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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 858, कुल 866 में से

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पृष्ठ 858

जाति थी, केलोंके पहले केला जाति थी, भ्रष्टचरित्र और लालची साधुओंके पहले
साधु जाति, लालच तथा भ्रष्टचरित्रता थी ही। पीठपर लात जमानेके लिये लात
और पीठसे पहले पीठ जमानेवाला लात सदासे ईश्वरके अन्तःस्थलमें विद्यमान था।'
और दूसरे दलने उत्तर दिया कि 'नहीं, नेत्रोंसे ही सेव जातिकी धारणा होती है,
केलोंसे ही केला जातिका अस्तित्व है। साधुओंसे ही साधु जाति, लालच तथा भ्रष्ट-
चरित्रता की उत्पत्ति है। लात जमाने और खानेके बाद ही पीठपर लातका कोई
अर्थ होता है। बस खिलाड़ी गरम हो गये और घूंसा चलने लगा। मैं दूसरे
दलका पृष्ठ पोषक था, क्योंकि उसका मत मेरे लिये बुद्धिग्राह्य था और सोवासियोंकी
बैठकने इस मनको अग्राह्य बनाया ( रिवोल्ट आफ ऐजिल्स ) ।'
"प्रज्ञावादी दृष्टिकोणसे वैज्ञानिक ज्ञानका चिह्न है इसके प्रतिपाद्योंकी
व्यापकता और अवश्यम्भाविता । व्यापकताका अर्थ है कि सिद्धान्तका प्रयोग
बिना व्यतिक्रमके हमारे सब अनुभवोंपर हो सके और अवश्यम्भाविताका अर्थ
है कि सब मनुष्योंकी बुद्धि ऐसे सत्यको ग्रहण करनेके लिये उनको बाध्य करे ।
लेकिन प्रज्ञावादीको कार्यकारण-सम्बन्धोंका एक सूत्रबद्ध सिलसिला कहाँसे
मिल जाता है, जो उनके अनुसार वस्तुओंके भ्रमपूर्ण चित्रोंके मूलमें है ?
इन विचारोंके स्पष्ट और स्वयं सिद्ध तथा तर्कसङ्गत होनेसे ही ऐसा क्यों
अनुमान किया जाय कि ये बाहरी दुनियाकी सच्ची तस्वीरें हैं ?
लेनिनके शब्दोंमें इस रहस्यका इस प्रकार उद्घाटन हो जाता है । करोड़ों बार
दुहरानेसे मनुष्यके अभ्यास और अनुभव चेतनामें तर्क सकेनका रूप धारण कर
लेते हैं । तथाकथित तर्कसङ्गत विचारके सार्वभौमरूपोंका ऐतिहासिक आधार
यही है।"
वस्तुतः यह परिभाषा अन्योन्याश्रय-दोषसे युक्त है । ज्ञानका निश्चय
होनेपर ही ज्ञान-सम्बन्धका निश्चय होगा और ज्ञान-सम्बन्ध निश्चय होनेसे
ज्ञानका निश्चय होगा। साथ ही ज्ञान और चेतना-दोनों एक ही वस्तु हैं, फिर
'ज्ञान-सम्बन्धोंकी चेतना ज्ञान है,' इसका यह अर्थ हुआ कि ज्ञान-सम्बन्धोंका ज्ञान
ही ज्ञान है। इस तरह आत्माश्रय दोष भी है। जबतक ज्ञान नहीं विदित है तब-
तक ज्ञान-सम्बन्धोंका भी ज्ञान कैसे होगा ? इसी प्रकार 'वस्तुविषयक, आत्म-
विषयक तथा जीवधारी मनुष्यके रूप और बाहरी दुनियाके चेतनाको ज्ञान
कहते हैं', यह परिभाषा भी अपूर्ण है। क्योंकि ज्ञान और चेतना दोनों एक ही
वस्तु हैं। फिर 'ज्ञानके लक्षणकी जिज्ञासा अमुक सम्बन्धकी चेतना ज्ञान है', इतना
कह देनेसे वह कैसे पूर्ण होगी ? इसके अतिरिक्त सम्बन्ध-चेतना यदि ज्ञान है तो
प्रश्न होगा कि वस्तु-चेतना ज्ञान है या नहीं ? सम्बन्ध चेतना ही वस्तुकी चेतना
है, यह कहना भी असङ्गत है, क्योंकि सम्बन्ध सम्बन्धीसे भिन्न ही होता है।
मा० रा० ३५—