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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्स-दर्शन ५२७
सबका सम अस्तित्व और अनुवर्तनक्रिया, प्रतिक्रिया और कार्य-कारणके उचित
सम्बन्धमें सजाने और व्यवस्थित करने आदिका काम भी प्रमाताका ही है,
ज्ञानका नहीं। भौतिकवादियोंके यहाँ जीवित मनुष्य ही प्रमाता हो सकता है। देह-
से भिन्न प्रमाता कोई आत्मा मार्क्सवादियोको मान्य नहीं है। ज्ञान स्वयं-
प्रकाश है। व्यवस्थापन करना, सजाना आदि ज्ञानका काम नहीं होता। प्रमाण भी
अज्ञात-ज्ञापक होता है, अकृतकारक नहीं।
इसी तरह 'सम्बन्धकी चेतना ही ज्ञान है या वस्तु-जगत्के अस्तित्वोंके
बीचका तथा आत्मानुभूत अस्तित्वोंके बीचका सम्बन्ध एवं उन दोनों जगतोंके
बीचके सम्बन्धोंके बीचकी चेतनाका नाम भी ज्ञान है', यह भी कथन व्यर्थ है।
क्योंकि वस्तुतः अस्तित्वका स्वतः सम्बन्ध नहीं होता। अस्तित्ववाली वस्तुओंका
सम्बन्ध होता है और वे सम्बन्ध ज्ञेय एवं गुणविशेष होते हैं, चेतना या ज्ञान
नहीं। उसी प्रकार आत्मा मार्क्सवादमे देह-भिन्न है ही नहीं। अनुभव ज्ञानसे
भिन्न कोई वस्तु नहीं होती, फिर आत्मानुभूत अस्तित्वोंका सम्बन्ध भी स्वयं
अनुभव या ज्ञानस्वरूप नहीं हो सकता। विचार वस्तु-जगत्को ठीक ठीक प्रति-
फलित, प्रतिबिम्बित करता है, इसकी निश्चयता ही ज्ञान है। यहाँ भी वस्तुतः वस्तु-
का अन्तःकरणमें प्रतिफलन या प्रतिबिम्बन ही विचार या निश्चय कहलाता है।
यहाँ भी निश्चय, ज्ञान, विचारादि समानार्थक हैं। यहाँ भी अन्योन्याश्रय आदि दोष
उपस्थित होते हैं।
भारतीय नैयायिकोंकी दृष्टिसे सर्वव्यवहारहेतु आत्मगुणको ही ज्ञान
माना जाता है। सुस्पष्ट है कि संसारके सभी व्यवहार तथा व्यापार ज्ञानमूलक हैं।
संसारमें अकामकी कोई भी क्रिया नहीं होती और सभी काम सङ्कल्पमूलक ही
होते हैं। वेदान्तकी दृष्टिमे काम, सङ्कल्प, विचिकित्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, ह्री, धी,
भय—ये सभी मनके धर्म हैं। नैयायिकोंके तथा वैशेषिकोंके अनुसार आत्ममनः-
संयोगसे उत्पन्न होनेवाले ये सब आत्माके ही गुण हैं।
सामाजिक व्यवस्था
कम्युनिष्ट यह मानते हैं कि 'मनुष्य जिस किसी भी अवस्थामें रहा हो
उसके समक्ष कुछ सिद्धान्त, नियम एवं आदर्श रहे हैं' परंतु उनके मतानुसार
'समाजकी अवस्था बदलनेके साथ उनके सिद्धान्तों, नियमों एवं आदर्शोंमें भी
परिवर्तन होता रहता है।' उनकी इस मान्यताका मूल कारण यही है कि 'सर्वज्ञ,
सर्वशक्तिमान्, विश्वस्रष्टा ईश्वर उनकी समझमें आता ही नहीं।' अतएव सर्व-
देश-कालके अनुसार निर्धारित शाश्वत सिद्धान्तों, सत्यों एवं नियमोंपर उनका
विश्वास नहीं जमता। सबसे बड़ा दोष तो यह है कि 'वे परिस्थिति-परतन्त्र
मनुष्योंकी परिस्थित्यनुसारिणी विचार-धाराओंको ही दर्शनोंका स्रोत मानते हैं,