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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 839

आवश्यकता है। क्रिया कोई भी असीम नहीं होती, कर्म या क्रिया स्वयं क्षण-
भङ्गुर ही होती है। हाँ, सदृश क्रियाओका प्रवाह असीम हो सकता है, परंतु यह
असीमता भी तो प्रत्यक्ष नहीं है। असीमताका अनुमान ही करना पड़ेगा।
अनुमानका भी कोई निश्चित लिङ्ग नहीं है। संसारभरके प्रायः सभी अध्यात्मवादी
सम्प्रदाय तथा बौद्ध योगाचार, सौत्रान्तिक, वैभाषिक एवं माध्यमिकतक बन्धको
अनादि किंतु सान्त मानते हैं। भगवान् कृष्णकी गीता भी उसे अनन्त बतलाती
है। 'नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा (१५।३)। इस संसारका न अन्त है, न आदि
है। अद्वैतवेदान्तके अनुसार अनादि होते हुए भी सान्त है। गीताके वचनका
अभिप्राय यही है कि तत्त्व-साक्षात्कार बिना इस संसारका अन्त नहीं होता ।
असीम भी हो, सर्जनशक्ति भी हो, तो भी, जडका प्रेरक-प्रवर्तक चेतन आवश्यक
ही है । किसी भी जडकी अनुकूल सर्जनशक्ति बिना नियन्त्रणके सर्वथा
अदृष्टचर है।
'मनुष्यके मानसिक तथा बाहरी वस्तुओके संयोगजनित व्यवहारने यह
सिद्ध किया कि जिस दिशामे प्राचीन भौतिकवादी सत्यको खोजना चाहते थे,
वह वहाँ नहीं है, उसको खोजनेके लिये दूसरी दिशाको जाना पड़ेगा। मनुष्यका
विचार जिस सत्यको पहुँच सकता है, वह अनन्त कालके लिये सम्पूर्ण सत्य नहीं
है, जिसका अस्तित्व ऐसे पुरुषके लिये है जो मनुष्यके राग-द्वेष और ससीमतासे
मुक्त हो। जिस सत्यको मनुष्य पहुँच सकता है, वह उन सम्बन्धोंका—जिनके
अन्तर मनुष्य जाता है, चलता-फिरता है और रहता है—एक विकासमान
समन्वय है । यह आपेक्षिक सत्य है, क्योकि यह कुछ पारस्परिक सम्बन्धों
तथा क्रिया-प्रतिक्रियाओका रूप है, जिनको हम उन सम्बन्धोके अंदरसे ही
देखते हैं। पुनः परिमाणकी दृष्टिसे भी यह आपेक्षिक है, क्योकि इसमें सदा
वृद्धि होती रहती है और अधिकतर वृद्धिप्राप्ति करनेकी इसमे शक्ति है।
लेकिन गुणात्मक दृष्टिसे और तुलनात्मकरूपमे यह सत्यपूर्ण भी है । यद्यपि यह
पूर्ण सत्य नहीं, तथापि जहाँतक यह प्रयोग सिद्ध है, वहाँतक यह सत्य ही है।
"सिद्धान्त और प्रयोग, पूर्णता और आपेक्षिकता, पुरानी अवस्थाका जारी
रहना और परिवर्तित होना, कायमी अवस्था और वृद्धि, इन विरोधियोंके एकत्वमे
ही कान्टके पूर्व यान्त्रिक भौतिकवाद तथा द्वन्द्वात्मक भौतिकवादका प्रमेय है।
एजिल्सके शब्दोंमें—'पिछली सदीमे भौतिकवादका रूप यान्त्रिक होनेका कारण
यह था कि उस समय प्रकृतिविज्ञानकी शाखाओंमें यन्त्रविज्ञानका ही काफी
विस्तार हो चुका था। देकार्तके लिये पशु एक मशीन-जैसा था। अठारहवीं
सदीके भौतिकवादके लिये मनुष्य भी वैसे ही था । उस समयके फ्रांसीसी
भौतिकवादकी यह संकीर्णता थी कि वह हर प्रक्रियाके सम्बन्धमें यन्त्रवादका
प्रयोग करता था, चाहे वह रसायन शास्त्र हो, चाहे जीव-प्रकृति, जिसके सम्बन्धमें
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