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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 850

बिना भी आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक क्षेत्रमें विकास होता है, इसीलिये कल-
कारखानोंके विकासके बिना भी प्राचीन भारतमें आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक
विकास उच्चकोटिका हुआ था। यद्यपि महायन्त्रोंका विकास प्राचीनकालमें भी हुआ था,
तथापि उसका दुष्परिणाम देखकर उसे उपपातक निश्चितकर उसपर प्रतिबन्ध लगा दिया
गया। फिर भी विशिष्ट शस्त्रास्त्र, विमान, रथ तथा शिल्पकलादिका विकास मय, विश्व-
कर्माद्वारा होता ही रहा। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि भाप या बिजलीकी
चक्की तथा कपड़ों, लोहों, ताम्रादिके बड़े-बड़े कल-कारखानोंके विकास बिना
धार्मिक, सामाजिक विकास या कोई उन्नति नहीं होगी।
वस्तुतः व्यापक इतिहासके महान् क्षेत्रमें सामन्तवाद और पूँजीवाद-जैसी
प्रथाओंका कोई बड़ा महत्त्व नहीं है। प्रमाद-पुरुषार्थ, सुव्यवस्था-दुर्व्यवस्थाके
अनुकूल ही अनुकूल-प्रतिकूल परिवर्तन होते रहते हैं। मार्क्सवादियोंके सामने
केवल कुछ शताब्दियोंका ही इतिहास है। यदि शताब्दियोंके इतिहासमें इतने
परिवर्तन हुए हैं, तो सहस्राब्दियों एवं लक्षाब्दियोंके इतिहासमें क्या क्या परिवर्तन
हुए होंगे, इसका भी तो विचार करना चाहिये। आस्तिकोंकी दृष्टिसे मनुष्यलोकमें
ही नहीं, किंतु देवलोकके भी विकास तथा अभ्युदयकी पराकाष्ठा निर्धारित ही है,
और परम उत्कर्ष कैवल्य—अपवर्गका भी स्वरूप निश्चित है। तैत्तिरीय, बृहदा-
रण्यक, कौषीतकि आदि उपनिषदों, इतिहास, पुराणोंमें लौकिक-पारलौकिक उन्नति
तथा परम निःश्रेयसके स्वरूप निर्धारित हैं। अन्तमें कहा गया है कि अचिन्त्य
अनन्त स्वरूपभूत परमानन्द सुधासिन्धुका एक तुषारमात्र आनन्द ही अनन्त
ब्रह्माण्डके धर्मिष्ठ सार्वभौम सम्राट्, मनुष्यगन्धर्व, देवगन्धर्व, कर्मदेव, आजानदेव,
इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति, ब्रह्मादिके उत्तरोत्तर प्रकृष्ट आनन्दके रूपमें वितरित होता
है। मनुष्यलोकके उत्कर्ष-अपकर्षकी कोई ऐसी अवस्था नहीं जो इन करोड़ों वर्षोंमें
न आयी हो, अतः शताब्दियोंकी परिवर्तनपरम्परा कोई अभूतपूर्व घटना नहीं है।
गुण-परिवर्तन
“पूँजीवादमें समाज और प्रकृतिका विरोध तो विद्यमान रहता है, लेकिन इस
विरोधके विशिष्टरूपका निराकरण होता है भौगोलिक परिवेष्टनके गुणोंद्वारा नहीं;
बल्कि पूँजीवादके विकासके मूल नियमोंके द्वारा। समाज अपने आन्तरिक
नियमोंसे और अपनी उत्पादक-शक्तियोंके विकाससे हर विशेष सामाजिक
संगठनोंके विशेष साधनोंद्वारा अपने भौगोलिक परिवेष्टनमें परिवर्तन करता है।
जंगलोंकी कमी हो गयी है, पेड़ोंके लगाने और गिरानेपर नियन्त्रण रखा जाता
है। कोयला काफी नहीं है, पेट्रोलियम उसके स्थानपर इस्तेमाल किया जाता है।
चमड़ा, रेशम, ऊनकी कमी है, अतः ये कृत्रिम उपायोंसे बनाये जाते हैं।