तिथिको मानव बहुनेत्र तीर्थका दर्शन करे। वहाँ मनुष्य स्नानमात्र करनेसे सभी यज्ञोंके फलको प्राप्त कर लेता है। राजेन्द्र! तदनन्तर मनुष्योंके पापोंका नाश करनेके लिये विख्यात अगस्त्येश्वर नामक श्रेष्ठ एवं परम रमणीय तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो जितेन्द्रिय मानव समाहितचित्तसे कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें महादेवजीको घृतसे स्नान कराता है, उसका इक्कीस पीढ़ीत्तक महेश्वरके पदसे पतन नहीं होता। वहाँ यदि विप्रोंको धेनु, जूता, छाता, घी, कम्बल और भोजनका दान दिया जाय तो वह सभी करोड़गुना हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त उत्तम बलाकेश्वरतीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मानव सिंहासनका |