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सर्वकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 1004
९९४* मत्स्यपुराण *

| शुक्लोऽर्करश्मिसंघातश्चन्द्राङ्कितजटो विभुः।<br>जटामुकुटधारी च द्व्यष्टवर्षाकृतिश्च सः॥ ४<br>बाहू वारणहस्ताभौ वृत्तजङ्घोरुमण्डलः।<br>ऊर्ध्वकेशश्च कर्तव्यो दीर्घायतविलोचनः॥ ५<br>व्याघ्रचर्मपरीधानः कटिसूत्रत्रयान्वितः।<br>हारकेयूरसम्पन्नो भुजङ्गाभरणस्तथा॥ ६<br>बाहवश्चापि कर्तव्या नानाभरणभूषिताः।<br>पीनोरुगण्डफलकः कुण्डलाभ्याममलङ्कृतः॥ ७<br>आजानुलम्बबाहुश्च सौम्यमूर्तिः सुशोभनः।<br>खेटकं वामहस्ते तु खड्गं चैव तु दक्षिणे॥ ८<br>शक्तिं दण्डं त्रिशूलं च दक्षिणेपु निवेशयेत्।<br>कपालं वामपार्श्वे तु नागं खट्वाङ्गमेव च॥ ९<br>एकश्च वरदो हस्तस्तथाक्षवलयोऽपरः।<br>वैशाखस्थानकं कृत्वा नृत्याभिनयसंस्थितः॥ १०<br><br>नृत्यन् दशभुजः कार्यों गजचर्मधरस्तथा।<br>तथा त्रिपुरदाहे च बाहवः षोडशैव तु॥ ११<br>शङ्खं चक्रं गदा शार्ङ्गं घण्टा तत्राधिका भवेत्।<br>तथा धनुः पिनाकश्च शरो विष्णुमयस्तथा॥ १२<br>चतुर्भुजोऽष्टबाहुर्वा ज्ञानयोगेश्वरो मतः।<br>तीक्ष्णनासाग्रदशनः करालवदनो महान्॥ १३<br>भैरवः शस्यते लोके प्रत्यायतनसंस्थितः।<br>न मूलायतने कार्यों भैरवस्तु भयंकरः॥ १४<br>नारसिंहो वराहो वा तथान्येऽपि भयङ्कराः।<br>नाधिकाङ्गा न हीनाङ्गाः कर्तव्या देवताः क्वचित्॥ १५<br>स्वामिनं घातयेन्न्यूना करालवदना तथा।<br>अधिका शिल्पिनं हन्यात् कृशा चैवार्थनाशिनी॥ १६ | रुद्रकी मूर्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति कान्तिमती तथा स्थूल ऊरुओं, भुजाओं और स्कन्धोंसे युक्त होनी चाहिये। उनका वर्ण सूर्यकी किरणोंके समान श्वेत और जटा चन्द्रमासे विभूषित हो। वे जटा-मुकुटधारी हों तथा उनकी अवस्था सोलह वर्षकी होनी चाहिये। उनकी दोनों भुजाएँ हाथीके शुण्डादण्डकी तरह तथा जंघा और ऊरुमण्डल गोलाकार हों। उनके केश ऊपरकी ओर उठे हुए तथा नेत्र दीर्घ एवं चौड़े बनाये जाने चाहिये। उनके वस्त्रके स्थानपर व्याघ्रचर्म तथा कमरमें तीन सूत्रोंकी मेखला बनायी जाय। उन्हें हार और केयूरसे सुशोभित तथा सर्पोंके आभूषणोंसे अलंकृत करना चाहिये। उनकी भुजाओंको विविध प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित तथा उभरे हुए कपोलोंको दो कुण्डलोंसे अलंकृत करना चाहिये। उनकी भुजाएँ घुटनेतक लम्बी, मूर्ति सौम्य, परम सुन्दर, बायें हाथमें ढाल, दाहिने हाथमें तलवार, दाहिनी ओर शक्ति, दण्ड और त्रिशूल तथा बायीं ओरके हाथोंमें कपाल, नाग और खट्वाङ्गको रखना चाहिये। एक हाथ वरदमुद्रासे सुशोभित और दूसरा हाथ रुद्राक्षकी माला धारण किये हुए हो॥ १—९½॥<br><br>दस भुजाओंवाली शिवकी नटराज-मूर्तिको विशाख* स्थानयुक्त बनायी जानी चाहिये। वह नाचती हुई तथा गजचर्म धारण किये हुए हो। त्रिपुरान्तक प्रतिमामें सोलह भुजाएँ बनायी जानी चाहिये। उस समय उनके हाथमें शङ्ख, चक्र, गदा, सींग, घण्टा, पिनाक, धनुष, त्रिशूल और विष्णुमय शर—ये आठ वस्तुएँ अधिक रहेंगी। शिवकी ज्ञानयोगेश्वर प्रतिमामें चार या आठ भुजाएँ बनायी जाती हैं। भैरव-मूर्ति तीक्ष्ण दाँत तथा नुकीली नासिकासे युक्त होती है। उनका मुख महान् भयंकर होता है। ऐसी मूर्तिको प्रत्यायतन अर्थात् मुख्य मन्दिरके सामनेके मन्दिर या बरामदेमें स्थापित करना शुभदायक होता है। मुख्य मन्दिरमें भैरवकी स्थापना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि ये भयकारी देवता हैं। इसी प्रकार नृसिंह, वराह तथा अन्य भयंकर देवताओंके लिये भी करना चाहिये। देव-प्रतिमाओंको कहीं भी हीन अङ्गोंवाली अथवा अधिक अङ्गोंवाली नहीं बनानी चाहिये। न्यून अङ्ग तथा भयानक मुखवाली प्रतिमा स्वामीका विनाश करती है, अधिक अङ्गोंवाली प्रतिमा शिल्पकारका हनन करती है और दुर्बल प्रतिमा धनका नाश करती है। |


* विशाखस्थान नृत्य या युद्धमें खड़े होनेकी वह मुद्रा है, जिसमें दोनों पैरोंके बीचमें एक हाथ जगह खाली रहती है।