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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 842

है । अनुभव-सिद्ध बात है कि 'जानाति, इच्छति, अथ करोति' प्राणी किसी वस्तुको
जानता है, फिर इच्छा करता है, फिर कर्म करता है । किसी भी कर्मके लिये
पहले सङ्कल्प अपेक्षित होता है । 'यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते।' (छा० उ०)
प्राणी जैसा सङ्कल्प करता है, वैसा ही कर्म करता है—
सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः सङ्कल्पसम्भवाः ।
व्रतानि यमधर्माश्च सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ॥
अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित् ।
यद्यद्धि कुरुते किंचित्तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ॥
(मनुस्मृ० २ । ३-४)
सभी काम सङ्कल्पसे ही होते हैं और सकामकी ही क्रिया होती है ।
निःसङ्कल्प निष्कामकी कोई भी क्रिया कभी भी देखी नहीं जाती । विश्वनिर्माण
भी ईश्वरीय सङ्कल्पन तथा चिकीर्षामूलक ही है । व्यवहारमें भी कोई शिल्पी
पहले वस्तुकी कल्पना या सङ्कल्प करता है, फिर इच्छा करता है, पुनः
साधन-सङ्ग्रहपूर्वक मनःस्थ वस्तुको बाह्याकार देता है । लेनिनका सूत्र
इस सहज स्वाभाविक व्यवहारका उल्लङ्घन करता है । वस्तु-तत्त्वको
तोड़ना और पुनर्निर्माण करना यह द्वन्द्ववादी भाषा ही असङ्गत है ।
पुनर्निर्माण शब्द निर्मित वस्तुके ही पुनर्निर्माणके अर्थमें प्रयुक्त होता है,
नव निर्माण और पुनर्निर्माणमें यही अन्तर है । मृत्पिण्डका विभाजन घट-
निर्माणके लिये होता है । एक अवस्था हटनेपर ही दूसरी अवस्था आ सकती है ।
अतः पिण्डावस्था हटती है, तब घटावस्था आती है । इस तरह कार्यावस्थासे
पूर्व व्यवस्थाका प्रत्यावर्तन नहीं होता । देशकाल तथा विविध सम्बन्धित पदार्थोंसे
सम्बन्ध रहनेपर भी पृथक्त्व रहता ही है, वैज्ञानिक विश्लेषण भी तभी सार्थक है ।
सम्मिलित, सम्बन्धित, अविविक्त भूमण्डल सूर्यमण्डलमें विवेकद्वारा विभिन्न
गुणधर्मयुक्त अनेक पदार्थ मिलते हैं । यों तो कारणरूपसे सभीकी एकता है ।
पार्थिवरूपसे अभिन्न होते हुए भी लोहा, सोना, चाँदी, पत्थर, मिट्टी आदि
रूपसे भिन्नता मानना ही तत्त्वज्ञान है । अध्यात्मवादके लिये यह कोई नयी वस्तु
नहीं है । वस्तुके यथार्थ जो भी दृष्टिकोण हो, उपयोगिताकी दृष्टिसे सभीपर विचार
होना चाहिये । काकदन्तपरीक्षा, गर्दभरोमगणना आदि व्यर्थकी परीक्षाएँ
होती हैं, वे अमान्य होती हैं ।
कहा जाता है कि 'प्रत्येक वस्तु विराट् विश्वप्रक्रियाका एक अङ्ग है । इसकी
प्रकृतिको इसकी रूपान्तरिक अवस्थासे अलग करके नहीं समझा जा सकता ।'
यही लेनिनका तीसरा सूत्र है । 'हमें वस्तु या दृश्यगत घटनाओंके विकास
इसकी अपनी गति, इसके अपने जीवन आदिका विचार करना चाहिये ।

मा० रा० ३४—